Edited By Isha, Updated: 21 Aug, 2026 08:31 AM

हरियाणा में पुलिस हिरासत के दौरान होने वाली अमानवीय घटनाओं, यातना, लापरवाही और हिरासत में होने वाली अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में राज्य सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
चंडीगढ़ : हरियाणा में पुलिस हिरासत के दौरान होने वाली अमानवीय घटनाओं, यातना, लापरवाही और हिरासत में होने वाली अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में राज्य सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
आयोग के सदस्य दीप भाटिया द्वारा एक मामले में कड़ा रुख अपनाए जाने और प्रभावी कार्रवाई के निर्देशों के बाद गृह विभाग, हरियाणा सरकार ने 'पुलिस हिरासत में मृत्यु होने पर मुआवजे के भुगतान की नीति' संबंधी आधिकारिक गजट अधिसूचना जारी की है। मामले की शुरूआत आयोग में दर्ज शिकायत से हुई।
शिकायतकर्ता परवेश शर्मा, निवासी पिंजौर, को स्थानीय पुलिस द्वारा जांच में शामिल होने के लिए नोटिस जारी किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि कालका अदालत से नियमित जमानत मिलने के बावजूद उन्हें 15 जुलाई 2025 को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया तथा थाने में उनके साथ कथित रूप से मारपीट और थर्ड-डिग्री टॉर्चर किया गया, जिससे उनकी हालत गंभीर हो गई।
इस मामले में आयोग के सदस्य दीप भाटिया ने मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन को गंभीरता से लेते हुए विस्तृत सुनवाई की और पुलिस हिरासत में व्यक्ति के साथ होने वाले व्यवहार तथा अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए। दीप भाटिया के हस्तक्षेप और जवाबदेही तय करने की दिशा में दिए गए निर्देशों के बाद हरियाणा सरकार के गृह विभाग ने पुलिस हिरासत में अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में मुआवजा देने की नीति को गजट अधिसूचना के माध्यम से औपचारिक रूप प्रदान किया है। अधिसूचना के अनुसार, निर्धारित परिस्थितियों में पुलिस हिरासत में मृत्यु होने पर मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों/निकटतम परिजनों को 7.5 लाख का मुआवजा प्रदान किया जाएगा।
आयोग ने अपनाया सख्त रुखः सुनवाई के दौरान जब गृह विभाग की ओर से पीड़ित को मुआवजा देने से इंकार किया गया तथा संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध की गई विभागीय कार्रवाई को आयोग ने अपर्याप्त माना, तो सदस्य दीप भाटिया ने मामले में कड़ा रुख अपनाया। आयोग ने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत में यातना, मारपीट अथवा अवैध हिरासत जैसे कृत्य व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से सीधे जुड़े मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन हैं। आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि केवल मामूली विभागीय दंड देकर ऐसे मामलों को समाप्त करना पर्याप्त नहीं है तथा पीड़ित को प्रभावी राहत और मुआवजा प्रदान करना आवश्यक है।
मुआवजा इन परिस्थितियों में देय होगा
- पुलिस कर्मचारियों द्वारा की गई यातना अथवा मारपीट के कारण मृत्यु होने पर।
- पुलिस हिरासत में बंद व्यक्तियों के आपसी झगड़े में मृत्यु होने पर।
- पुलिस हिरासत में आत्महत्या के मामले में।
- पुलिस कर्मचारियों अथवा मैडीकल स्टाफ की लापरवाही के कारण मृत्यु होने पर, यदि मैजिस्ट्रियल जांच में इसकी पुष्टि होती है।