डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में बहुपक्षवाद को अनुच्छेद 51 में भारत के लिए मूलभूत राज्य-दायित्व के रूप में अंतर्निहित किया गया : डॉ. वुनदरू

Edited By Krishan Rana, Updated: 16 Apr, 2026 12:01 PM

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संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, न्यूयॉर्क में भारत के स्थायी मिशन द्वारा डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर पहली बार अमेरिका में

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, न्यूयॉर्क में भारत के स्थायी मिशन द्वारा डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर पहली बार अमेरिका में हरियाणा के वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी ए सी एस डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू हरियाणा व भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में बहुपक्षवाद को अनुच्छेद 51 में भारत के लिए एक मूलभूत राज्य-दायित्व के रूप में अंतर्निहित किया गया। इसने स्वतंत्र भारत को सहकारी अंतर्राष्ट्रीयवाद, वैश्विक विधि के प्रति सम्मान और शांतिपूर्ण संबंधों के प्रति प्रतिबद्ध किया- ऐसे सिद्धांत जो संयुक्त राष्ट्र और विश्व मामलों में भारत की भूमिका को आज भी प्रभावित करते हैं।
       
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि  डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, भारतीय संविधान को आकार देने में केंद्रीय भूमिका निभाते हुए, यूएन चार्टर और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में निहित यूएन आदर्शों के विकास से भली-भाँति परिचित थे। यह उस उल्लेखनीय ऐतिहासिक समयसंपातन के दौरान हुआ जब भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य था (30 अक्टूबर 1945 को शामिल हुआ) और संविधान सभा की बहसें वैश्विक मानवाधिकारों के द्वितीय विश्वयुद्ध-पश्चात प्रयास के समानांतर चलती रहीं।
     
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि यूडीएचआर का मसौदा 1947 और 1948 के बीच तैयार हुआ ठीक उसी समय जब भारत का संविधान अंतिम रूप ले रहा था। भारतीय प्रतिनिधियों ने, जिनमें हंसा मेहता भी थीं संविधान सभा की सदस्य जो मानवाधिकार पर यूएन आयोग में भी थीं-समानता, गैर-भेदभाव और महिला अधिकारों में योगदान किया। यूडीएचआर ने भारत की नागरिक स्वतंत्रताओं और सामाजिक न्याय की राष्ट्रवादी माँगों को नैतिक और अंतर्राष्ट्रीय वैधता प्रदान की।प्रस्तावना के मूल आदर्श "न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिकः विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रताः प्रतिष्ठा और अवसर की समताः तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता" संयुक्त राष्ट्र चार्टर की बारीकी से प्रतिध्वनि करते हैं। यद्यपि डॉ. अम्बेडकर ने पहले (1954 में) कहा था कि उन्होंने "स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व" फ्रांसीसी क्रांति की बजाय मुख्यतः बुद्ध से यहण किया, ये अवधारणाएँ यूएन सिद्धांतों के साथ पूरी तरह सामंजस्यपूर्ण थीं।
   
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि भारत के संविधान में मूल अधिकार सर्वाधिक प्रवर्तनीय और न्यायसंगत प्रावधान हैं-जैसे समानता और गैर-भेदभावः अस्पृश्यता का उन्मूलनः जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार; वाक्, सभा और संगठन की स्वतंत्रता; शोषण के विरुद्ध अधिकार; और अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार। डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में इन अधिकारों की न्यायोचितता का बार-बार बचाव करते हुए आग्रह किया कि सार्थक होने के लिए ये राज्य के विरुद्ध प्रवर्तनीय होने चाहिए जो सीधे यूएन की उस दृष्टि के अनुरूप है कि अधिकार वास्तविक हों, केवल आकांक्षात्मक नहीं।
      
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर का आजीवन संघर्ष मानव गरिमा के लिए था जो जाति-उत्पीड़न के उनके व्यक्तिगत अनुभवों, हाशिए पर धकेले गए समुदायों के लिए दृढ़ सुरक्षा उपायों, राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ "संवैधानिक नैतिकता" और सामाजिक लोकतंत्र पर बल. तथा इस विश्वास में निहित था कि अधिकार अमूर्त नहीं बल्कि सर्वाधिक हाशिए पर पड़े लोगों को ऊपर उठाने के औजार हैं।4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में प्रारूप संविधान प्रस्तुत करते हुए अम्बेडकर ने कहा
डॉ. अम्बेडकर का आजीवन संघर्ष मानव गरिमा के लिए था जो जाति-उत्पीड़न के उनके व्यक्तिगत अनुभवों, हाशिए पर धकेले गए समुदायों के लिए दृढ़ सुरक्षा उपायों, राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ "संवैधानिक नैतिकता" और सामाजिक लोकतंत्र पर बल. तथा इस विश्वास में निहित था कि अधिकार अमूर्त नहीं बल्कि सर्वाधिक हाशिए पर पड़े लोगों को ऊपर उठाने के औजार हैं।

 डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि  अम्बेडकर ने "संवैधानिक नैतिकता" से अपना अभिप्राय जॉर्ज योट का उद्धरण देकर प्राधिकारों के सभी सार्वजनिक कृत्यों की अप्रतिबंधित आलोचना और इसके साथ-साथ प्रत्येक नागरिक के मन में दलीय संघर्ष की कटुता के बीच यह पूर्ण विश्वास कि संविधान के रूप उसके विरोधियों की दृष्टि में भी उतने ही पवित्र हैं जितने उसकी अपनी ।"
2 दिसंबर 1952 को पूना जिला लॉ लाइब्रेरी को दिए अपने पुणे भाषण में अम्बेडकर ने कहा कि "लोकतंत्र के सफल संचालन की पूर्वशर्त संवैधानिक नैतिकता का पालन है। ऐसे कई लोग हैं जो संविधान को लेकर बहुत उत्साहित प्रतीत होते हैं। मैं नहीं हूँ। मैं उन लोगों के समूह में शामिल होने को तैयार हूँ जो संविधान का व्यवहार में सम्मान होते देखना चाहते हैं।"
    
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता और इस बहुपक्षीय दृष्टि के बीच संबंध अम्बेडकर के लिए एक दार्शनिक तादात्म्य है जो उसी मूलभूत आधार पर टिका है कि औपचारिक संस्थाएँ एक पोषित नैतिक दृष्टिकोण के बिना अपर्याप्त हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसका अर्थ है कि राज्यों द्वारा बहुपक्षीय मानदंडों का वास्तविक आंतरिकीकरण ही अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को नाममात्र नहीं बल्कि वास्तविक बनाता है। यूएन चार्टर और भारतीय संविधान असाधारण दस्तावेज हैं। दोनों ही मामलों में प्रश्न यह है कि क्या इसे संचालित करने के लिए आवश्यक सामाजिक और नैतिक आधारसंरचना निर्मित की गई है और जैसा अम्बेडकर कहते, इसे पोषित करना होता है। यह राज्यों के बीच उतनी ही स्वाभाविक भावना नहीं है जितनी नागरिकों के बीच ।
       
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि घरेलू स्तर पर संवैधानिक नैतिकता की अम्बेडकर की माँग और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुपक्षीय प्रतिबद्धता का उनका संविधानीकरण एक ही जीवित अनुभव से उपजा था उनकी यह समझ कि औपचारिक समानता तब तक निरर्थक है जब तक उसे वास्तविक बनाने वाली सामाजिक परिस्थितियाँ न हों।आज बहुपक्षवाद के लिए इस दृष्टि की प्रासंगिकता केवल ऐतिहासिक नहीं है - यह अत्यावश्यक है। 1945 के बाद निर्मित बहुपक्षीय व्यवस्था अपनी स्थापना के बाद से किसी भी समय की तुलना में अधिक दबाव में है। राष्ट्रों के बीच खुले, न्यायसंगत और सम्मानजनक संबंध जिन्हें अम्बेडकर ने भारत की आकांक्षाओं के रूप में संविधानीकृत किया।
    
  डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि यूएन चार्टर, भारतीय संविधान की तरह, अपने कार्य के लिए पर्याप्त है। समस्या यह है कि बहुपक्षवाद के आधार पर जिसे हम अंतर्राष्ट्रीय संवैधानिक नैतिकता कह सकते हैं, उसका अभाव है- राज्यों की यह पोषित प्रवृत्ति कि वे सामूहिक मानदंडों को वास्तव में बाध्यकारी मानें, संस्थागत रूपों का सम्मान करें, अंतर्राष्ट्रीय निकायों के प्रतिकूल निर्णयों को स्वीकार करें, और अल्पकालिक राष्ट्रीय लाभ को दीर्घकालिक संस्थागत अखंडता के अधीन रखें। यह प्रवृत्ति राज्यों में उतनी ही स्वाभाविक नहीं है जितनी नागरिकों में। इसे पोषित करना होता है। और उस पोषण के लिए ठीक उन्हीं पूर्वशर्तों की आवश्यकता है।
उसी तंत्र से क्षीण हो रहा है जिसके बारे में अम्बेडकर ने घरेलू स्तर पर चेताया था औपचारिक पाठ को बदलकर नहीं, बल्कि उसके अंतर्गत काम करने वाले आचरण के रूप को बदलकर।
        
  डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि इस संकट का जो उत्तर अम्बेडकर का दर्शन प्रस्तुत करता है वह बहुपक्षीय संलग्नता के दैनिक अभ्यास के माध्यम से है सामूहिक मानदंड-पालन की वे आदतें जो औपचारिक संस्थाओं को आधार देती हैं। यह इस आग्रह में निहित है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अपनी स्वयं की पूर्वशर्तों को गंभीरता से ले।इस परियोजना में भारत की एक विशेष जिम्मेदारी है क्योंकि अम्बेडकर ने इन प्रतिवद्धताओं को इसके संविधान में लिखा। अम्बेडकर की संवैधानिक नैतिकता की दृष्टि केवल भारत का अपने लिए उपहार नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के स्तर पर लागू होने पर यह इस बात का सर्वाधिक गहन और व्यावहारिक रूप से सुदृढ़ निदान है कि बहुपक्षीय परियोजना को वह बनने के लिए क्या चाहिए जो उसने सदा वादा किया है- न्याय और सद्भावना में, कानून के वास्तविक शासन के अंतर्गत, एक-दूसरे से व्यवहार करने वाले संगठित जनों का एक वास्तविक समुदाय ।
      
 डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि वह दृष्टि आज उतनी ही आवश्यक है जितनी 1948 में थी। और यह तब तक आवश्यक रहेगी जब तक हम अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में वह निर्मित नहीं कर लेते जो अम्बेडकर घरेलू क्षेत्र में निर्मित करना चाहते थे वे परिस्थितियाँ जिनमें औपचारिक समानता और वास्तविक समानता दो भिन्न चीजें नहीं रहें।

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