कुरुक्षेत्र की वो जादुई 'बहियां': जहां 300 साल बाद भी जिंदा मिलते हैं आपके पूर्वज और उनके दस्तखत!

Edited By Isha, Updated: 17 Mar, 2026 02:12 PM

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हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में चैत्र मास के अवसर पर लगने वाला चैत्र चौदस मेला आस्था, परंपरा और अर्थव्यवस्था का अनूठा संगम बनकर उभर रहा है। खासतौर पर सरस्वती तीर्थ पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है, जहां देश-विदेश से लोग अपने पूर्वजों के लिए...

कुरुक्षेत्र (कपिल शर्मा): हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में चैत्र मास के अवसर पर लगने वाला चैत्र चौदस मेला आस्था, परंपरा और अर्थव्यवस्था का अनूठा संगम बनकर उभर रहा है। खासतौर पर सरस्वती तीर्थ पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है, जहां देश-विदेश से लोग अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान, तर्पण और पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं।

इस मेले की सबसे खास कड़ी तीर्थ पुरोहित और उनके यजमानों का पीढ़ियों पुराना रिश्ता है। पुरोहित अपने यजमानों की वंशावली सदियों से संभालकर रखे हुए हैं। बताया जाता है कि कई पुरोहितों के पास 300 साल तक का रिकॉर्ड बहियों (बही-पूथी) में सुरक्षित दर्ज है। हालांकि पुराने समय में मुगल आक्रमणों के दौरान कई रिकॉर्ड नष्ट भी हो चुके हैं।

पूजा-अर्चना के बाद पुरोहित अपने यजमानों को उनके पूर्वजों की जानकारी देते हैं। इसके बदले यजमान अपनी श्रद्धा अनुसार दान-दक्षिणा अर्पित करते हैं, जो 1 रुपये से लेकर लाखों रुपये तक हो सकती है। खास बात यह है कि पुरोहित स्वयं किसी प्रकार की मांग नहीं करते, बल्कि इसे सेवा का कार्य मानते हैं। इस तीर्थ पर पुरोहितों की पहचान अलग-अलग “गद्दियों” के नाम से होती है, जिनमें बड़े वाले, डंका वाले, फुलकारी वाले, सालिग्राम, बंसरी वाले, छतरी वाले और राजपुरोहित (धौली हवेली) जैसी प्रमुख गद्दियां शामिल हैं। श्रद्धालु इन गद्दियों के नाम से अपने-अपने पुरोहितों तक पहुंचते हैं।

डिजिटल युग के बावजूद यहां पारंपरिक बही-पूथी पर ही अधिक भरोसा किया जाता है। पुरोहितों का मानना है कि कंप्यूटर में वायरस या डेटा चोरी का खतरा रहता है, इसलिए वे कागजी रिकॉर्ड को ही सुरक्षित मानते हैं। हालांकि, संचार के लिए व्हाट्सएप ग्रुप और मोबाइल का खूब उपयोग हो रहा है, जिससे यजमानों की जानकारी तेजी से साझा की जाती है।

इस मेले में बड़ी-बड़ी हस्तियों, कारोबारियों, राजनेताओं और यहां तक कि बॉलीवुड से जुड़े लोगों की वंशावली भी दर्ज बताई जाती है। पुरोहितों के अनुसार उनका कार्य केवल कमाई नहीं, बल्कि यजमानों के साथ पीढ़ियों से चला आ रहा धार्मिक और भावनात्मक संबंध निभाना है। चैत्र चौदस मेले का आर्थिक पहलू भी बेहद महत्वपूर्ण है। मेले में होने वाला लेन-देन करोड़ों रुपये तक पहुंच जाता है। जहां एक ओर ब्राह्मणों को धार्मिक अनुष्ठानों के लिए दक्षिणा मिलती है, वहीं पूजा सामग्री बेचने वाले दुकानदारों की भी अच्छी आमदनी होती है।

मेले में बर्तन, कपड़े, अनाज, तेल, तिल, प्रसाद और अन्य जरूरी सामानों के स्टॉल सजते हैं। पूजा के बाद बीज वाले फल ले जाने की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसे घर में समृद्धि और वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस तरह कुरुक्षेत्र का यह चैत्र चौदस मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि परंपरा और कारोबार का जीवंत उदाहरण भी बन चुका है।

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