44 साल पुराने 32 कनाल जमीन विवाद का अंत, हाई कोर्ट ने खारिज की अपील... जानिए क्या था केस

Edited By Isha, Updated: 24 Jun, 2026 04:16 PM

44 year old dispute over 32 kanals of land resolved

हरियाणा में 32 कनाल भूमि के आवंटन से जुड़ा करीब 44 साल पुराना विवाद आखिरकार खत्म हो गया है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि अगर किसी ने रिकॉर्ड में हेराफेरी औ

चंडीगढ़: हरियाणा में 32 कनाल भूमि के आवंटन से जुड़ा करीब 44 साल पुराना विवाद आखिरकार खत्म हो गया है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि अगर किसी ने रिकॉर्ड में हेराफेरी और धोखाधड़ी के जरिए लाभ कमाया है, तो वह प्राकृतिक न्याय का हवाला देकर उस लाभ को बचा नहीं सकता।

कोर्ट ने एक महिला की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले पर मुहर लगा दी है। जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने यमुनानगर निवासी द्रौपदी देवी के कानूनी उत्तराधिकारियों के माध्यम से दायर अपील को खारिज करते हुए एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा। खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि जब रिकॉर्ड में धोखाधड़ी और भुगतान में चूक साबित हो चुकी है तो 36 साल बाद नए आवंटन को चुनौती देने का कोई आधार नहीं बनता। कोर्ट ने साफ कर दिया कि जो खुद गलत तरीके से काम करे, वह बाद में नियमों का सहारा लेकर लाभ नहीं उठा सकता।

कैसे हुआ था कागजी खेल
मामला 1981 का है। उस वक्त नीलामी के लिए जमीन का आरक्षित मूल्य 11,200 रुपए तय किया गया था, लेकिन बोली लगाने वाले ने सिर्फ 6000 रुपए की बोली लगाई, जो आरक्षित मूल्य से काफी कम थी। अधिकारियों ने शुरुआत में इसे स्वीकार नहीं किया। इसके बाद जो हुआ वह सरकारी दस्तावेजों के साथ बड़ा खिलवाड़ था। रिकॉर्ड में काट छांट की गई और आरक्षित मूल्य को 11200 रुपए से घटाकर मात्र 1352 रुपए दिखा दिया गया। स्याही का रंग बदलकर की गई यह हेराफेरी दस्तावेजों में साफ दिखाई दी। इसी फर्जीवाड़े के दम पर 6000 रुपए की बोली को वैध बताकर जमीन आवंटित कर दी गई।

कोर्ट ने क्यों खारिज की अपील
 धोखाधड़ी का आधारः जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में बदलाव का एकमात्र उद्देश्य आवंटी को लाभ पहुंचाना था। धोखाधड़ी से प्राप्त किसी भी लाभको कोर्ट संरक्षण नहीं दे सकता।

किस्तें जमा करने में लापरवाही
आवंटी ने 1986 के बाद से किस्तों का भुगतान ही बंद कर दिया था। नियम के अनुसार लगातार दो किस्तें न देने पर जमीन सरकार के पास वापस जानी थी।
1988 में जब जमीन दोबारा नीलाम हुई तो किसी दूसरे व्यक्ति ने 32000 रुपये की ऊंची बोली लगाकर उसे हासिल कर लिया। दशकों बाद बकाया राशि जमा करने का प्रयास किया गया लेकिन कोर्ट ने कहा कि तब तक जमीन का नया आवंटन वैध हो चुका था।

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