Edited By Isha, Updated: 17 Mar, 2026 03:09 PM

हरियाणा के हालिया राज्यसभा चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीति में केवल संख्या बल ही निर्णायक नहीं होता, बल्कि रणनीतिक कौशल और समय पर लिए गए निर्णय भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। निर्दलीय उम्मीदवार भले ही चुनाव हार गए हों, लेकिन इस पूरे...
चंडीगढ़(चन्द्रशेखर धरणी): हरियाणा के हालिया राज्यसभा चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीति में केवल संख्या बल ही निर्णायक नहीं होता, बल्कि रणनीतिक कौशल और समय पर लिए गए निर्णय भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। निर्दलीय उम्मीदवार भले ही चुनाव हार गए हों, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा के रणनीतिकार तरुण भंडारी की भूमिका बेहद अहम रही।
कांग्रेस के पास 37 विधायकों का मजबूत आंकड़ा होने के बावजूद, जिस तरह केवल 28 विधायक ही पार्टी के पक्ष में खड़े नजर आए, उसने पार्टी की आंतरिक एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए। यह केवल असंतोष का मामला नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का परिणाम प्रतीत होता है। पांच विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग करना और चार विधायकों के वोट का निरस्त हो जाना, कांग्रेस के पूरे गणित को बिगाड़ने के लिए पर्याप्त साबित हुआ।
इस पूरे घटनाक्रम में तरुण भंडारी द्वारा तैयार किया गया “चक्रव्यूह” स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने न केवल अपने पक्ष को मजबूत बनाए रखा, बल्कि विपक्ष के भीतर भी प्रभाव डालने में सफलता हासिल की। क्रॉस वोटिंग और वोट निरस्त होने की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि चुनावी प्रक्रिया के हर पहलू पर बारीकी से काम किया गया।
अगर इस समीकरण को और गहराई से देखें तो यह भी स्पष्ट होता है कि भाजपा ने केवल अपने विधायकों को एकजुट रखने पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि कांग्रेस के भीतर असंतोष और असंतुलन को भी रणनीतिक रूप से साधा। यही कारण रहा कि कांग्रेस का मजबूत दिखने वाला आंकड़ा अंतिम समय में बिखर गया। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण पहलू इंडियन नेशनल लोकदल के दो विधायकों का मतदान में हिस्सा न लेना भी रहा। यदि ये दोनों विधायक मतदान करते, तो निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल की जीत की संभावना काफी बढ़ सकती थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि चुनावी परिणाम आखिरी क्षण तक बेहद संवेदनशील बना रहा।
कांग्रेस के लिए यह नतीजा केवल एक हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व के प्रभाव पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जिस प्रकार से उसके विधायक एकजुट नहीं रह पाए, वह भविष्य के चुनावों के लिए भी चेतावनी है। पार्टी को अब अपने भीतर समन्वय और अनुशासन को मजबूत करने की जरूरत है।
वहीं, भाजपा के लिए यह परिणाम एक रणनीतिक जीत के रूप में देखा जा सकता है। तरुण भंडारी जैसे रणनीतिकारों की भूमिका यह दर्शाती है कि पार्टी केवल अपने संगठन पर ही नहीं, बल्कि विपक्ष की कमजोरियों को भुनाने में भी माहिर है।
हिमाचल में किया था ‘खेला’
मनोहर लाल के मुख्यमंत्री रहते हरियाणा में मुख्यमंत्री के तब के पब्लिसिटी एडवाइजर तरुण भंडारी ने पूर्व में हिमाचल में हुए राज्यसभा चुनाव में सत्ता दल कांग्रेस में तारपिडो करते हुए कांग्रेस के 6 विधायकों और 3 निर्दलीय विधायकों से बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन के पक्ष में मतदान कराया था। ऐसा करके जहां तरुण भंडारी ने अपने राजनीतिक कौशल का परिचय दिया। वहीं, उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा।
बता दें कि तरुण भंडारी ने 2019 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी ज्वाइन की थी। उसके बाद से ही अब तक लगातार वह पूरे देश में कांग्रेस के 100 के करीब बड़े चेहरों को बीजेपी में शामिल करवा चुके हैं। किरण चौधरी और उनकी बेटी श्रुति चौधरी का बीजेपी में शामिल होना तरुण भंडारी की राजनीतिक रणनीति का एक हिस्सा है। मनोहर लाल के बीरबल के रूप में भूमिका निभाने वाले तरुण भंडारी मौजूदा मुख्यमंत्री नायब सैनी के भी खास व्यक्तियों में शुमार हो चुके हैं। किरण और श्रुति चौधरी के बीजेपी में शामिल होने के लिए पार्टी मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में भी तरुण भंडारी प्रमुख चेहरे के रूप में नजर आ रहे थे।
तंवर और जिंदल को करवाया था शामिल
इससे पहले हरियाणा में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तरुण भंडारी ने कांग्रेस के पूर्व सांसद नवीन जिंदल और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को भी बीजेपी में शामिल करवाया था, जिन्हें पार्टी ने क्रमश: कुरुक्षेत्र और सिरसा से लोकसभा चुनाव में उतारा था। इनमें नवीन जिंदल चुनाव जितने में कामयाब हो गए थे, लेकिन अशोक तंवर चुनाव नहीं जीत पाए थे। हालांकि तंवर के चुनाव हारने के पीछे कई कारण बताए जा रहे है, जिनमें उनकी ओर से लगाया गया पार्टी पदाधिकारियों के भीतरघात का आरोप भी एक है। बाद में तंवर फिर कांग्रेस में लौट गए।
तरुण भंडारी को मुख्यमंत्री व भाजपा नेतृत्व का विश्वासपात्र रणनीतिक सहयोगी माना जाता है और हरियाणा की सक्रिय राजनीतिक नियुक्तियों में उनकी भूमिका प्रभावशाली मानी जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धार्मिक नेताओं से संवाद के माध्यम से सरकार समाज के विभिन्न वर्गों तक सीधे पहुंच बनाने की रणनीति पर कार्य कर रही है। इस कड़ी में तरुण भंडारी मुख्यमंत्री और धार्मिक नेतृत्व के बीच समन्वय सेतु के रूप में उभरे हैं।
मुख्यमंत्री की संत-महात्माओं, गुरुद्वारों, मंदिर समितियों एवं अन्य धार्मिक प्रतिनिधियों से मुलाकातों को सामाजिक समरसता, जनभागीदारी और सकारात्मक संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।