गुजारा भत्ता खारिज: 16 लाख का समझौता छिपाने पर पत्नी को हाईकोर्ट की फटकार, फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द

Edited By Manisha rana, Updated: 01 Apr, 2026 04:27 PM

high court reprimands wife for concealing rs 16 lakh settlement

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी पूर्व पत्नी को मासिक भरण-पोषण के रूप में 5000 रुपए का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी पूर्व पत्नी को मासिक भरण-पोषण के रूप में 5000 रुपए का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल ने महिला की भरण-पोषण याचिका को इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उसने यह खुलासा नहीं किया कि उसे समझौते के रूप में पहले ही 16 लाख रुपए मिल चुके हैं। इसी जानकारी के आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया है। पीठ ने कहा कि जो वादी झूठे तथ्य प्रस्तुत करके या अहम तथ्यों को छिपाकर कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास करता है, वह किसी भी प्रकार की राहत पाने का हकदार नहीं है।

हाईकोर्ट फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। पूर्व पत्नी और पूर्व पति दोनों ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया था। इस दंपति ने 1998 में शादी की और उनके 3 बच्चे हुए। हालांकि, बाद में उनके वैवाहिक जीवन में खटास आ गई और 2007 में उनका तलाक हो गया। इसके बाद, उन्होंने अम्बाला की फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनके पति ने उनका और बच्चों का भरण-पोषण करने से इंकार कर दिया था। महिला ने 15,000 रुपए के मासिक भरण-पोषण के लिए प्रार्थना की, जिसमें उसने बताया कि उसका पूर्व पति कुरुक्षेत्र में कृषि भूमि से प्रति माह 3 लाख रुपए कमा रहा था और साथ ही यूनाइटेड किंगडम में भी प्रति माह 3 लाख रुपए से अधिक कमा रहा था।

हालांकि पूर्व पति ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उसे 2010 में एक दीवानी मुकद्दमे में उससे भरण-पोषण के रूप में पहले ही 16 लाख रुपए मिल चुके हैं। यह भी तर्क दिया गया कि उसने इंग्लैंड में किसी और से शादी कर ली है। उसने दावा किया कि वह बेरोजगार है और उसकी कोई आमदनी नहीं है। फैमिली कोर्ट ने उसे 5,000 मासिक भरण-पोषण और 5500 रुपए मुकद्दमेबाजी खर्च का भुगतान करने का आदेश दिया था। यह फैसला सुनाते हुए कि दीवानी मुकद्दमे में हुए समझौते का उल्लंघन किया गया था। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसे समझौते को पूर्व पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को समाप्त करने के लिए कानूनी समझौता नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि याची या पूर्व पत्नी को यह खुलासा करना अनिवार्य था कि उसे दीवानी मुकद्दमे में हुए समझौते के बाद अपने पूर्व पति के पिता से पहले ही 16 लाख रुपए मिल चुके थे। समझौते के तहत दोनों बेटियां पिता के साथ और बेटा मां के साथ रहेगा। इसमें कहा गया कि 16 लाख रुपए की राशि मां के भविष्य के भरण-पोषण और नाबालिग बेटे की शिक्षा एवं परवरिश के लिए दी गई थी। चूंकि इस बात का खुलासा फैमिली कोर्ट के समक्ष नहीं किया गया था, इसलिए कोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली।

 

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