दशकों पुराने भूमि अधिग्रहण विवाद दोबारा नहीं खुलेंगे, हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

Edited By Harman, Updated: 30 Jul, 2026 04:46 PM

decades old land acquisition disputes will not be reopened high court

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जिन भूमि अधिग्रहण मामलों का वर्षों पहले अंतिम निस्तारण हो चुका है, उन्हें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 की...

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी) : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जिन भूमि अधिग्रहण मामलों का वर्षों पहले अंतिम निस्तारण हो चुका है, उन्हें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 24(2) का आधार बनाकर दोबारा नहीं खोला जा सकता। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य पहले से समाप्त हो चुके विवादों को अनिश्चितकाल तक जीवित रखना नहीं है।

जस्टिस विकास बहल और जस्टिस सुभाष मेहला की खंडपीठ ने झज्जर जिले के बहादुरगढ़ स्थित 1 बीघा 12 बिस्वा भूमि के अधिग्रहण को चुनौती देने वाली वर्ष 2016 की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। संबंधित भूमि का अधिग्रहण आवासीय, वाणिज्यिक और संस्थागत सेक्टरों के विकास के लिए किया गया था।

अदालत ने बताया कि अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्ष 2002-03 में तत्कालीन भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत शुरू हुई थी और 25 जून 2004 को अवार्ड पारित हो चुका था। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उनकी भूमि का वैधानिक कब्जा नहीं लिया गया, इसलिए अधिग्रहण निरस्त किया जाए।

खंडपीठ ने कहा कि 2013 का नया कानून लागू होने के बाद बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए, जिनमें भू-स्वामियों ने दशकों पुराने अधिग्रहण मामलों को धारा 24(2) के माध्यम से फिर से चुनौती देने का प्रयास किया। कई मामलों में या तो पहले याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं या फिर अधिग्रहण को कभी चुनौती ही नहीं दी गई थी। अदालत ने कहा कि अत्यधिक विलंब से दायर ऐसी याचिकाओं के जरिए उन मुद्दों को उठाया जा रहा है जो समय के साथ समाप्त हो चुके हैं और जिन्हें कानून की दृष्टि में फिर से जीवित नहीं किया जा सकता। यदि इस तरह की याचिकाओं को स्वीकार किया गया तो भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया कभी अंतिम रूप नहीं ले पाएगी और सार्वजनिक विकास परियोजनाएं लंबे समय तक प्रभावित होती रहेंगी।

इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि वर्तमान याचिका भी अत्यधिक विलंब से दायर की गई है तथा इसमें कोई कानूनी आधार नहीं बनता। अदालत ने याचिका को निराधार और गुण-दोष रहित बताते हुए खारिज कर दिया।

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