Edited By Isha, Updated: 05 Aug, 2026 10:43 AM
हरियाणा के यमुनानगर में यमुना नदी पर बना हथिनीकुंड बैराज केवल एक सिंचाई परियोजना नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जल व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। यही बैराज हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश
चंडीगढ़( चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा के यमुनानगर में यमुना नदी पर बना हथिनीकुंड बैराज केवल एक सिंचाई परियोजना नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जल व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। यही बैराज हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश सहित पांच राज्यों में पानी के बंटवारे का आधार है। करोड़ों लोगों की पेयजल आपूर्ति, लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई और औद्योगिक क्षेत्रों की जल जरूरतें इसी बैराज पर निर्भर हैं।
लेकिन विडंबना यह है कि जिस बैराज को आधुनिक इंजीनियरिंग का उदाहरण माना गया था, वह निर्माण के मात्र 26 वर्ष बाद ही गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। दूसरी ओर, अंग्रेजों द्वारा वर्ष 1878 में बनाया गया ताजेवाला हेडवर्क्स लगभग 120 वर्षों तक अपनी उपयोगिता बनाए रखने में सफल रहा। यह तुलना आज कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है कि आखिर आधुनिक तकनीक के बावजूद इतनी जल्दी संकट की स्थिति क्यों पैदा हो गई।

अंग्रेजों का ताजेवाला हेडवर्क्स बना मिसाल
ताजेवाला हेडवर्क्स का निर्माण वर्ष 1878 में ब्रिटिश शासन के दौरान किया गया था। इसे लगभग 100 वर्षों की आयु को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया था। हालांकि इसकी वास्तविक उपयोग अवधि इससे कहीं अधिक रही और यह वर्ष 1999 तक प्रभावी रूप से कार्य करता रहा।
इस दौरान वर्ष 1978, 1998 और 2010 जैसी भीषण बाढ़ों का सामना भी इस संरचना ने किया। हालांकि 2010 की विनाशकारी बाढ़ में इसका बचा हुआ ढांचा भी बह गया, लेकिन तब तक यह 120 वर्षों से अधिक समय तक अपनी जिम्मेदारी निभा चुका था। इंजीनियरिंग विशेषज्ञ आज भी इसे मजबूत डिजाइन और निर्माण गुणवत्ता का उदाहरण मानते हैं।
तीन साल में बना था हथिनीकुंड बैराज
ताजेवाला हेडवर्क्स के स्थान पर आधुनिक व्यवस्था विकसित करने के लिए हथिनीकुंड बैराज का निर्माण किया गया। इसका निर्माण 9 जुलाई 1999 को तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल के कार्यकाल में पूरा हुआ। विशेष बात यह रही कि लगभग तीन वर्षों के रिकॉर्ड समय में यह परियोजना तैयार कर ली गई।
सेंट्रल वाटर कमीशन के डिजाइन के अनुसार बनाए गए इस बैराज से पश्चिमी यमुना नहर और पूर्वी यमुना नहर के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पानी पहुंचता है। इसके संचालन से हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश को जल उपलब्ध कराया जाता है।

