घर लौटने की उम्मीद में गुरुग्राम में प्रवासी रोजाना सामान लेकर रेलवे स्टेशन जाते है

Edited By PTI News Agency, Updated: 19 May, 2020 04:23 PM

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: गुंजन शर्मा :

: गुंजन शर्मा :
गुरुग्राम, 19 मई (भाषा)
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में अपने घर लौटने की चाह में 42 वर्षीय लाल बाबू का परिवार बाल्टी में बर्तन भरकर और अन्य सामान लेकर रोजाना मानेसर से गुड़गांव रेलवे स्टेशन पैदल चलकर जाता है और हर बार उसे नाउम्मीद होकर वापस आना पड़ता है।

बाबू का कहना है कि उसके पांच लोगों के परिवार ने भिवाड़ी से आने से पहले एक स्वयंसेवी के माध्यम से श्रमिक विशेष ट्रेन के लिए पंजीकरण कराया था। हालांकि अब उनके पास कोई नंबर या दस्तावेज नहीं है।

लाल बाबू ने पीटीआई-भाषा को बताया, “तीन हफ्ते पहले, मैंने भिवाड़ी में खाना वितरित किए जा रहे एक स्थान पर एक स्वयंसेवी लड़के से मदद मांगी थी। अब तो खाना मिलना भी बंद हो गया, वह सब लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में होता था। उसने कहा था कि हमारा पंजीकरण हो गया है और हम गुड़गांव से ट्रेन में सवार हो पाएंगे। हम पास के मानेसर में फ्लाईओवर के नीचे रुके हुए हैं क्योंकि गुड़गांव में पुलिस हमें वहां रहने नहीं देगी।”
बाबू का परिवार अपने सामान के साथ रोजाना रेलवे स्टेशन जाता है क्योंकि अगर उन्हें ट्रेन मिल गई तो वे सामान लेने वापस नहीं आ सकते और न सामान छोड़ सकते हैं।

लाल बाबू की तरह ही कई अन्य प्रवासी श्रमिक हैं जिन्हें अपने पंजीकरण का कुछ पता नहीं है और न ही इस बात का कि उन्हें घर लौटने का मौका कब मिलेगा।

उसने कहा, “हम रोजाना इस उम्मीद में स्टेशन जाते हैं कि वे हमें जाने देंगे। मैं हर दिन स्टेशन पर पुछता हूं कि मेरा नाम सूची में आया या नहीं और वे हमसे लौटने और वहां नहीं आने को कहते हैं। वे कहते हैं कि सरकार बहुत कुछ कर रही है लेकिन ‘हम तो अब भी यहीं हैं’।”
लाल बाबू के परिवार के साथ एक अन्य व्यक्ति भारत कुमार भी है जो सोहना में मजदूरी करता था।

उसने कहा, “मेरे ठेकेदार ने मेरा बकाया नहीं दिया और कमरा खाली करने को भी कह दिया। मेरी पत्नी और बेटा बिहार में मेरा इंतजार कर रहे हैं लेकिन मेरे पास वहां पहुंचने का साधन नहीं है। मेरे बेटे ने मुझसे फोन पर कहा कि उन्होंने टीवी पर हर किसी को घर लौटते देखा है और मैं क्यों नहीं आ जाता। मैंने उससे कहा कि मैं बहुत दूर हूं और इतना लंबा सफर पैदल नहीं कर पाउंगा।”
कपड़े से मुंह ढके दो बच्चे रेलवे स्टेशन के प्रवेश के बाहर इंतजार करते हए बताते हैं कि उनके मां-बाप ट्रेन का पता करने अंदर गए हैं।

उनकी मां अटारी देवी कहती है, “कोई उम्मीद नहीं है कि हम लौटकर आएंगे और सारे बर्तन फिर से खरीदना हमारे लिए मुश्किल होगा इसलिए हम सब समेट कर ले जा रहे हैं। कई ट्रेनें जा रही हैं लेकिन हमारी ट्रेन नहीं। हमें किसी और इलाके में जाकर इंतजार करना होगा क्योंकि यहां पुलिस हमें रुकने नहीं देगी।”
पिछले हफ्ते से लेकर अबतक हजारों प्रवासी मजदूर श्रमिक स्पेशल ट्रेनों और रोडवेज की बसों से घर रवाना हुए हैं लेकिन अब भी ढेर सारे अपना नंबर आने के इंतजार में हैं।



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