'जा मर जाओ' वाली टिप्पणी आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं, HC ने 22 साल पुराने मामले में सौतेली मां को किया बरी

Edited By Manisha rana, Updated: 08 Mar, 2026 12:39 PM

go and die  remark does not amount to abetment of suicide

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने किशोरी की मौत के मामले में सौतेली मां को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि 'जाकर मर जाओ' वाली टिप्पणी हत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं है। 2003 के एक मामले में 22 साल बाद दोषसिद्धि रद्द कर दी गई।

चंडीगढ़ : पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने किशोरी की मौत के मामले में सौतेली मां को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि 'जाकर मर जाओ' वाली टिप्पणी हत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं है। 2003 के एक मामले में 22 साल बाद दोषसिद्धि रद्द कर दी गई। 

महिला की अपील को स्वीकार करते हुए जस्टिस रुपिंदरजीत चहल ने साल 2003 के मामले में उसकी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया, यह मानते हुए कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि लड़की की मृत्यु आत्महत्या थी या सौतेली मां ने उसे उकसाया था। लड़की हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के एक गांव की रहने वाली थी। मां की मृत्यु के बाद, लड़की का पालन-पोषण राजस्थान में ननिहाल के रिश्तेदारों द्वारा किया गया। उसके बाद वह अपने पिता और सौतेली मां के साथ रहने चली गई।

अभियोजन पक्ष के अनुसार किशोरी ने 6 जुलाई, 2003 को अपने ननिहाल वालों को फोन किया और अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए अपने पिता द्वारा अनैतिक व्यवहार का आरोप लगाया। उसने कथित तौर पर कहा कि उसे अपनी जान का खतरा है। अगले दिन, जब उसके मामा गांव पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि लड़की की मृत्यु हो चुकी है और उसके शव का अंतिम संस्कार उनके या पुलिस को सूचित किए बिना ही कर दिया गया है। मामा ने 12 जुलाई, 2003 को शिकायत दर्ज कराई, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना), 354 (लन्जा भंग करना) और 201 (सबूतों को गायब करना) के साथ धारा 34 (सामान्य इरादा) के तहत एफ.आई.आर. दर्ज की गई। अक्टूबर 2004 में ट्रायल कोर्ट ने पिता और सौतेली मां दोनों को दोषी ठहराया। पिता को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में सात साल की कठोर कारावास और मानहानि के लिए एक साल की सजा सुनाई गई, जबकि सौतेली मां को उकसाने के आरोप में सात साल की कठोर कारावास की सजा दी गई। अपील की सुनवाई के दौरान, अगस्त 2022 में पिता का निधन हो गया और उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो गई। अपील केवल सौतेली मां के संबंध में जारी रही।

शव का पोस्टमार्टम नहीं किया, फोरेंसिक रिपोर्ट में जहर का पता नहीं चला

हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में कई कमियों की ओर इशारा किया। लड़की द्वारा जहर खाने के आरोप के बावजूद शव का पोस्टमार्टम नहीं किया गया। श्मशान घाट से बरामद राख और आंशिक रूप से जली हुई हड्डियों को बाद में फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया, लेकिन रिपोर्ट में किसी भी प्रकार के जहर का पता नहीं चला। स्वयं शिकायतकर्ता ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उसे अपनी भतीजी की मौत का सही कारण नहीं पता था और उसने सुझाव दिया कि यह जहर के सेवन या यहां तक कि हत्या के कारण भी हो सकता है। 

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आई.पी. सी. की धारा 306 के तहत दोष सिद्ध करने के लिए अभियोजन पक्ष को पहले यह साबित करना होगा कि मृतक ने आत्महत्या की है। चिकित्सा या वैज्ञानिक साक्ष्य के अभाव में, केवल संदेह के आधार पर आत्महत्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने माना कि आईपीसी की धारा 107 के तहत सौतेली मां के खिलाफ उकसाने के सभी तत्व सिद्ध नहीं होते हैं। उसके खिलाफ एकमात्र आरोप यह था कि जब किशोरी ने अपने पिता के व्यवहार के बारे में शिकायत की तो सौतेली मां ने कथित तौर पर कहा कि अगर उसे शर्म आती है, तो वह 'जाकर मर सकती है'। अदालत ने माना कि ऐसा बयान, यदि स्वीकार भी कर लिया जाए, तो भी अधिक से अधिक एक छिटपुट टिप्पणी ही थी और इससे आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप साबित करने के लिए आवश्यक इरादे, निरंतर उत्पीड़न या प्रत्यक्ष संबंध का पता नहीं चलता। 

एफ.आई.आर. दर्ज करने में देरी

हाईकोर्ट ने एफ.आई.आर. दर्ज करने में छह दिन की अस्पष्ट देरी पर भी ध्यान दिया, जिससे आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाने की आशंकाएं पैदा हुई। बचाव पक्ष के गवाहों ने बताया कि पिता ने लड़की की मृत्यु की शाम और फिर अगली सुबह फोन पर उसके ननिहाल वालों को सूचित किया था और उन्होंने अंतिम संस्कार की अनुमति दे दी थी। यह अभियोजन पक्ष के इस दावे का खंडन करता है कि मृत्यु को छिपाया गया था। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत के निष्कर्ष कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूतों के बजाय नैतिक संदेह पर आधारित थे।

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