Edited By Harman, Updated: 30 Jun, 2026 01:46 PM
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश महाबीर सिंह सिंधु का निधन न्यायपालिका के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। अपने न्यायिक जीवन में उन्होंने केवल मामलों का निस्तारण ही नहीं किया, बल्कि अनेक ऐसे ऐतिहासिक फैसले दिए, जिन्होंने न्यायिक...
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी) : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश महाबीर सिंह सिंधु का निधन न्यायपालिका के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। अपने न्यायिक जीवन में उन्होंने केवल मामलों का निस्तारण ही नहीं किया, बल्कि अनेक ऐसे ऐतिहासिक फैसले दिए, जिन्होंने न्यायिक व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों को नई मजबूती प्रदान की। उनके निधन से न्यायिक जगत, अधिवक्ताओं और विधि विशेषज्ञों में शोक की लहर है।
जस्टिस सिंधु की पहचान एक ऐसे न्यायाधीश के रूप में रही, जिन्होंने कानून की कठोरता के साथ मानवीय संवेदनाओं का भी समान रूप से सम्मान किया। उनके फैसलों में संविधान की मूल भावना, निष्पक्षता और पारदर्शिता स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। अदालत में उनकी कार्यशैली शांत, संतुलित और तथ्यों पर आधारित रहती थी। वे प्रत्येक पक्ष को पूरा अवसर देने, रिकॉर्ड का गहन अध्ययन करने और संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट आदेश लिखने के लिए जाने जाते थे।
किसान परिवार से हाईकोर्ट तक का प्रेरक सफर
4 अप्रैल 1967 को तत्कालीन हिसार (वर्तमान हांसी) जिले के मसूदपुर गांव में किसान परिवार में जन्मे महाबीर सिंह सिंधु ने प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी विद्यालय से प्राप्त की। पंजाब विश्वविद्यालय से विधि की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में वकालत शुरू की। भारत सरकार, हरियाणा सरकार, पंजाब सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन के लिए विभिन्न महत्वपूर्ण कानूनी दायित्व निभाने के बाद वर्ष 2017 में उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। उच्च पद पर पहुंचने के बावजूद उनका गांव और समाज से जुड़ाव हमेशा बना रहा।
जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उठाए अहम सवाल
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की लंबी पूछताछ से जुड़े एक मामले में जस्टिस सिंधु की टिप्पणी पूरे देश में चर्चा का विषय बनी थी। उन्होंने कहा था कि 14-15 घंटे तक लगातार पूछताछ सामान्य जांच प्रक्रिया नहीं कही जा सकती। अदालत ने जांच एजेंसियों को अधिकारियों के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण तथा पूछताछ के मानकों को और बेहतर बनाने पर विचार करने की सलाह भी दी। इस फैसले ने नागरिक गरिमा और जांच एजेंसियों की शक्तियों के बीच संतुलन को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी।
रिमांड पर दिया न्यायिक स्वतंत्रता का संदेश
धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) से जुड़े मामलों में उन्होंने स्पष्ट किया कि विशेष अदालतें केवल जांच एजेंसी की मांग के आधार पर रिमांड मंजूर नहीं कर सकतीं। प्रत्येक आवेदन का स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक परीक्षण आवश्यक है। उनके इस दृष्टिकोण को न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना गया।
नागरिक अधिकारों की सुरक्षा को दी प्राथमिकता
एनडीपीएस अधिनियम के एक मामले में उन्होंने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी से पहले कानून में निर्धारित प्रत्येक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता को सीमित करने से पहले उसे गिरफ्तारी के आधार विधिवत बताना और कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करना आवश्यक है। इस निर्णय को नागरिक अधिकारों की रक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जाता है।
भर्ती प्रक्रियाओं में तय की जवाबदेही
सरकारी भर्ती मामलों में भी जस्टिस सिंधु ने पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। हरियाणा लोक सेवा आयोग द्वारा दिव्यांग पूर्व सैनिक के आश्रित को आरक्षण का लाभ नहीं देने पर आयोग पर 10 लाख रुपये की लागत लगाई गई। वहीं, हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग को एक महिला अभ्यर्थी की नियुक्ति में अनावश्यक देरी करने पर तीन लाख रुपये का हर्जाना देने का निर्देश दिया। इन फैसलों ने स्पष्ट संदेश दिया कि प्रशासनिक लापरवाही का नुकसान आम नागरिकों को नहीं उठाना पड़ेगा।
संवैधानिक मूल्यों के प्रहरी थे जस्टिस सिंधु
उनके अधिकांश निर्णयों में तीन प्रमुख सिद्धांत दिखाई देते हैं—संवैधानिक अधिकारों की रक्षा, सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही और समयबद्ध न्याय। सेवा मामलों में उन्होंने विभागों को कारणयुक्त आदेश जारी करने और निर्धारित समय सीमा में निर्णय लेने के निर्देश दिए। भूमि अधिग्रहण सहित कई मामलों में भी उन्होंने तकनीकी बाधाओं की बजाय न्यायसंगत समाधान को प्राथमिकता दी।
फैसलों के माध्यम से हमेशा याद किए जाएंगे
जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु का जीवन न्याय, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति समर्पित रहा। उनके फैसले आने वाले वर्षों में भी न्यायिक विमर्श, विधि शिक्षा और अदालतों के लिए मार्गदर्शक बने रहेंगे। उनका निधन एक युग का अंत जरूर है, लेकिन उनकी न्यायिक विरासत हमेशा जीवित रहेगी।
क्या बोले वरिष्ठ अधिवक्ता
"जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु का निधन न्यायपालिका के लिए अपूरणीय क्षति है। वे केवल विद्वान न्यायाधीश ही नहीं, बल्कि अत्यंत विनम्र, धैर्यवान और निष्पक्ष व्यक्तित्व के धनी थे। अदालत में वे हर पक्ष को पूरा अवसर देते थे और उनके आदेश हमेशा कानून एवं तथ्यों पर आधारित होते थे। उनकी न्यायिक कार्यशैली युवा अधिवक्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत रहेगी। उनका जाना पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और पूरे विधिक समुदाय के लिए ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी।" संजीव कोडान, वरिष्ठ अधिवक्ता, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट