Edited By Isha, Updated: 06 Aug, 2026 11:23 AM

हरियाणा में जन्म के समय लिंगानुपात में एक बार फिर गिरावट के संकेत मिले हैं। वर्ष 2025 में जहां राज्य का जन्म लिंगानुपात 923 था, वहीं वर्ष 2026 के पहले छह महीनों (जनवरी-जून) के अस्थायी आंकड़ों में
चंडीगढ़: हरियाणा में जन्म के समय लिंगानुपात में एक बार फिर गिरावट के संकेत मिले हैं। वर्ष 2025 में जहां राज्य का जन्म लिंगानुपात 923 था, वहीं वर्ष 2026 के पहले छह महीनों (जनवरी-जून) के अस्थायी आंकड़ों में यह घटकर 900 रह गया है। राज्य के 10 जिलों में लिंगानुपात 900 से भी नीचे दर्ज किया गया है। स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया है कि जून 2026 तक के आंकड़े प्रोविजनल हैं। ऐसे में इनकी सीधे पूरे वर्ष 2025 के आंकड़ों से तुलना नहीं की जा सकती, लेकिन यह स्थिति चिंता का संकेत जरूर देती है। अंतिम तस्वीर पूरे वर्ष के आंकड़े जारी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
2025 में हरियाणा में 5.19 लाख से अधिक जन्म दर्ज हुए थे
आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में हरियाणा में 5.19 लाख से अधिक जन्म दर्ज हुए थे और प्रति 1000 लड़कों पर 923 लड़कियां जन्मी थीं। वहीं जनवरी से जून 2026 के दौरान 2.30 लाख से अधिक जन्म दर्ज हुए, जिनमें प्रति 1000 लड़कों पर केवल १00 लड़कियां जन्मीं। जिला स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। पहले छह महीनों में केवल 10 जिले ही 900 या उससे अधिक का लिंगानुपात दर्ज कर सके। सबसे खराब स्थिति चरखी दादरी की रही, जहां प्रति 1000 लड़कों पर केवल 829 लड़कियां जन्मीं। इसके बाद महेंद्रगढ़ (869), गुरुग्राम और झज्जर (871-871), जींद (878), पानीपत (880), अंबाला (884), रोहतक और रेवाड़ी (891-891) तथा हिसार और यमुनानगर (895-895) का स्थान रहा। वहीं करनाल ने 945 के लिंगानुपात के साथ प्रदेश में पहला स्थान हासिल किया। इसके बाद पलवल (930), फरीदाबाद (920), नूंह (918), फतेहाबाद (917) और भिवानी (915) रहे। सिरसा, सोनीपत, कैथल, पंचकूला और कुरुक्षेत्र का लिंगानुपात भी राज्य के औसत से बेहतर दर्ज किया गया।
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष लिंगानुपात सुधार के लिए हर सप्ताह समीक्षा बैठकें होती थीं। संबंधित विभागों की जवाबदेही तय की जाती थी और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के विशेषज्ञ भी अभियान से जुड़े थे। अधिकारियों की नियमित निगरानी के कारण पीसीपीएनडीटी कानून के प्रभावी पालन और लिंगानुपात सुधार पर विशेष ध्यान दिया जाता था। अब समीक्षा व्यवस्था पहले जैसी सक्रिय नहीं रहने से सुधार प्रयासों पर असर पड़ने की बात सामने आ रही है।