लगातार नीचे जा रहा नदी का तल बना सबसे बड़ा खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार हथिनीकुंड बैराज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यमुना नदी के तल का लगातार नीचे जाना है। वर्ष 1999 में जब बैराज बना था, तब नदी का बेड लगभग 329 मीटर स्तर पर था। लेकिन लगातार बाढ़, तेज जल प्रवाह और कटाव के कारण दो वर्ष पहले तक नदी का तल लगभग 14 मीटर नीचे पहुंच चुका था।
नदी का तल नीचे जाने से बैराज की नींव पर दबाव बढ़ जाता है। यदि समय रहते सुरक्षा उपाय नहीं किए जाएं तो भविष्य में संरचना की स्थिरता पर गंभीर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि सिंचाई विभाग को इस खतरे को देखते हुए बड़े पैमाने पर सुरक्षा कार्य कराने पड़े।
140 करोड़ रुपये खर्च कर बचाई गई संरचना
रिवर बेड में लगातार हो रहे कटाव को देखते हुए सिंचाई विभाग ने बैराज की सुरक्षा के लिए लगभग 140 करोड़ रुपये की लागत से व्यापक मरम्मत और सुरक्षा कार्य कराए। करीब दो वर्षों तक चले इन कार्यों में नींव की मजबूती, कटाव रोकने और जल प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए कई तकनीकी उपाय अपनाए गए।
अधिकारियों का कहना है कि इन कार्यों से तत्काल खतरे को काफी हद तक नियंत्रित किया गया, लेकिन यमुना के बदलते स्वरूप और लगातार आने वाली बाढ़ के कारण भविष्य में भी नियमित निगरानी और रखरखाव की आवश्यकता बनी रहेगी।
अब बैराज के रैंप बने नई चिंता का कारण
जहां एक ओर करोड़ों रुपये खर्च कर संरचना को सुरक्षित करने का दावा किया गया, वहीं अब बैराज के ग्लेसिस (रैंप) गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। कई स्थानों पर कंक्रीट टूट चुकी है, बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं और लोहे की सरिया बाहर दिखाई देने लगी हैं। स्थिति यह है कि पानी सीधे इन क्षतिग्रस्त हिस्सों से नीचे नींव की ओर पहुंच रहा है। यदि बरसात के दौरान लाखों क्यूसेक पानी का दबाव इन हिस्सों पर पड़ा तो नुकसान और बढ़ सकता है।
स्थानीय लोगों और तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून शुरू होने से पहले इनकी मरम्मत पूरी हो जानी चाहिए थी, लेकिन टेंडर प्रक्रिया में देरी के कारण यह कार्य समय पर नहीं हो सका।

बरसात के बाद होगी मरम्मत
हरियाणा सिंचाई विभाग के सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर प्रवीण गुप्ता के अनुसार रैंपों की मरम्मत के लिए लगभग तीन करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया जा चुका है। दो रैंपों की मरम्मत पूरी हो चुकी है, जबकि शेष रैंपों का कार्य मानसून समाप्त होने के बाद कराया जाएगा। विभाग का दावा है कि ठेकेदार से दो वर्ष की गारंटी भी ली गई है और फिलहाल बैराज को किसी बड़े खतरे की आशंका नहीं है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून के दौरान अत्यधिक जल प्रवाह आया तो क्षतिग्रस्त हिस्सों पर दबाव बढ़ सकता है।
अवैध खनन ने भी बढ़ाई मुश्किलें
बैराज के आसपास तीन किलोमीटर ऊपर और तीन किलोमीटर नीचे तक खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है, ताकि नदी का प्राकृतिक स्वरूप बना रहे और संरचना सुरक्षित रहे। इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में बैराज के आसपास अवैध खनन के कई मामले सामने आए। प्रशासन ने विभिन्न मामलों में मुकदमे भी दर्ज किए, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अवैध खनन से नदी का प्रवाह और तल दोनों प्रभावित हुए हैं, जिससे कटाव की समस्या और गंभीर हुई है।
जल संसाधन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बैराज की सबसे बड़ी मजबूती केवल उसका निर्माण नहीं बल्कि उसका नियमित रखरखाव होता है। नदी के बदलते प्रवाह, बढ़ती बाढ़, जलवायु परिवर्तन और अवैध खनन जैसी चुनौतियों के बीच हथिनीकुंड बैराज की लगातार तकनीकी निगरानी आवश्यक है।
यदि समय पर मरम्मत, कटाव रोकने के उपाय और सुरक्षा कार्य नहीं किए गए तो भविष्य में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
ताजेवाला हेडवर्क्स ने लगभग 120 वर्षों तक अपनी मजबूती साबित की, जबकि आधुनिक तकनीक से बना हथिनीकुंड बैराज मात्र 26 वर्षों में ही कई तकनीकी चुनौतियों से जूझ रहा है। यह केवल एक संरचना का सवाल नहीं, बल्कि पांच राज्यों की जल सुरक्षा, किसानों की सिंचाई और करोड़ों लोगों की पेयजल व्यवस्था का विषय है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार, सिंचाई विभाग और संबंधित एजेंसियां समय रहते स्थायी समाधान, नियमित रखरखाव, अवैध खनन पर सख्त रोक और वैज्ञानिक निगरानी सुनिश्चित करती हैं, तो इस महत्वपूर्ण बैराज को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। लेकिन यदि चेतावनी संकेतों की अनदेखी जारी रही, तो भविष्य में इसकी कीमत केवल हरियाणा ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत को चुकानी पड़ सकती है।