'गब्बर' ने बनाई अलग मिसाल...हरियाणा के पहले ऐसे कैबिनेट मंत्री जिन्होंने नहीं ली सरकारी कोठी, जनता की सुविधाओं को दी प्राथमिकता

Edited By Krishan Rana, Updated: 11 Jul, 2026 03:22 PM

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हरियाणा का गठन 1 नवंबर 1966 को हुआ था। पिछले लगभग छह दशकों में प्रदेश की राजनीति में मंत्री बनने के बाद सरकारी कोठी लेना

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा का गठन 1 नवंबर 1966 को हुआ था। पिछले लगभग छह दशकों में प्रदेश की राजनीति में मंत्री बनने के बाद सरकारी कोठी लेना एक सामान्य परंपरा रही है। अक्सर विधायक के मंत्री बनने की चर्चा शुरू होते ही राजधानी चंडीगढ़ में बेहतर सरकारी आवास की तलाश भी शुरू हो जाती है।

मुख्यमंत्री आवास के आसपास स्थित सेक्टर-5, सेक्टर-7 और सेक्टर-16 की कोठियां हमेशा मंत्रियों की पहली पसंद रही हैं। वरिष्ठता और पद के अनुसार इन आवासों का आवंटन होता है और इन्हें सत्ता के प्रभाव का प्रतीक भी माना जाता है।

लेकिन हरियाणा की राजनीति में एक ऐसा भी चेहरा है जिसने इस परंपरा से बिल्कुल अलग रास्ता चुना। ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज पिछले साढ़े 11 वर्षों से लगातार कैबिनेट मंत्री हैं, लेकिन उन्होंने आज तक न तो मंत्री की सरकारी कोठी ली और न ही कभी एमएलए फ्लैट का उपयोग किया। वे प्रतिदिन अंबाला छावनी से चंडीगढ़ पहुंचकर सरकारी कार्यों का निर्वहन करते हैं और कार्य समाप्त होने के बाद वापस अपने विधानसभा क्षेत्र लौट जाते हैं।

3 सरकारें, तीन बार मंत्री, फिर भी नहीं लिया सरकारी आवास
वर्ष 2014 में हरियाणा में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने अपने दम पर सरकार बनाई। उस सरकार में अनिल विज वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री बने। इसके बाद वर्ष 2019 और फिर 2024 में भी वे लगातार कैबिनेट मंत्री रहे। सत्ता के शीर्ष पर रहने और वरिष्ठता के बावजूद उन्होंने कभी सरकारी मंत्री आवास लेने की इच्छा नहीं जताई।
हरियाणा गठन के बाद के राजनीतिक इतिहास में यह एक दुर्लभ उदाहरण माना जाता है कि कोई वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री इतने लंबे समय तक बिना सरकारी कोठी के अपनी जिम्मेदारियां निभाता रहा हो।

जनप्रतिनिधि की असली ताकत जनता के बीच रहना
अनिल विज का मानना रहा है कि किसी भी जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी ताकत उसका जनता के बीच लगातार मौजूद रहना है। यही कारण है कि उन्होंने चंडीगढ़ में स्थायी रूप से रहने के बजाय अपने विधानसभा क्षेत्र अंबाला छावनी को ही अपना केंद्र बनाए रखा।
उनकी दिनचर्या आज भी लगभग वैसी ही है जैसी वर्षों पहले थी। सुबह अंबाला से चंडीगढ़ आना, मंत्रालय और विभागों का काम निपटाना तथा शाम को वापस अपने क्षेत्र लौट जाना उनके सार्वजनिक जीवन का नियमित हिस्सा है।

37 वर्ष की आयु में बने थे पहली बार विधायक
अनिल विज का राजनीतिक सफर संघर्ष, संगठन और जनसेवा से शुरू हुआ। 27 मई 1990 को सातवीं हरियाणा विधानसभा की दो रिक्त सीटों पर उपचुनाव हुए। उस समय ओम प्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री थे। अंबाला छावनी सीट से 37 वर्षीय अनिल कुमार विज पहली बार विधायक निर्वाचित हुए।
बैंक की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए अनिल विज ने बहुत कम समय में अपनी अलग पहचान बना ली। उनका राजनीतिक जीवन शुरू से ही जनसंघर्ष, आंदोलन और जनता के मुद्दों से जुड़ा रहा।

निर्दलीय चुनाव जीते, फिर भाजपा में वापसी कर बनाया नया इतिहास
अनिल विज का राजनीतिक जीवन कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा। वर्ष 1996 और 2000 के विधानसभा चुनाव उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीते, जिसने उनके मजबूत जनाधार को साबित किया। वर्ष 2005 में वे मात्र 615 मतों से चुनाव हार गए।
इसके बाद वर्ष 2007 में उन्होंने "विकास परिषद" के नाम से राजनीतिक दल का पंजीकरण कराया। हालांकि उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता भाजपा के साथ बनी रही। वर्ष 2009 में भाजपा नेतृत्व ने उन्हें फिर पार्टी का उम्मीदवार बनाया और इसके बाद उन्होंने लगातार सफलता का नया अध्याय लिखा।
2009, 2014, 2019 और 2024 में वे भाजपा के टिकट पर लगातार चार बार विधायक निर्वाचित हुए। इसके साथ ही वे कुल सातवीं बार विधानसभा पहुंचे और हरियाणा के सबसे वरिष्ठ विधायकों में शामिल हो गए।

सत्ता नहीं, जनसंपर्क बना सबसे बड़ा आधार
अनिल विज की राजनीति का सबसे मजबूत पक्ष उनका निरंतर जनसंपर्क माना जाता है। सत्ता मिलने के बाद भी उन्होंने जनता से दूरी नहीं बनाई। वे आज भी अंबाला छावनी में आम नागरिकों, व्यापारियों, सामाजिक संगठनों और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उसी सहजता से उपलब्ध रहते हैं जैसे अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही निरंतर संपर्क उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है।

टी-प्वाइंट आज भी राजनीतिक संवाद का केंद्र
अंबाला छावनी का प्रसिद्ध टी-प्वाइंट अनिल विज की सार्वजनिक जीवन शैली का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पिछले लगभग पांच दशकों से वे यहां नियमित रूप से लोगों से मिलते हैं। यहां आने वाले नागरिक अपनी समस्याएं सीधे उनके सामने रखते हैं और विज भी बिना औपचारिकता के उनसे संवाद करते हैं। यह परंपरा चुनावी मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

सादगी बनी राजनीतिक पहचान
आज जब राजनीति में सरकारी सुविधाओं और सत्ता के प्रतीकों को विशेष महत्व दिया जाता है, ऐसे समय में अनिल विज का सरकारी कोठी और एमएलए फ्लैट से दूरी बनाए रखना उन्हें अलग पहचान देता है। उन्होंने अपने आचरण से यह संदेश देने का प्रयास किया है कि जनप्रतिनिधि की वास्तविक पहचान सरकारी आवास या सुविधाओं से नहीं, बल्कि जनता के साथ उसके विश्वास, उपलब्धता और निरंतर संवाद से बनती है।

हरियाणा की राजनीति में उनका यह निर्णय केवल व्यक्तिगत सादगी का उदाहरण नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में जनसंपर्क को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की एक अलग कार्यशैली के रूप में भी देखा जाता है।

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