हरियाणा कांग्रेस में शक्ति प्रदर्शन या गुटों का संदेश? नए प्रभारी के सामने बड़ी चुनौती

Edited By Isha, Updated: 10 Jul, 2026 08:46 PM

a show of strength or a message from factions within the haryana congress

हरियाणा कांग्रेस के नए प्रभारी संजय दत्त के चंडीगढ़ स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पहुंचने पर लंबे समय बाद पार्टी के लगभग सभी प्रमुख नेता एक मंच पर दिखाई दिए। इस मौके पर संगठन को मजबूत बनाने,

चंडीगढ़( चन्द्र शेखर धरणी):  हरियाणा कांग्रेस के नए प्रभारी संजय दत्त के चंडीगढ़ स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पहुंचने पर लंबे समय बाद पार्टी के लगभग सभी प्रमुख नेता एक मंच पर दिखाई दिए। इस मौके पर संगठन को मजबूत बनाने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और आगामी चुनावों की तैयारी में जुटने का सामूहिक संकल्प भी लिया गया। पहली नजर में यह आयोजन कांग्रेस की एकजुटता का संदेश देता दिखा, लेकिन नेताओं के भाषणों और टिप्पणियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पार्टी के भीतर मौजूद अलग-अलग राजनीतिक धाराएं अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। ऐसे में नए प्रभारी संजय दत्त के सामने संगठन को एकजुट रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

हुड्डा और सुरजेवाला की नोकझोंक ने बटोरी सुर्खियां
कार्यक्रम के दौरान सबसे अधिक चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला के बीच हुई हल्की-फुल्की राजनीतिक नोकझोंक की रही। हुड्डा ने मंच से कहा कि यदि रणदीप सुरजेवाला एक बार उनका साथ दें तो हरियाणा में कांग्रेस की सरकार बन सकती है।इस पर अपनी हाजिरजवाबी के लिए प्रसिद्ध सुरजेवाला ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि "हुड्डा साहब, हमने तो 20 साल आपका साथ दिया है, अब आप मेरा साथ दीजिए।" दोनों नेताओं के इस संवाद पर पूरा सभागार तालियों और ठहाकों से गूंज उठा। हालांकि यह बातचीत हल्के अंदाज में हुई, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसके कई मायने भी निकाले जा रहे हैं।

सुरजेवाला का राष्ट्रीय कद भी बना चर्चा का विषय
रणदीप सिंह सुरजेवाला कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव होने के साथ-साथ कर्नाटक के प्रभारी भी हैं। गांधी परिवार के भरोसेमंद नेताओं में उनकी पहचान है और हरियाणा कांग्रेस में भी उनका अलग राजनीतिक आधार माना जाता है। प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव लगातार बना हुआ है और संगठन के भीतर उनका समर्थक वर्ग भी सक्रिय है।

कुमारी शैलजा ने दी संगठन को सीख
पूर्व केंद्रीय मंत्री और सिरसा से सांसद कुमारी शैलजा ने अपने संबोधन में संगठनात्मक संस्कृति पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हर बार नया प्रभारी आता है और सभी उसका स्वागत करते हैं, लेकिन केवल बातें करने से काम नहीं चलेगा। यदि समान सम्मान और समान अवसर की भावना व्यवहार में दिखाई देगी, तभी संगठन मजबूत होगा।उन्होंने कहा कि कांग्रेस का लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना भर नहीं, बल्कि जनता के हितों के लिए काम करना है। पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर संगठन को मजबूत करना होगा। शैलजा ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि समाज में विभाजन की राजनीति लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है और कांग्रेस को इसके विपरीत लोगों को जोड़ने का काम करना चाहिए।

हुड्डा और बिरेंद्र सिंह की मुलाकात भी रही चर्चा में
कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बिरेंद्र सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा एक-दूसरे के साथ बैठे और दोनों ने हाथ मिलाकर आपसी सौहार्द का संदेश दिया। राजनीतिक जानकारों के अनुसार दोनों नेताओं के बीच लंबे समय तक राजनीतिक दूरियां रही हैं। हालांकि हाल के समय में बिरेंद्र सिंह परिवार की सक्रियता और राहुल गांधी के साथ उनकी नजदीकियों ने प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा भी तेज कर दी है।

नए प्रभारी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा
हरियाणा में कांग्रेस पिछले एक दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर है। यदि अगला विधानसभा चुनाव भी जोड़ा जाए तो पार्टी का वनवास लगभग 15 वर्ष का हो जाएगा। ऐसे में संजय दत्त के सामने केवल संगठनात्मक बैठकों का संचालन ही नहीं, बल्कि विभिन्न गुटों के बीच समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी भी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में रहते हुए संगठनात्मक अनुशासन और केंद्रीय नेतृत्व के निर्देशों को प्राथमिकता देती रही है। इसके विपरीत कांग्रेस में कई वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग राजनीतिक आधार होने के कारण सामूहिक रणनीति बनाना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है।

आगे की राह पर टिकी निगाहें
चंडीगढ़ का यह आयोजन कांग्रेस के लिए नई शुरुआत का संकेत अवश्य माना जा सकता है, लेकिन यह शुरुआत कितनी सफल होगी, इसका उत्तर आने वाले महीनों में संगठनात्मक फैसलों और नेताओं के बीच तालमेल से मिलेगा। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि नए प्रभारी संजय दत्त हरियाणा कांग्रेस को वास्तव में एकजुट कर पाते हैं या फिर यह प्रयास भी पहले की तरह केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले यह उनके राजनीतिक कौशल की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।


 

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