HC का बड़ा फैसला, 21 साल की उम्र होते ही किशोर अपराधी को सीधे जेल नहीं भेज सकते...जाने क्या है फैसले की वजह

Edited By Isha, Updated: 07 Aug, 2026 07:58 PM

a juvenile offender cannot be sent straight to jail upon turning 21

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने किशोर न्याय कानून (जूवेनाइल जस्टिस एक्ट) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी किशोर अपराधी को 21 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद

चंडीगढ़( चन्द्र शेखर धरणी):  पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने किशोर न्याय कानून (जूवेनाइल जस्टिस एक्ट) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी किशोर अपराधी को 21 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद सीधे जेल भेजने या उसकी शेष सजा तय करने से पहले उसके सुधार का समुचित मूल्यांकन करना अनिवार्य होगा। अदालत ने इसे कानून के तहत उपलब्ध एक महत्वपूर्ण सुरक्षा बताया है और पंजाब, हरियाणा तथा चंडीगढ़ की सभी चिल्ड्रन्स कोर्ट एवं स्पेशल पॉक्सो कोर्ट को निर्धारित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए हैं।

क्या कहा हाईकोर्ट ने

जस्टिस मनदीप पन्नू की पीठ ने कहा कि जेजे एक्ट के तहत 21 वर्ष की आयु पूरी करने वाले किशोर की रिहाई या आगे की सजा का फैसला उसके पुनर्वास और सुधार की समीक्षा के बाद ही किया जा सकता है। इस प्रक्रिया को केवल औपचारिकता नहीं माना जा सकता, बल्कि यह कानून की अनिवार्य शर्त है।

होशियारपुर के मामले में आई टिप्पणी

अदालत ने यह टिप्पणी होशियारपुर के एक मामले की सुनवाई के दौरान की। आरोपी अपराध के समय नाबालिग था, लेकिन उसका ट्रायल बालिग की तरह हुआ। अदालत ने पाया कि 21 वर्ष की आयु पूरी होने के बावजूद उसके व्यवहार और सुधार को लेकर कोई मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार नहीं की गई थी। इस कमी को देखते हुए हाईकोर्ट ने उसकी सजा निलंबित कर दी।

सुधार का आकलन करना होगा अनिवार्य

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 21 वर्ष की आयु पूरी होने पर संबंधित अदालत को प्रोबेशन अधिकारी, जिला बाल संरक्षण इकाई (डीसीपीयू) या सामाजिक कार्यकर्ता से रिपोर्ट मंगानी होगी। रिपोर्ट के आधार पर यह तय किया जाएगा कि संबंधित किशोर में कितना सुधार हुआ है और क्या वह समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए तैयार है।

रिपोर्ट के बाद ही होगा अंतिम फैसला

अदालत ने कहा कि मूल्यांकन रिपोर्ट मिलने के बाद ही यह निर्णय लिया जाएगा कि किशोर को शर्तों के साथ रिहा किया जाए या उसे शेष सजा जेल में पूरी करनी होगी। बिना इस प्रक्रिया के कोई भी निर्णय कानून की भावना के विपरीत माना जाएगा।

कानून का उद्देश्य सजा नहीं, पुनर्वास

अपने आदेश में जस्टिस मनदीप पन्नू ने कहा कि जेजे एक्ट का मूल उद्देश्य बच्चों को दंडित करना नहीं, बल्कि उनका सुधार, पुनर्वास और समाज में सम्मानजनक पुनर्स्थापन सुनिश्चित करना है। इसलिए अदालतों को इस संवेदनशील प्रक्रिया का पूरी गंभीरता से पालन करना चाहिए।

सभी अदालतों और न्यायिक अकादमी को भेजा जाएगा आदेश

हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि फैसले की प्रति पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ की सभी चिल्ड्रन्स कोर्ट, स्पेशल पॉक्सो कोर्ट तथा न्यायिक अकादमियों को भेजी जाए, ताकि भविष्य में किसी भी किशोर के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन न हो और जेजे एक्ट के प्रावधानों का एक समान पालन सुनिश्चित किया जा सके।

 

 

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