हरियाणा के 14 जिलों में पाताल में पहुंचा पानी, 141 ब्लॉक में से 85 को रेड जोन में रखा

Edited By vinod kumar, Updated: 11 Sep, 2021 02:59 PM

water reached hades in 14 districts of haryana

हरियाणा के 14 जिलों में पानी पाताल में चला गया है। 141 ब्लॉक में से 85 ब्लॉक को रेड जोन में रखा गया है। अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, हिसार, झज्जर, भिवानी, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, सिरसा, सोनीपत, पानीपत और जींद जिले इस श्रेणी में है। 64 ब्लॉक डार्क...

चंडीगढ़ (धरणी): हरियाणा के 14 जिलों में पानी पाताल में चला गया है। 141 ब्लॉक में से 85 ब्लॉक को रेड जोन में रखा गया है। अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, हिसार, झज्जर, भिवानी, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, सिरसा, सोनीपत, पानीपत और जींद जिले इस श्रेणी में है। 64 ब्लॉक डार्क जोन श्रेणी में रखे गए हैं। हरियाणा सरकार द्वारा तरह तरह की योजनाओं के चलते किसानों को धान से भिन्न खेती की ओर आकर्षित करने के लिए चलाई गई है। 

जल विशेषज्ञों के अनुसार प्रदेश में बीते 42 साल में 60 फुट भूजल स्तर नीचे जा पहुंचा है। वर्ष 2000 में भूजल औसतन 31 फीट पर था। अब कुछ जिलों में 88 फीट से भी नीचे जा पहुंचा है। कुछ जिलों के शहरी क्षेत्रों में भूजल 120 फीट से भी नीचे दर्ज किया गया है। प्रदेश का 60 फीसदी इलाका डार्क जोन में शामिल हो चुका है। बिगड़े हालातों को देखते हुए ही कृषि क्षेत्र में लंबे समय तक बिजली कनेक्शन ना दिए जाने का फैसला लिया गया था। साथ ही साथ ड्रिप सिस्टम और फुवारा विधि पर भारी सब्सिडी की योजना का लक्ष्य भी यही है। लगातार बिगड़ते हालातों को सरकार ने क्रांतिकारी कदम उठाने का फैसला ले लिया है।

हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण की चेयरपर्सन केशनी आनंद अरोड़ा ने बताया कि प्रदेश सरकार ने पहले भी कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं। मेरा पानी मेरी विरासत भी इसका एक हिस्सा है। जिसके चलते हम प्रदेश के किसानों को धान की खेती की बजाय बाजरा इत्यादि की खेती की तरफ कदम बनाने के लिए कई प्रकार के लाभ दे रहे हैं। क्योंकि धान हमारे भूजल को लगातार कम कर रही है। ग्राउंड वाटर को बचाने के लिए हमें अपनी खेती में बदलाव करना पड़ेगा। जिसके चलते सरकार ने प्रोत्साहन राशि भी निर्धारित की हुई है। 

हॉर्टिकल्चर की तरफ जाकर भी हम वह जल को बचाने में एक योगदान दे सकते हैं। वाटर लॉगिंग वाले स्थानों पर फिशिंग की जा सकती है। हमें अपने फॉरेस्ट के क्षेत्र को भी लगातार बनाना होगा। जिन जगहों पर जलभराव होगा वहां पानी बचने के चांस ज्यादा रहते हैं। मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन से लगातार हम प्रयास कर रहे हैं। 

अरोड़ा ने बताया कि एनजीओस लगातार ग्राउंड जीरो में जाकर किसानों को साथ लेकर लोगों को जागरूक करेंगी और वह किसान भी लोगों को पानी की जरूरत के बारे में जागरूक करेंगे। जिसे लेकर उन्हें पूरी सपोर्ट दी जाएगी। वर्ल्ड बैंक के सीनियर अधिकारी भी यह क्लियर कर रहे हैं कि यह जागरूकता अभियान कैसे चले ? कैसे यह प्रोजेक्ट चले ? कैसे लोगों में यह स्वाभाविक बदलाव आए ? कैसे डाटा पेश किया जाए ? कैसे उन्हें समझाया जाए कि यह पानी भविष्य के लिए कितना जरूरी है ? ताकि ऐसा ना हो कि हम सारे पानी का इस्तेमाल कर लें और अगली पीढ़ी के लिए यह पानी बच ही ना पाए। अरोड़ा ने बताया कि हमारे पास सभी गांवों का अलग-अलग डाटा है। मुख्यमंत्री के आदेशानुसार हमारा फोकस गांव स्तर से शुरू होगा और लोगों को जागरुक करने का काम किया जाएगा। जिसे लेकर हम स्कूलों कालेजों में भी एक जागरूकता कैंप चलाएंगे।

बता दें कि जल विशेषज्ञों के अनुसार 1 किलो चावल पैदा करने में लगभग 5300 लीटर पानी की लागत आती है और हरियाणा में धान की खेती का अत्याधिक चलन है। जिसके चलते भूजल को लेकर हरियाणा के हालात बद से बदतर हो चुके हैं। घटते भूजल की गंभीरता को समझते हुए प्रदेश सरकार अब क्रांतिकारी कदम उठाने की तैयारी कर चुकी है। आज तक प्रदेश की विभिन्न सरकारों द्वारा तरह-तरह की नीतियां-योजनाएं बनाई गई। लेकिन लक्ष्य मात्र वोट बैंक साधना था।  

प्रदेश सरकार की अटल भूजल योजना के तहत एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन हुआ। इस योजना का आयोजन भविष्य की हमारी पीढ़ियों को ध्यान में रखकर किया गया है। मुद्दा गंभीर है। जिसके बिना जीवन संभव नहीं है। मुद्दा है घटता हुआ भू- जलस्तर। मुख्यमंत्री मनोहर लाल के दिशा निर्देश पर मानसून में बरसने वाले पानी के अधिकाधिक प्रयोग के लिए 3000 करोड़ रुपए की लागत का एक प्रोजेक्ट तैयार किया गया है। जिसे लेकर पूरा नेटवर्क तैयार किया जा चुका है। इसका मकसद ग्राउंड वाटर को रिचार्ज करना है। यह एक बड़ी स्कीम है।

उन्होंने बताया कि राजस्थान की अरावली पहाड़ियों से निकलने वाली 3 नदियां कृष्णावती, दोहन, साहिबी जो कि 1980 के बाद सूखी पड़ी थी। राजस्थान द्वारा डैम बनाए जाने के बाद यहां पानी नहीं आ रहा था। हमने अपनी नहरों के जरिए मानसून के दिनों में यमुना से अतिरिक्त पानी लेकर इनमें डाला और भूमि को रिचार्ज किया। इसके अलावा कैथल में लगभग 300 रिवर्स बोरवेल बनाए। जिससे बारिश के पानी को ग्राउंड में उतार कर रिचार्ज किया जा सके। नारनौल में हमीरपुर बंद है। भूरे तालाब की तरह बहुत सी लोकेशनस हमने चिन्हित की और रिचार्ज किया।  

पिछले 2 साल के डाटा के अनुसार हमने लगभग 20000 एकड़ फीट पानी ग्राउंड वाटर में रिचार्ज के लिए इस्तेमाल किया। नहीं तो यह पानी हमेशा वेस्ट चला जाता था और हम आने वाले दिनों में इस प्रोसेस को और अधिक बढ़ाएंगे। देवेंद्र सिंह ने बताया कि हमने इसके लिए 18000 तालाब भी चिन्हित किए हैं। जिन्हें दोबारा से भरा जाने पर काम किया जा रहा है। खेतों में पानी के इस्तेमाल को लेकर भी काम किया जा रहा है। लोहारू क्षेत्र में पंचायती जमीनों में तालाब बनाकर बारिश के पानी को उसमें उतारा जाएगा। इस प्रकार से हम ग्राउंड वाटर को बनाने की तरफ काम कर रहे हैं। अटल जल भी उसी दिशा में एक कदम है।  
 

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