पति-पत्नी को एक साथ पैरोल देने पर रोक नहीं, दोनों का अधिकार अलग-अलग: हाई कोर्ट

Edited By Harman, Updated: 30 Jul, 2026 05:06 PM

no bar on granting simultaneous parole to husband and wife high court

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर किसी दोषी की नियमित पैरोल नहीं रोकी जा सकती कि उसका पति या पत्नी पहले से पैरोल पर है।

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी) : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर किसी दोषी की नियमित पैरोल नहीं रोकी जा सकती कि उसका पति या पत्नी पहले से पैरोल पर है। अदालत ने कहा कि पति और पत्नी दोनों का पैरोल पाने का अधिकार स्वतंत्र है और एक की रिहाई दूसरे के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती।

जस्टिस राजेश भारद्वाज और जस्टिस अमरजोत भट्टी की खंडपीठ ने सोनीपत निवासी बसंत कुमार उर्फ बंटी की याचिका स्वीकार करते हुए 12 मई 2026 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए हरियाणा सरकार ने उसकी 10 सप्ताह की नियमित पैरोल की मांग ठुकरा दी थी। साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को 10 सप्ताह की नियमित पैरोल पर रिहा करने का निर्देश दिया।मामले में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसने नियमित पैरोल के लिए आवेदन किया था, लेकिन सक्षम प्राधिकारी ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उसकी पत्नी सरिता पहले से पैरोल पर है और उसकी पैरोल पर विचार पत्नी के जेल में समर्पण (सरेंडर) के बाद ही किया जाएगा।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसे इससे पहले अक्टूबर 2024 में 10 सप्ताह की पैरोल मिली थी और उसने निर्धारित अवधि पूरी होने पर समय पर जेल में आत्मसमर्पण कर दिया था। उसकी पत्नी सरिता को भी जुलाई 2024 में 10 सप्ताह की पैरोल स्वीकृत हुई थी, लेकिन जेल प्रशासन ने दोनों को एक साथ रिहा करने से इनकार कर दिया था।याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि सरिता ने इस निर्णय को पहले हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उस मामले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि पति के उसी समय पैरोल पर होने का तथ्य पत्नी की रिहाई में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं बन सकता। अदालत ने उस फैसले में यह भी माना था कि पैरोल एक महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार है, जो दोषी के सुधार (रिफॉर्मेशन) की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। समाज से संपर्क बनाए रखना उनके पुनर्वास और जिम्मेदार नागरिक के रूप में वापसी के लिए आवश्यक है।खंडपीठ ने कहा कि जब इस मुद्दे पर कानून पहले से स्पष्ट है, तब केवल पत्नी के पैरोल पर होने के आधार पर पति की पैरोल अस्वीकार करना कानून की नजर में टिक नहीं सकता। इसलिए 12 मई 2026 का आदेश कानूनी रूप से अस्थिर (अनसस्टेनेबल) है और इसे रद्द किया जाता है।

हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 10 सप्ताह की नियमित पैरोल पर तत्काल रिहा किया जाए। इसके लिए वह सक्षम प्राधिकारी की संतुष्टि के अनुसार आवश्यक जमानती बांड प्रस्तुत करेगा, जिन्हें तुरंत स्वीकार किया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पैरोल अवधि समाप्त होने पर याचिकाकर्ता को संबंधित जेल में निर्धारित समय पर आत्मसमर्पण करना होगा और जेल अधीक्षक उसकी रिहाई के समय उसे वापसी की तारीख और समय की जानकारी देगा।याचिका के अनुसार पति व पत्नी पर हत्या व संगीन मामलों के आरोप में जेल में बंद है।

Related Story

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!