दस्तावेज पंजीकरण पर मौखिक इन्कार नहीं कर सकता सब-रजिस्ट्रार, हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

Edited By Krishan Rana, Updated: 30 Jul, 2026 07:20 PM

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पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी दस्तावेज को पंजीकरण के लिए

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी दस्तावेज को पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किए जाने पर सब-रजिस्ट्रार केवल मौखिक रूप से इन्कार नहीं कर सकता। उसे या तो दस्तावेज का विधि अनुसार पंजीकरण करना होगा या फिर पंजीकरण से इन्कार करते हुए कारणयुक्त लिखित आदेश पारित करना होगा। अदालत ने इसे सब-रजिस्ट्रार की कानूनी जिम्मेदारी बताया है।

जस्टिस कुलदीप तिवारी ने यह आदेश गुरुग्राम निवासी ओसी कंवर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने वर्ष 2014 में खरीदे गए स्टांप पत्रों के आधार पर बिक्री विलेख का पंजीकरण कराने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनका कहना था कि उन्होंने चक्करपुर और सुखराली गांव स्थित संपत्ति की खरीद के लिए भारतीय स्टेट बैंक से 9.28 लाख रुपये के स्टांप पत्र खरीदे थे।

याचिका के अनुसार, चार अक्टूबर 2017 को मूल स्टांप पत्रों के साथ बिक्री विलेख पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किया गया, लेकिन सब-रजिस्ट्रार ने यह कहते हुए पंजीकरण से इन्कार कर दिया कि संबंधित जीआरएन (सरकारी रसीद संख्या) का पहले ही उपयोग किया जा चुका है। वहीं, ट्रेजरी अधिकारी ने अदालत को बताया कि ई-ग्रास पोर्टल पर लेन-देन की स्थिति "पेंडिंग" थी, जबकि सब-रजिस्ट्रार के रिकॉर्ड में वही जीआरएन "फेल्ड" दिख रहा था।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि स्टांप शुल्क का पूरा भुगतान चेक के माध्यम से किया गया था और सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे। इसके बावजूद केवल तकनीकी कारण बताते हुए पंजीकरण नहीं किया गया।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 की धारा 49 और 50 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि स्टांप पत्र खरीदने के तीन वर्ष बाद दस्तावेज प्रस्तुत किया गया, जिससे उसकी वैधता का प्रश्न उठता है। हालांकि, सरकार ने यह भी माना कि इस पूरे विवाद की जांच और निर्णय का अधिकार सब-रजिस्ट्रार के पास ही है।

हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता 15 दिनों के भीतर दोबारा बिक्री विलेख पंजीकरण के लिए प्रस्तुत करता है, तो सब-रजिस्ट्रार कानून के अनुरूप पूरे मामले की जांच करेगा और दस्तावेज प्रस्तुत होने की तिथि से 30 दिनों के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना लिखित आदेश के केवल मौखिक रूप से पंजीकरण से इन्कार करना कानून सम्मत नहीं है।

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