Edited By Manisha rana, Updated: 03 Jun, 2026 08:19 AM
भारत तेजी से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। औद्योगीकरण, शहरीकरण, डिजिटल क्रांति, इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई तकनीकों के बढ़ते उपयोग ने देश की बिजली आवश्यकताओं को...
चंडीगढ़ (धरणी) : भारत तेजी से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। औद्योगीकरण, शहरीकरण, डिजिटल क्रांति, इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई तकनीकों के बढ़ते उपयोग ने देश की बिजली आवश्यकताओं को अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा दिया है। ऐसे समय में केंद्रीय विद्युत मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति की बैठक केवल एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की विकास रणनीति का महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरी है। केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहर लाल की अध्यक्षता में करीब तीन घंटे चली इस बैठक में केंद्रीय मंत्री, 17 राज्यों से समिति के सदस्य सांसद तथा विद्युत क्षेत्र से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ स्तर की चर्चा हुई। बैठक का प्रमुख विषय "ग्रिड स्टेबिलिटी" अर्थात बिजली उत्पादन और मांग के बीच संतुलन बनाए रखना रहा।
ग्रिड स्टेबिलिटी: आधुनिक भारत की ऊर्जा सुरक्षा का आधार
आज बिजली केवल एक सुविधा नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुकी है। उद्योग, कृषि, परिवहन, डिजिटल सेवाएं, अस्पताल और संचार व्यवस्था सब कुछ बिजली पर निर्भर है। ऐसे में यदि राष्ट्रीय ग्रिड असंतुलित होता है तो व्यापक स्तर पर ब्लैकआउट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। मनोहर लाल ने बैठक के बाद स्पष्ट किया कि दुनिया के कई देशों में बिजली उत्पादन और मांग के बीच समन्वय की कमी के कारण बड़े ऊर्जा संकट सामने आए हैं। भारत में भी अतीत में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे सबक लेते हुए अब ग्रिड प्रबंधन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। ग्रिड स्थिरता का अर्थ केवल पर्याप्त बिजली उत्पादन नहीं, बल्कि सही समय पर सही स्थान तक बिजली पहुंचाने की क्षमता भी है। यही कारण है कि ट्रांसमिशन नेटवर्क, वितरण प्रणाली और ऊर्जा भंडारण (स्टोरेज) को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ रही है बिजली की मांग
भारत में बिजली की मांग लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है। वर्ष 2024 में देश में लगभग 250 गीगावॉट की पीक डिमांड दर्ज हुई थी। वर्ष 2025 में इसमें कुछ कमी आई, लेकिन 2026 में मांग फिर तेजी से बढ़ी है। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल के अनुसार चालू वित्त वर्ष में 271 गीगावॉट की पीक मांग का अनुमान था, जबकि 21 मई को ही मांग 270.8 गीगावॉट तक पहुंच गई। अच्छी बात यह रही कि उस समय देश की उत्पादन क्षमता 283 गीगावॉट रही, जिससे मांग को पूरा करने में कोई बड़ी कठिनाई नहीं आई। हालांकि आने वाले वर्षों की तस्वीर और अधिक चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है। मंत्रालय का अनुमान है कि वर्ष 2027 तक देश में बिजली की पीक मांग 330 गीगावॉट तक पहुंच सकती है। यह संकेत है कि भारत को केवल उत्पादन बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि ऊर्जा मिश्रण और वितरण तंत्र को भी मजबूत करना होगा।
सौर ऊर्जा का विस्तार, लेकिन नई चुनौतियां भी
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। गुजरात और राजस्थान जैसे राज्य अकेले लगभग 40 गीगावॉट तक सौर उत्पादन कर रहे हैं। फिर भी सौर ऊर्जा की अपनी सीमाएं हैं। यह केवल दिन के समय उपलब्ध होती है और मौसम पर भी निर्भर करती है। इसी प्रकार पवन ऊर्जा भी हवा की उपलब्धता पर आधारित है। यही कारण है कि ऊर्जा विशेषज्ञ अब "राउंड-द-क्लॉक" यानी चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली ऊर्जा पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। मंत्री ने भी माना कि केवल नवीकरणीय ऊर्जा के भरोसे ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए परमाणु, जलविद्युत और थर्मल ऊर्जा का संतुलित मिश्रण आवश्यक है।
