ब्रिटिश म्यूज़ियम से 11वीं सदी की मां सरस्वती की प्राचीन प्रतिमा भारत लाने का प्रयास तेज : सरस्वती हेरिटेज बोर्ड हरियाणा

Edited By Krishan Rana, Updated: 02 Aug, 2026 07:24 PM

efforts intensified to bring back the ancient 11th century statue of goddess sar

हरियाणा सरस्वती हेरिटेज विकास बोर्ड ने 11वीं सदी की प्राचीन माँ सरस्वती की प्रतिमा को लंदन स्थित

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा सरस्वती हेरिटेज विकास बोर्ड ने 11वीं सदी की प्राचीन माँ सरस्वती की प्रतिमा को लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूज़ियम से भारत वापस लाने के प्रयास तेज कर दिए हैं। बोर्ड के डिप्टी चेयरमैन श्री धूमन सिंह किरमच ने जानकारी देते हुए बताया कि यह प्रतिमा मूल रूप से मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मंदिर की है, जिसे औपनिवेशिक काल (लगभग 1886–1891) के दौरान अंग्रेजों द्वारा इंग्लैंड ले जाया गया था।

उन्होंने बताया कि यह प्रतिमा अत्यंत प्राचीन, धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व की धरोहर है, जो माँ सरस्वती के ज्ञान, विद्या और संस्कृति के प्रतीक स्वरूप को दर्शाती है। वर्तमान में यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम में सुरक्षित रखी गई है।

श्री किरमच ने कहा कि हाल ही में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ द्वारा भोजशाला परिसर को प्राचीन सरस्वती वाग्देवी मंदिर मानते हुए हिन्दू समाज को पूजा का अधिकार दिए जाने संबंधी महत्वपूर्ण आदेश पारित किया गया है। इसी क्रम में इस ऐतिहासिक प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग और अधिक प्रासंगिक हो गई है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार द्वारा विदेशों से भारत की प्राचीन सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहरों को वापस लाने का अभियान निरंतर सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में अनेक दुर्लभ मूर्तियां और कलाकृतियां विभिन्न देशों से वापस भारत लाई गई हैं, जिससे इस प्रयास को और बल मिला है।

उन्होंने बताया कि इस विषय को लेकर हरियाणा सरस्वती बोर्ड द्वारा मध्य प्रदेश सरकार से औपचारिक संपर्क स्थापित किया गया है तथा हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी को भी पत्राचार के माध्यम से अवगत कराया गया है। बोर्ड का उद्देश्य इस प्रतिमा को भारत लाकर सरस्वती सभ्यता से जुड़े क्षेत्रों में प्रदर्शित करना तथा अंततः हरियाणा में स्थापित सरस्वती संग्रहालय में प्रतिष्ठित करना है।

डिप्टी चेयरमैन ने कहा कि ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार यह प्रतिमा परमार राजवंश के काल (11वीं सदी) की मानी जाती है और इसे धार क्षेत्र में पुरातात्विक खुदाई के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा प्राप्त किया गया था। उस समय दो प्रतिमाएं मिली थीं, जिनमें से एक वर्तमान में भोजशाला में स्थापित है, जबकि दूसरी ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखी गई है।

उन्होंने आगे बताया कि यह प्रतिमा संगमरमर से निर्मित है और इसमें संस्कृत एवं देवनागरी में शिलालेख भी अंकित हैं। यदि यह प्रतिमा भारत वापस लाई जाती है, तो इन शिलालेखों पर गहन शोध किया जाएगा, जिससे हमारी प्राचीन सभ्यता, सरस्वती नदी और उससे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत के बारे में नई जानकारी प्राप्त हो सकेगी।

श्री किरमच ने कहा कि सरस्वती नदी के तट पर विकसित सभ्यता को भारतीय इतिहास की आधारशिला माना जाता है, और इस प्रकार की धरोहरों को पुनः देश में लाना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने केंद्र सरकार एवं संबंधित एजेंसियों से इस दिशा में सहयोग का आह्वान किया।

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