चेक बाउंस करने के मामले में कंपनी के पूर्व सहायक प्रबंधक को एक साल की सजा

Edited By Pawan Kumar Sethi, Updated: 07 Oct, 2026 06:59 PM

one year imprisonment to formerassistant manager in cheque bounse case

मनक वेस्ट मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड के पूर्व सहायक प्रबंधक प्रवीण कुमार को 10 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में दोषी ठहराया गया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी हुन्नी मित्तल की अदालत ने दोषी को एक साल की कैद की सजा दी है। साथ ही 10 लाख के बदले...

गुड़गांव, (ब्यूरो): मनक वेस्ट मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड के पूर्व सहायक प्रबंधक प्रवीण कुमार को 10 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में दोषी ठहराया गया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी हुन्नी मित्तल की अदालत ने दोषी को एक साल की कैद की सजा दी है। साथ ही 10 लाख के बदले 20 लाख रुपये लौटाने के आदेश अदालत ने दिए हैं। 

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जानकारी के मुताबिक, कंपनी ने प्रवीण कुमार पर नौकरी के दौरान धोखाधड़ी और 90 लाख रुपये के धन के गबन का आरोप लगाया था। प्रवीण कुमार ने 28 अक्तूबर 2021 को अपनी गलती स्वीकार की थी। उन्होंने कंपनी को 15 लाख रुपये का भुगतान भी किया था। इसके बाद उन्होंने 10 लाख रुपये का चेक 31 मई 2022 को जारी किया था। यह चेक बैंक में प्रस्तुत करने पर अपर्याप्त धन के कारण अनादरित हो गया। कंपनी ने कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन प्रवीण कुमार ने निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया। इसके बाद कंपनी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की थी।

 

अदालत ने पाया कि प्रवीण कुमार ने चेक पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार किए थे। इससे परक्राम्य लिखित अधिनियम की धारा 118 और 139 के तहत अनुमान कंपनी के पक्ष में गया। अदालत ने आरोपी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि कंपनी का अधिकृत प्रतिनिधि मामले से व्यक्तिगत रूप से अवगत नहीं था। अदालत ने कहा कि कंपनी के रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी पर्याप्त मानी जाती है। प्रवीण कुमार ने अपने बचाव में 15 लाख रुपये के भुगतान की बात भी स्वीकार की थी। प्रवीण कुमार ने दावा किया था कि चेक नौकरी में शामिल होने के समय सुरक्षा के तौर पर दिया गया था। अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया क्योंकि वित्तीय देनदारी मौजूद थी। आरोपी के पिता सूरजपाल सिंह के हस्ताक्षर भी समझौते पर थे, जिसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि कंपनी द्वारा अलग से आपराधिक कार्रवाई शुरू न करना वित्तीय देनदारी को नकारता नहीं है।

 

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