Edited By Manisha rana, Updated: 11 Mar, 2026 11:19 AM

हरियाणा व्यापार मंडल के अध्यक्ष बजरंग दास गर्ग और उनके बेटे अखिल गर्ग को बड़ी राहत मिली है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ फोटो पोस्ट करने के मामले में आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज एफ. आई. आर. रद्द कर दी है।
चंडीगढ़ : हरियाणा व्यापार मंडल के अध्यक्ष बजरंग दास गर्ग और उनके बेटे अखिल गर्ग को बड़ी राहत मिली है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ फोटो पोस्ट करने के मामले में आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज एफ. आई. आर. रद्द कर दी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो सके कि लाइसैंसी हथियार अनधिकृत व्यक्ति को जानबूझकर सौंपे गए थे या दुरुपयोग हुआ था। यह आदेश जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह की पीठ ने सुनाया। बजरंग दास गर्ग और बेटे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने पंचकूला सैक्टर-5 थाना में 20 अप्रैल, 2019 को दर्ज एफ.आई.आर. को चुनौती दी थी, जिसमें आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-बी) (ए) और 29 (बी) के तहत आरोप लगाए गए थे।
बजरंग दास के वकील ने कोर्ट को बताया कि पुलिस को सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें मिली थीं, जिनमें विकास वैद नामक व्यक्ति अलग-अलग हथियारों के साथ दिखाई दे रहा था। जांच में पता चला कि विकास वैद बजरंग दास का चालक था। पूछताछ में उसने बताया कि घर में रखे रिवॉल्वर और कारतूसों के साथ सैल्फी ली और फेसबुक पर पोस्ट कर दिया था। अन्य फोटो में एक घर की दीवार पर टंगी ए. के.-47 बंदूक के साथ भी दिखाई दिया था।
हथियारों का था वैध लाइसैंस
इन तस्वीरों के आधार पर पुलिस ने हथियारों के मालिकों के खिलाफ भी एफ. आई.आर. दर्ज कर ली थी। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि दोनों रिवॉल्वर वैध लाइसैंस पर थे और कभी किसी को हथियार सौंपे नहीं। केवल फोटो खींच लेने से आर्म्स एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता। यह भी तर्क दिया कि चार अलग-अलग हथियारों की तस्वीरें होने के बावजूद अन्य हथियार मालिकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई, जिससे जांच में भेदभाव स्पष्ट होता है। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि ट्रायल के दौरान यह साबित किया जा सकता है कि हथियारों का उपयोग अनधिकृत व्यक्ति ने किया, जिसके लिए लाइसैंसधारी जिम्मेदार हैं।
तस्वीरें साबित नहीं करती अपराध
अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि अभियोजन के आरोपों से यह सिद्ध नहीं होता कि याचिकाकर्ताओं ने हथियार किसी अनधिकृत व्यक्ति को सौंपे थे। तस्वीरों से यह भी साबित नहीं होता कि हथियार वास्तव में आरोपी के कब्जे में थे। अदालत ने यह भी कहा कि आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत अपराध तभी बनता है, जो बिना लाइसैंस हथियार रखने या ले जाने का आरोप है, जबकि यहां हथियार लाइसैंसी थे। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अपराध के लिए अपराध करने की मंशा आवश्यक होती है, जो इस मामले में दिखाई नहीं देती। परिणामस्वरूप अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित एफ. आई. आर. को रद्द कर दिया।
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