गांव की गलियों से हार्वर्ड तक...हरियाणा के देवेश को अमेरिका की UAP साइंस एडवाइजरी काउंसिल में मिली अहम जिम्मेदारी

Edited By Harman, Updated: 09 Jul, 2026 06:48 PM

devesh from haryana gets a key role in the us uap science advisory council

हरियाणा के पानीपत जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों तक पहुंचने वाले डॉ़ देवेश नांदल की कहानी किसी प्रेरणादायक फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। बचपन में जूडो के मैट पर अपने दमखम का लोहा मनवाने वाला यह युवा...

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी) :  हरियाणा के पानीपत जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों तक पहुंचने वाले डॉ़ देवेश नांदल की कहानी किसी प्रेरणादायक फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। बचपन में जूडो के मैट पर अपने दमखम का लोहा मनवाने वाला यह युवा आज अंतरिक्ष विज्ञान के सबसे जटिल सवालों के जवाब खोज रहा है। 

37 वर्षीय डॉ़ नांदल को अमेरिका की प्रतिष्ठित यूएपी साइंस एडवाइजरी काउंसिल का सदस्य चुना गया है। यह वही परिषद है, जो रहस्यमयी हवाई घटनाओं (यूएपी) और पृथ्वी के बाहर संभावित जीवन से जुड़े मामलों का वैज्ञानिक अध्ययन करेगी। जरूरत पड़ने पर यही परिषद व्हाइट हाउस, पेंटागन, एफबीआई और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को भी वैज्ञानिक सलाह देगी। गांव की मिट्टी से निकलकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के केंद्र तक पहुंचने वाले देवेश की यह उपलब्धि हरियाणा ही नहीं, पूरे देश के लिए गर्व का विषय बन गई है।

आज जब ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले युवा संसाधनों की कमी को अपनी सबसे बड़ी बाधा मानते हैं, तब देवेश नांदल की कहानी यह संदेश देती है कि प्रतिभा, मेहनत और सीखने की ललक किसी भी दूरी को छोटा कर सकती है। संभव है कि आने वाले वर्षों में जब दुनिया एलियन जीवन या ब्रह्मांड के किसी बड़े रहस्य पर नई खोज की बात करेगी, तब उस खोज के पीछे हरियाणा के इस वैज्ञानिक का भी महत्वपूर्ण योगदान दर्ज हो।

मैट से माइक्रोस्कोप तक...सपना बदला, जुनून नहीं

देवेश नांदल का शुरुआती जीवन किसी आम ग्रामीण परिवार के बच्चे की तरह बीता। स्कूल की पढ़ाई के साथ उनकी सबसे बड़ी पहचान जूडो खिलाड़ी के रूप में थी। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर जूडो में सफलता हासिल की और ब्लैक बेल्ट (फर्स्ट डैन) भी प्राप्त की। खेलों ने उन्हें अनुशासन, धैर्य और लगातार संघर्ष करना सिखाया। यही गुण आगे चलकर उनकी वैज्ञानिक यात्रा की सबसे बड़ी ताकत बने। बाद में विज्ञान के प्रति बढ़ती जिज्ञासा ने उन्हें इंजीनियरिंग की ओर मोड़ दिया और यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।

इंजीनियरिंग से हार्वर्ड तक का लंबा सफर

देवेश ने ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद स्वीडन के केटीएच और स्विट्जरलैंड के ईटीएच ज्यूरिख से मास्टर्स किया। फिर स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ जिनेवा से एस्ट्रोफिजिक्स में पीएचडी पूरी की। इस दौरान उन्होंने शुरुआती ब्रह्मांड, विशाल तारों, ब्लैक होल और तारों के विकास पर महत्वपूर्ण शोध किए। उनका शोध केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में भी चर्चा का विषय बना। फिलहाल वह हार्वर्ड विश्वविद्यालय और हार्वर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स में एसएनएसएफ हार्वर्ड फेलो के रूप में कार्यरत हैं। यहां उनका शोध शुरुआती ब्रह्मांड के सुपरमैसिव तारों और ब्लैक होल के निर्माण पर केंद्रित है।

क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं!

डॉ़ नांदल को जिस यूएपी साइंस एडवाइजरी काउंसिल में शामिल किया है, उसका गठन हार्वर्ड के प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक प्रोफेसर एवी लोएब ने किया है। हाल के वर्षों में अमेरिका में यूएफओ और यूएपी से जुड़ी घटनाओं ने दुनियाभर का ध्यान खींचा है। अब इन घटनाओं का विश्लेषण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया जाएगा। परिषद का उद्देश्य यह पता लगाना है कि रहस्यमयी हवाई घटनाओं के पीछे प्राकृतिक कारण हैं, नई तकनीक है या फिर किसी अन्य प्रकार की व्याख्या संभव है। साथ ही, पृथ्वी के बाहर जीवन की संभावनाओं से जुड़े वैज्ञानिक प्रमाणों का भी अध्ययन किया जाएगा। इस परिषद में शामिल वैज्ञानिकों की राय सीधे अमेरिकी नीति निर्माताओं तक पहुंचेगी।

दुनिया में गूंज चुका है उनका शोध

डॉ़ देवेश नांदल का शोध पहले भी वैश्विक स्तर पर सुर्खियां बटोर चुका है। उन्होंने ऐसे सुपरमैसिव तारों पर अध्ययन किया है, जो शुरुआती ब्रह्मांड में विशाल ब्लैक होल बनने की प्रक्रिया को समझने में मदद करते हैं। उनका शोध जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (जेडब्ल्यूएसटी) से मिले आंकड़ों की व्याख्या में भी महत्वपूर्ण माना गया है। उनके वैज्ञानिक शोधों को कई अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिकाओं और संस्थानों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। उनके नाम 27 से अधिक वैज्ञानिक प्रकाशन दर्ज हैं। 

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