Edited By Manisha rana, Updated: 28 Feb, 2026 05:04 PM

नाबालिग को जमानत देने से इनकार करने का एकमात्र आधार अपराध की गंभीरता नहीं हो सकती: हाईकोर्ट
चंडीगढ़ (धरणी) : पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में दोहराया है कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 12 के तहत, किसी 'विधि विरुद्ध संघर्षरत बालक' (CCL) को जमानत देने से केवल अपराध की प्रकृति या गंभीरता के आधार पर इनकार नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सुमीत गोयल की पीठ ने अंबाला की निचली अदालतों द्वारा जमानत याचिका खारिज करने के आदेशों को रद्द करते हुए एक नाबालिग को नियमित जमानत प्रदान की है।
नाबालिग की जमानत की पुष्टि उसकी तरफ से मामले की पैरवी कर रहे हाई कोर्ट के अधिवक्ता धर्म वीर ढिंडसा ने बताया की यह मामला 12 नवंबर 2025 को हुई एक घटना से संबंधित है, जिसमें एक युवक (अमानत) पर जानलेवा हमला किया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मुख्य आरोपी ने चाकू से वार किए थे, जबकि वर्तमान याचिकाकर्ता (नाबालिग) पर मृतक को पकड़ने का आरोप था। अंबाला के मुख्य मजिस्ट्रेट, किशोर न्याय बोर्ड (11.02.2026) और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (19.02.2026) ने नाबालिग की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया था लेकिन माननीय पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट ने नाबालिग की जमानत याचिका मंजूर कर ली।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति सुमीत गोयल ने अपने आदेश में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डाला:
सुधारात्मक दृष्टिकोण : न्यायालय ने कहा कि नाबालिगों के मामलों में जेल भेजने के बजाय पुनर्वास और सुधार पर ध्यान दिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता कक्षा 12वीं का छात्र है और उसकी बोर्ड परीक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं, ऐसे में निरंतर हिरासत उसकी शिक्षा और भविष्य के लिए हानिकारक होगी।
अपराध की प्रकृति बनाम कानून : अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 12 के तहत जमानत एक नियम है। जमानत केवल तभी रोकी जा सकती है जब ठोस सबूत हों कि रिहाई से बालक किसी अपराधी के संपर्क में आएगा या उसे नैतिक/शारीरिक खतरा होगा। इस मामले में निचली अदालतों की आशंकाएं बिना किसी ठोस आधार के थीं। सामाजिक जांच रिपोर्ट (SIR): सामाजिक जांच रिपोर्ट के अनुसार, किशोर का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वह एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखता है। उसकी संलिप्तता का मुख्य कारण 'साथी समूह का प्रभाव' बताया गया था।
अंतिम निर्णय
उच्च न्यायालय ने निचली अदालतों के आदेशों को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को संबंधित ड्यूटी मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के अनुसार जमानत बॉन्ड भरने पर रिहा किया जाए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जमानत की शर्तों का उल्लंघन होता है, तो राज्य पक्ष जमानत रद्द करने के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र है।