रंगदारी के मामले में 10 साल बाद आरोपी को अदालत ने किया बरी

Edited By Pawan Kumar Sethi, Updated: 30 Jul, 2026 10:24 PM

court acquits accused in extortion case after 10 years

अदालत ने दस साल पुराने रंगदारी और जान से मारने की धमकी देने के चर्चित मामले में आरोपी रूपेश कुमार को बरी कर दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी विशाल की अदालत ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ कोई ठोस और कानूनी रूप...

गुड़गांव,(ब्यूरो): अदालत ने दस साल पुराने रंगदारी और जान से मारने की धमकी देने के चर्चित मामले में आरोपी रूपेश कुमार को बरी कर दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी विशाल की अदालत ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ कोई ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।

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जानकारी के अनुसार 11 सितंबर 2016 को डीएलएफ फेज-3 निवासी जसविंदर सिंह कोहली ने डीएलएफ फेज-2 थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के मुताबिक 10 सितंबर 2016 की सुबह उनके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से फोन आया। इसके बाद उसी रात करीब साढ़े नौ बजे उनके मोबाइल नंबर पर एक मैसेज प्राप्त हुआ। इस मैसेज में लिखा था कि उनके बेटे की जान खतरे में है और यदि वह अपने बच्चे को सही-सलामत देखना चाहते हैं, तो एक हफ्ते के अंदर पैसों का इंतजाम करें। मैसेज में पुलिस या किसी अन्य को न बताने की धमकी भी दी गई थी। इस शिकायत के आधार पर सब-इंस्पेक्टर दीपक की संस्तुति पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई।  

 

मामले की गंभीरता को देखते हुए गुरुग्राम साइबर सेल की मदद ली गई। पुलिस टीम मोबाइल नंबर की लोकेशन ट्रेस करते हुए बिहार के भागलपुर जिले के परबत्ता थाना क्षेत्र स्थित खगड़िया गांव पहुंची। दो अक्तूबर 2016 को पुलिस ने वहां से आरोपी रूपेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का दावा था कि आरोपी के घर से वह मोबाइल हैंडसेट और सिम कार्ड बरामद कर लिया गया था जिससे धमकी भरा मैसेज भेजा गया था। नौगछिया कोर्ट से ट्रांजिट रिमांड लेने के बाद उसे पांच अक्तूबर 2016 को न्यायिक हिरासत में भेजा गया था।

 

कोर्ट में चले ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष की तरफ से दलीले दी गई। जिसमें बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (जैसे एसएमएस या सीडीआर के प्रिंटआउट) को साबित करने के लिए धारा 65बी के तहत अनिवार्य प्रमाण पत्र दाखिल नहीं किया गया। इसके बिना एसएमएस के प्रिंटआउट कानूनी रूप से मान्य नहीं हैं। कोर्ट में सुनवाई के दौरान जिस सिम नंबर से मैसेज भेजा गया था, उसके पंजीकृत मालिक प्रभास मंडल ने अदालत में बयान दिया कि उनका एयरटेल सिम सितंबर 2016 में खो गया था। उन्होंने कहा कि उन्हें एसएमएस भेजना तक नहीं आता और न ही वे आरोपी को जानते हैं।

 

इसके अलावा पुलिस ने मोबाइल जब्त किया तो उसमें से सारे मैसेज डिलीट पाए गए थे। इसके बावजूद मोबाइल को फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी नहीं भेजा गया, जिससे यह साबित नहीं हो सका कि धमकी भरा मैसेज उसी फोन से भेजा गया था। बिहार में आरोपी के घर से हुई बरामदगी और गिरफ्तारी के दौरान किसी भी स्थानीय स्वतंत्र गवाह या परिजनों के हस्ताक्षर मेमो पर नहीं लिए गए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि धारा 386 (रंगदारी) के तहत संपत्ति या पैसों का लेनदेन होना जरूरी है, जो इस मामले में नहीं हुआ था।

 

न्यायिक मजिस्ट्रेट विशाल ने अपने आदेश में कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली में आरोपी पर दोष सिद्ध करने की पूरी जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है। केवल संदेह या कमजोर जांच के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती। तमाम गवाहों और सबूतों के विश्लेषण के बाद, अदालत ने रूपेश कुमार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

 

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