हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना का अग्निपरीक्षा दौर: 89 किमी का रेलखंड बना राष्ट्रीय परीक्षण केंद्र; जाने क्या है आगे का प्लान

Edited By Isha, Updated: 05 Aug, 2026 09:45 AM

89 km rail section becomes a national testing center

भारतीय रेलवे की महत्वाकांक्षी हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां इसकी सफलता या असफलता देश की भविष्य की रेल रणनीति तय करेगी। हरियाणा के जींद-सोनीपत रेलखंड

चंडीगढ़( चन्द्र शेखर धरणी): भारतीय रेलवे की महत्वाकांक्षी हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां इसकी सफलता या असफलता देश की भविष्य की रेल रणनीति तय करेगी। हरियाणा के जींद-सोनीपत रेलखंड पर शुरू की गई देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन केवल एक नई सेवा नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे के लिए ग्रीन ट्रांसपोर्ट तकनीक का सबसे बड़ा परीक्षण बन चुकी है। केंद्र सरकार ने पहली बार संसद में स्पष्ट किया है कि देश के अन्य रेल मार्गों पर हाइड्रोजन ट्रेनों का विस्तार इसी पायलट परियोजना के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा।

लोकसभा में सांसद पी.सी. मोहन के प्रश्न के लिखित उत्तर में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि फिलहाल यह परियोजना पायलट आधार पर संचालित की जा रही है। इसके परिचालन अनुभव, तकनीकी प्रदर्शन, रखरखाव, लागत और उपलब्ध संसाधनों का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद ही अन्य रेलखंडों पर हाइड्रोजन ट्रेनों के संचालन का निर्णय लिया जाएगा। इससे साफ हो गया है कि जींद-सोनीपत रेलखंड अब भारतीय रेलवे की हरित तकनीक की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन गया है।

89 किलोमीटर का रेलखंड बना राष्ट्रीय परीक्षण केंद्र
जींद से सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर लंबा रेलमार्ग अब केवल एक क्षेत्रीय रेललाइन नहीं रहा। इसी मार्ग पर यह परखा जाएगा कि हाइड्रोजन ईंधन आधारित ट्रेन भारतीय जलवायु, लंबी दूरी के परिचालन, नियमित संचालन और रखरखाव की चुनौतियों के बीच कितनी प्रभावी साबित होती है। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो हरियाणा के अन्य रेलमार्गों के साथ देश के कई गैर-विद्युतीकृत रेलखंडों पर भी ऐसी ट्रेनें चलाने का मार्ग प्रशस्त होगा।

शुरुआती परिचालन ने बढ़ाया रेलवे का भरोसा
रेल मंत्री ने संसद को बताया कि 17 जुलाई को सेवा शुरू होने के बाद 25 जुलाई तक हाइड्रोजन ट्रेन 89 किलोमीटर के सेक्शन पर 1,256 किलोमीटर का सफल व्यावसायिक संचालन पूरा कर चुकी है। परियोजना के लिए जींद में विशेष हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र स्थापित किया गया है, जबकि ईंधन भंडारण और आपूर्ति प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुरूप विकसित किया गया है। अब रेलवे परिचालन की निरंतरता, ईंधन दक्षता, रखरखाव लागत और तकनीकी विश्वसनीयता का विस्तृत अध्ययन करेगा।

तकनीक को साबित करना पहली प्राथमिकता
रेलवे ने फिलहाल इस परियोजना की लागत की तुलना डीजल ट्रेनों से करने से भी परहेज किया है। सरकार का कहना है कि अभी परियोजना शुरुआती चरण में है और जल्दबाजी में किसी आर्थिक निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। सबसे पहले यह सुनिश्चित किया जाएगा कि हाइड्रोजन तकनीक लंबे समय तक सुरक्षित, भरोसेमंद और आर्थिक रूप से व्यवहारिक साबित होती है या नहीं। इसके बाद ही बड़े पैमाने पर विस्तार की योजना बनाई जाएगी।

भारत की वैश्विक पहचान से भी जुड़ा है यह प्रयोग
यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारतीय रेलवे के अनुसार यह दुनिया की सबसे लंबी ब्रॉडगेज लाइन पर संचालित और सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेन परियोजनाओं में शामिल है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भारत स्वच्छ ऊर्जा आधारित रेल परिवहन के क्षेत्र में नई पहचान बनाएगा और गैर-विद्युतीकृत रेलखंडों के लिए एक व्यवहारिक एवं पर्यावरण-अनुकूल मॉडल दुनिया के सामने पेश कर सकेगा।

अब इस पायलट की सफलता पर टिकी हैं आगे की योजनाएं
रेलवे के ताजा रुख से स्पष्ट है कि हाइड्रोजन ट्रेन का भविष्य केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि परिचालन की वास्तविक सफलता पर निर्भर करेगा। जींद-सोनीपत रेलखंड पर मिलने वाले अनुभव ही तय करेंगे कि आने वाले वर्षों में भारत के किन-किन रेलमार्गों पर हाइड्रोजन ट्रेनों की सीटी सुनाई देगी। फिलहाल पूरे देश की नजर इस एक पायलट परियोजना पर टिकी है, जो भारतीय रेलवे के हरित भविष्य की दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है।


 

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