न्यूक्लियर और हाइड्रो पावर की बढ़ती भूमिका
बैठक में यह भी स्पष्ट संकेत मिला कि भविष्य की ऊर्जा रणनीति में परमाणु और जलविद्युत परियोजनाओं की भूमिका बढ़ने वाली है। परमाणु ऊर्जा को सबसे स्थिर स्रोत माना जाता है क्योंकि यह लगातार उपलब्ध रहती है। वहीं पहाड़ी राज्यों में जल संसाधनों की उपलब्धता को देखते हुए नए हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। मनोहर लाल ने कहा कि पर्वतीय राज्यों में देश की हाइड्रो क्षमता लगातार बढ़ रही है और सरकार इस दिशा में तेजी से काम कर रही है।
ऊर्जा भंडारण और ट्रांसमिशन नेटवर्क पर विशेष फोकस
सौर ऊर्जा के तेजी से विस्तार के बावजूद सबसे बड़ी चुनौती उसके भंडारण और ट्रांसमिशन की है। उत्पादन स्थल और खपत क्षेत्र अक्सर अलग-अलग होते हैं, जिसके कारण मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क की आवश्यकता होती है। केंद्र सरकार अब ऊर्जा भंडारण परियोजनाओं तथा नए ट्रांसमिशन कॉरिडोर विकसित करने पर विशेष ध्यान दे रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दिन में उत्पादित सौर ऊर्जा का उपयोग रात में भी किया जा सके।
इलेक्ट्रिक वाहनों से बदलेगा ऊर्जा परिदृश्य
बैठक में ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) का विषय भी प्रमुखता से उठा। सरकार का मानना है कि भविष्य में पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करके बिजली आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना होगा। इलेक्ट्रिक वाहनों, इंडक्शन आधारित रसोई प्रणालियों और बिजली संचालित उपकरणों का उपयोग बढ़ाने की रणनीति इसी सोच का हिस्सा है। हालांकि इसका सीधा अर्थ यह भी है कि भविष्य में बिजली की मांग और तेजी से बढ़ेगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी अतिरिक्त बिजली खपत का बड़ा कारण बनेंगे। इसलिए अभी से दीर्घकालिक तैयारी आवश्यक है।
स्मार्ट मीटर: बिजली क्षेत्र में अगला बड़ा सुधार
बैठक में प्रीपेड स्मार्ट मीटर योजना पर भी विस्तार से चर्चा हुई। केंद्रीय मंत्री के अनुसार स्मार्ट मीटर बिजली चोरी रोकने, बिलिंग में पारदर्शिता लाने और उपभोक्ताओं को अपनी खपत पर बेहतर नियंत्रण देने का प्रभावी माध्यम हैं। सरकार की योजना पहले सरकारी कार्यालयों में प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाने की है। इसके बाद बड़े बिजली उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी जाएगी। फिलहाल सामान्य घरेलू उपभोक्ताओं को इस व्यवस्था से अलग रखा गया है। स्मार्ट मीटरिंग को बिजली वितरण क्षेत्र में संरचनात्मक सुधारों का महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
निष्कर्ष: ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक दौर केंद्रीय विद्युत मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति की यह बैठक स्पष्ट संकेत देती है कि भारत अब केवल बिजली उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एक समग्र ऊर्जा रणनीति पर काम कर रहा है। ग्रिड स्थिरता, नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु शक्ति, जलविद्युत, ऊर्जा भंडारण, स्मार्ट मीटर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे विषय भविष्य की ऊर्जा नीति के केंद्र में हैं। आने वाले वर्षों में यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य हासिल करना है तो बिजली क्षेत्र को और अधिक मजबूत, आधुनिक और लचीला बनाना होगा। बैठक में हुई चर्चाओं से यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार बढ़ती मांग और भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक रोडमैप तैयार करने में जुटी हुई है।
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