अंबाला छावनी से फिर गूंजेगा राष्ट्रवाद का संदेश, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर होगा प्रदेश का सबसे बड़ा आयोजन : अनिल विज

Edited By Krishan Rana, Updated: 05 Jul, 2026 01:10 PM

the message of nationalism will once again resonate from ambala cantt the state

हरियाणा के ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने कहा कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा के ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने कहा कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक एवं स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर इस वर्ष अंबाला छावनी पूरे प्रदेश में राष्ट्रवादी चेतना का केंद्र बनेगी।

उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने डॉ. मुखर्जी की ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़े अंबाला छावनी को इस वर्ष के जयंती अभियान का प्रमुख केंद्र बनाया है। इसी कड़ी में 6 जुलाई को प्रातः 9 बजे सुभाष पार्क के सामने भव्य प्रदेशस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तथा भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता, प्रदेश सरकार के मंत्री, सांसद, विधायक, संगठन पदाधिकारी तथा हजारों कार्यकर्ता भाग लेंगे। विज ने कहा कि यह केवल एक जयंती समारोह नहीं बल्कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति संकल्प का विराट आयोजन होगा।

अंबाला से जुड़ा है डॉ. मुखर्जी के अंतिम राष्ट्रवादी संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय
अनिल विज ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जब जम्मू-कश्मीर में लागू विशेष व्यवस्था के विरोध में दिल्ली से ऐतिहासिक यात्रा पर निकले थे, तब हरियाणा में उनका एकमात्र पड़ाव अंबाला छावनी था। यहां उन्होंने विशाल जनसभा को संबोधित किया, राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं से संवाद किया तथा कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते हुए अपने आंदोलन को नई दिशा दी।

उन्होंने कहा कि यही ऐतिहासिक संबंध अंबाला छावनी को विशेष पहचान देता है। इसलिए भाजपा ने इस बार डॉ. मुखर्जी की जयंती का सबसे महत्वपूर्ण प्रदेशस्तरीय आयोजन यहीं करने का निर्णय लिया है।

जनसंघ की स्थापना से भाजपा तक की वैचारिक विरासत
अनिल विज ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना कर देश में राष्ट्रवादी राजनीति की मजबूत नींव रखी। यही जनसंघ आगे चलकर जनता पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने कहा कि आज भाजपा जिस विचारधारा और संगठनात्मक शक्ति के साथ देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी है, उसकी आधारशिला डॉ. मुखर्जी ने ही रखी थी।

उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के साथ मिलकर डॉ. मुखर्जी ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय अस्मिता और आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाया।

"एक देश में दो प्रधान, दो विधान और दो निशान नहीं चलेंगे" केवल नारा नहीं, राष्ट्रीय संकल्प था

अनिल विज ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का सबसे बड़ा संघर्ष जम्मू-कश्मीर में लागू अलग संविधान, अलग झंडे और अलग व्यवस्था के विरुद्ध था। उनका प्रसिद्ध उद्घोष— "एक देश में दो प्रधान, दो विधान और दो निशान नहीं चलेंगे" केवल राजनीतिक नारा नहीं बल्कि भारत की अखंडता का राष्ट्रीय संकल्प था।

उन्होंने कहा कि उस समय जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए भारतीय नागरिकों को भी परमिट लेना पड़ता था। डॉ. मुखर्जी ने इसका खुलकर विरोध किया और कहा कि जब कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो वहां जाने के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं हो सकती।
इसी संकल्प के साथ वे दिल्ली से रवाना हुए, अंबाला पहुंचे, यहां जनसभा की और फिर आगे बढ़े। 11 मई 1953 को उन्हें जम्मू-कश्मीर में गिरफ्तार कर लिया गया। श्रीनगर में नजरबंदी के दौरान 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। विज ने कहा कि उनका बलिदान भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है।

