Edited By Krishan Rana, Updated: 06 Jul, 2026 02:46 PM
हरियाणा की राजनीति में पूर्व सांसद एवं पूर्व IAS अधिकारी बृजेन्द्र सिंह एक बार फिर चर्चा
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा की राजनीति में पूर्व सांसद एवं पूर्व IAS अधिकारी बृजेन्द्र सिंह एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी धर्मपत्नी के साथ हिमाचल प्रदेश स्थित प्रसिद्ध माता बगलामुखी मंदिर में दर्शन कर पूजा-अर्चना की। इस धार्मिक यात्रा के साथ-साथ उनकी राजनीतिक सक्रियता भी लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है, जिसके चलते प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में उनके भविष्य को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
90 विधानसभा पदयात्रा बनी राजनीतिक चर्चा का विषय
लोकसभा चुनाव के बाद बृजेन्द्र सिंह ने हरियाणा की सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में व्यापक पदयात्रा कर कार्यकर्ताओं और आम जनता से सीधा संवाद स्थापित किया। इस यात्रा का उद्देश्य संगठन को मजबूत करना, जनसमस्याओं को समझना तथा कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार करना बताया गया।
हालांकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं नेता प्रतिपक्ष भूपिंदर सिंह हुड्डा ने इसे बृजेन्द्र सिंह की निजी यात्रा करार दिया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी व्यापक जनसंपर्क यात्रा केवल व्यक्तिगत कार्यक्रम नहीं मानी जा सकती।
राहुल गांधी की मौजूदगी से बदले राजनीतिक संकेत
बृजेन्द्र सिंह की पदयात्रा को उस समय और अधिक राजनीतिक महत्व मिला, जब राहुल गांधी स्वयं उनकी यात्रा में शामिल हुए। राहुल गांधी की उपस्थिति को कांग्रेस नेतृत्व द्वारा बृजेन्द्र सिंह के प्रति विश्वास और समर्थन के संकेत के रूप में देखा गया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी की सहभागिता ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि बृजेन्द्र सिंह केवल क्षेत्रीय नेता नहीं, बल्कि कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
IAS से राजनीति तक का सफर
बृजेन्द्र सिंह का प्रशासनिक करियर भी अत्यंत उल्लेखनीय रहा है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी रहते हुए उन्होंने विभिन्न राज्यों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। बाद में उन्होंने स्वैच्छिक इस्तीफा देकर सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना। उस समय उनके पिता एवं हरियाणा के वरिष्ठ नेता बीरेन्द्र सिंह भारतीय जनता पार्टी में थे। भाजपा ने बृजेन्द्र सिंह को हिसार लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया, जहां उन्होंने जीत दर्ज कर संसद तक का सफर तय किया।
दल परिवर्तन के बाद बदले राजनीतिक समीकरण
बाद में बीरेन्द्र सिंह ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। उनके साथ बृजेन्द्र सिंह भी कांग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन कांग्रेस में पहले से मौजूद गुटीय राजनीति और टिकट वितरण के समीकरणों के चलते लोकसभा चुनाव में बृजेन्द्र सिंह को हिसार से उम्मीदवार नहीं बनाया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टिकट न मिलने के बावजूद बृजेन्द्र सिंह ने संगठन से दूरी बनाने के बजाय प्रदेशभर में जनसंपर्क अभियान चलाकर अपनी राजनीतिक सक्रियता बनाए रखी।
युवा नेतृत्व के रूप में बढ़ रही पहचान
बृजेन्द्र सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनकी प्रशासनिक पृष्ठभूमि, साफ-सुथरी छवि और युवाओं के बीच बढ़ती स्वीकार्यता मानी जाती है। पदयात्रा के दौरान उन्होंने किसानों, युवाओं, कर्मचारियों, व्यापारियों और सामाजिक संगठनों से लगातार संवाद किया, जिससे उनकी पहचान एक सक्रिय जननेता के रूप में मजबूत हुई।
धार्मिक आस्था और जनसंपर्क दोनों पर समान जोर
माता बगलामुखी मंदिर में दर्शन को भी उनकी व्यक्तिगत आस्था से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच धार्मिक स्थलों पर जाकर आशीर्वाद लेना भारतीय राजनीति की एक सामान्य परंपरा रही है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश की यह यात्रा भी चर्चा का विषय बनी हुई है।
भविष्य की राजनीति पर नजर
हरियाणा कांग्रेस में नेतृत्व और संगठन को लेकर लगातार नए समीकरण बन रहे हैं। ऐसे समय में बृजेन्द्र सिंह की सक्रियता, उनकी प्रदेशव्यापी पदयात्रा और राष्ट्रीय नेतृत्व से निकटता उन्हें भविष्य की राजनीति का एक महत्वपूर्ण चेहरा बना रही है।
आने वाले समय में कांग्रेस संगठन में उनकी भूमिका क्या होगी और उन्हें कौन-सी राजनीतिक जिम्मेदारी मिलती है, इस पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर बनी हुई है। इतना तय है कि प्रशासनिक अनुभव, संसदीय पृष्ठभूमि और प्रदेशव्यापी जनसंपर्क अभियान ने बृजेन्द्र सिंह को हरियाणा की राजनीति के प्रमुख युवा नेताओं की कतार में ला खड़ा किया है।
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