केंद्र सरकार की गलत नीतियों से आर्थिक दिवालिएपन का शिकार हो रहे हैं राज्य: रणदीप सुरजेवाला

Edited By Yakeen Kumar, Updated: 20 Sep, 2025 09:17 PM

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अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सदस्य रणदीप सिंह सुर्जेवाला का कहना है केंद्र सरकार अपनी गलत नीतियों के चलते राज्यों को आर्थिक रूप से दीवालिया कर रही है।

चंडीगढ़ (संजय अरोड़ा): अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सदस्य रणदीप सिंह सुर्जेवाला का कहना है केंद्र सरकार अपनी गलत नीतियों के चलते राज्यों को आर्थिक रूप से दीवालिया कर रही है। 68 साल में यानी 15 अगस्त 1947 से 2014 तक देश के 28 प्रांतों पर कुल कर्ज 17.54 लाख करोड़ रुपए था। मोदी सरकार के 10 साल में प्रांतों पर कर्ज 300 प्रतिशत बढ़ कर 60 लाख करोड़ तक हो गया है। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि भारत में संघवाद यानी फैडरलिज्म इस समय असाधारण दबाव में है। राज्यों पर कर्ज का बोझ पिछले 10 वर्षों में तीन गुणा तक पहुंच गया है और उनकी राजकोषीय स्वतंत्रता केंद्र सरकार की जी.एस.टी.क्षतिपूर्ति सेस और सैंट्रल लेवीज के गलत प्रबंधन के कारण छीनी जा रही है।  10 वर्षों में राज्यों पर 42.03 लाख करोड़ रुपए का कर्ज बढ़ा है। इससे जाहिर है कि मोदी सरकार ने देश के प्रांतों को आर्थिक दिवालियेपन की दलदल में धकेला है। देश के प्रांतों की हालत अब नगरपालिकाओं जैसी हो गई है, जिसमें कोई आय का साधन नहीं, कर्ज लो और घी पियो की नीति पर सरकार काम कर रही है। यह राष्ट्रनिर्माण में घातक है। केंद्र अगर आय का सारा पैसा जी.एस.टी. के माध्यम से रख लेगा तो प्रांत कंगालिए हो जाएंगे। इस दोहरी मार में राज्यों के कर्ज बढ़ रहे हैं और आमदनी घट रही है। 

तथ्यों के साथ कांग्रेस महासचिव ने सरकार पर लगाए आरोप

कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुर्जेवाला ने तथ्य रखते हुए कहा कि राज्यों का कर्ज और वित्तीय स्वतंत्रता (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार, 2013-14 में सभी राज्यों का कुल सार्वजनिक कर्ज 17.57 लाख करोड़ था, जो 2022-23 में बढक़र 59.60 लाख करोड़ रुपए हो गया। यानी 10 साल में तीन गुणा से अधिक यह कर्ज अब संयुक्त ग्रॉस डौमेस्टिक प्रोडक्ट्स का 22.96 प्रतिशत तक पहुंच गया है। उदाहरण के तौर पर पंजाब 40.35 प्रतिशत, नागालैंड 37.15 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल 33.7 प्रतिशत का कर्ज जी.एस.डी.पी. 30 प्रतिशत से अधिक है। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि इन राज्यों का कर्ज अब भारत की कुल जी.डी.पी. का 22.17 प्रतिशत है। केंद्र-राज्य वित्तीय विवादहर साल केंद्र सरकार सेस और सरचार्जेज के जरिए 1.7 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा इक_ा करती है, जिसका कोई हिस्सा राज्यों को नहीं मिलता। जबकि अगर यह जी.एस.टी. में शामिल होता, तो राज्यों को 41 प्रतिशत हिस्सा मिलता। सुर्जेवाला ने कहा कि जी.एस.टी. कॉम्पैन्सैशन सेस 22 सितंबर 2025 के बाद खत्म किया जा रहा है और अब इसका उपयोग केवल केंद्र के कर्ज चुकाने में होगा। राज्य क्षतिपूर्ति में जी.एस.टी. संग्रह में अनुमानित कमी (2025 में अनुमानित घाटा 40,000 से 2.5 लाख करोड़ तक) का सबसे बड़ा नुकसान भी राज्यों को झेलना पड़ेगा। 

राज्यों को अब राजधानी दिल्ली पर निर्भर रहने को किया जा रहा है मजबूर

कांग्रेस महासचिव रणदीप सुर्जेवाला ने कहा कि कैग रिपोर्ट के अनुसार कई राज्य कर्ज का बड़ा हिस्सा दैनिक खर्चों पर लगा रहे हैं न कि निवेश या पूंजीगत खर्च पर। आंध्र प्रदेश ने केवल 17 प्रतिशत, पंजाब ने 26 प्रतिशत, हरियाणा-हिमाचल ने करीब 50 प्रतिशत कर्ज को ही पूंजीगत खर्च में लगाया है। यह कर्ज लेने के गोल्डन रूल का उल्लंघन है। केंद्र द्वारा सेस को अनुसूचित फंड में शामिल न करना राज्यों के लिए 41 प्रतिशत फंड डिवोल्यूशन में भी बड़ी कटौती कर देता है। हर राज्य ने जी.एस.टी. के बाद रेवेन्यू में नुकसान झेला है। कर्नाटक को ही हर साल 25 हजार करोड़ कम मिलता है। ऐसे में निष्कर्ष यह निकलता है कि राज्यों को अब राजधानी दिल्ली पर निर्भर रहने को मजबूर किया जा रहा है। सहकारी संघवाद को खोखला किया जा रहा है और शक्ति का केंद्रीयकरण तेज हुआ है। जी.एस.टी. की संरचना और सेस की एकतरफा वसूली ने राज्यों को असहाय बना दिया है, जिससे वे अब अपने फैसले लेने में भी स्वतंत्र नहीं हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि यह सब लोकतांत्रिक संघीय ढांचे के विपरीत है और राज्यों की आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक स्वतंत्रता पर गंभीर हमला है। यह सहकारी संघवाद नहीं, बलात्कारी संघवाद है, जो राज्यों को कर्ज, निर्भरता और असहायता की स्थिति की ओर धकेल रहा है तथा लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण को खत्म कर रहा है।

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