केवल 52 वर्ष की आयु में अमर हो गए डॉ. मुखर्जी
अनिल विज ने कहा कि संसार में ऐसे विरले व्यक्तित्व ही होते हैं जो अल्पायु में ही इतिहास पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मात्र 52 वर्ष का जीवन जिया, लेकिन राष्ट्रहित के लिए उनका समर्पण उन्हें अमर बना गया।
उन्होंने कहा कि उनके सबसे निकट सहयोगी पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन भी अल्पकालिक रहा और दोनों महान विभूतियों की मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में हुई। इसके बावजूद उनके विचार आज भी करोड़ों भारतीयों को प्रेरित कर रहे हैं।

देश के औद्योगिक विकास की दूरदर्शी सोच रखने वाले प्रथम उद्योग मंत्री थे डॉ. मुखर्जी
अनिल विज ने कहा कि स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री के रूप में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, लेकिन इतिहास में उसे अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी मिश्रित अर्थव्यवस्था के समर्थक थे। उनका मानना था कि सरकार और निजी क्षेत्र दोनों मिलकर देश के औद्योगिक विकास को गति दें। रक्षा, आधारभूत ढांचे और रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार की भूमिका हो, जबकि अन्य क्षेत्रों में निजी निवेश को प्रोत्साहन दिया जाए।

विज ने कहा कि उस समय जब वर्ग संघर्ष और साम्यवादी विचारधारा का व्यापक प्रचार हो रहा था, तब डॉ. मुखर्जी ने श्रमिक और पूंजी के बीच सहयोग का मार्ग अपनाने पर बल दिया। उनका मानना था कि उद्योगों का विकास तभी संभव है जब श्रमिकों को सम्मान, सुरक्षा और भागीदारी मिले।
 

श्रमिक हितों के भी बड़े समर्थक थे डॉ. मुखर्जी
श्रम मंत्री अनिल विज ने कहा कि डॉ. मुखर्जी श्रमिकों के कल्याण और उद्योगों की प्रगति को एक-दूसरे का पूरक मानते थे। वे श्रमिकों को उद्योगों की प्रगति में सहभागी बनाने, लाभ में हिस्सेदारी देने तथा सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि श्रमिक और उद्योगपति परस्पर सहयोग से ही आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर सकते हैं।
राष्ट्र निर्माण के प्रेरणा पुरुष हैं डॉ. मुखर्जी : विज
अनिल विज ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन राष्ट्रभक्ति, त्याग, सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा और राष्ट्रीय एकता का सर्वोच्च उदाहरण है। उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।

उन्होंने कहा कि 6 जुलाई को अंबाला छावनी में आयोजित होने वाला प्रदेशस्तरीय समारोह केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं होगा, बल्कि भारत की एकता, अखंडता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवाद के प्रति नए संकल्प का ऐतिहासिक अवसर बनेगा। हजारों कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में यह आयोजन डॉ. मुखर्जी के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बनेगा।

अंबाला और डा. मुखर्जी का 72 साल पुराना रिश्ता*

8 मई 1953  
दिल्ली से कश्मीर की ओर निकले डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपनी ट्रेन से अंबाला छावनी स्टेशन पर उतरे। 

अनाज मंडी में हुंकार  
यहां उन्होंने एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। उनका साफ संदेश था - कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और वहां अनुच्छेद 370 देश की एकता के खिलाफ है।

कार्यकर्ताओं के घर  
सभा के बाद वे अंबाला के कुछ वरिष्ठ जनसंघ कार्यकर्ताओं के घर भी गए। रात यहीं बिताई।

9 मई 1953  
अगले दिन अंबाला से पंजाब होते हुए वे कश्मीर के लिए रवाना हुए।

11 मई 1953  
कश्मीर सीमा पर उन्हें बिना परमिट प्रवेश के कारण गिरफ्तार कर लिया गया।

23 जून 1953  
श्रीनगर जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया।

6 जुलाई 2026  
ठीक 72 साल बाद, उसी अंबाला छावनी की धरती पर उनकी जयंती का प्रदेशस्तरीय कार्यक्रम। मुख्य अतिथि होंगे जेपी नड्डा।


 

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