भर्ती प्रक्रिया में मनमानी पर हाईकोर्ट सख्त, एच.एस.एस.सी. को फटकार

Edited By Manisha rana, Updated: 20 Mar, 2026 10:28 AM

high court takes stern action against hssc over arbitrary recruitment process

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग की भर्ती प्रक्रिया पर कड़ी नाराजगी जताते हुए उसे अपारदर्शी और मनमाना करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चयनित उम्मीदवारों को विभाग आवंटन की मौजूदा प्रक्रिया निष्पक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ...

चंडीगढ़ : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग की भर्ती प्रक्रिया पर कड़ी नाराजगी जताते हुए उसे अपारदर्शी और मनमाना करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चयनित उम्मीदवारों को विभाग आवंटन की मौजूदा प्रक्रिया निष्पक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है और इसमें तत्काल सुधार जरूरी है। न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने आयोग को निर्देश दिया कि भर्ती और विभाग आवंटन के लिए पारदर्शी, कानूनी और तर्कसंगत मानदंड तैयार किए जाएं। साथ ही हरियाणा और पंजाब के मुख्य सचिवों को 3 महीने के भीतर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने के आदेश दिए गए हैं।

अदालत ने दो टूक कहा कि जहां एक ही परीक्षा के माध्यम से विभिन्न विभागों में भर्ती होती है, वहां योग्यता-आधारित विभाग आवंटन अनिवार्य होना चाहिए। न्यायालय के अनुसार, केवल मेरिट लिस्ट बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि विभागों का आवंटन भी उसी आधार पर होना चाहिए। कोर्ट ने चेताया कि इस प्रक्रिया में किसी भी तरह की अनियमितता अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 का उल्लंघन होगी, जो समानता और समान अवसर की गारंटी देते हैं। न्यायमूर्ति बराड़ ने कहा कि यदि अधिक अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को उसकी पसंद का विभाग नहीं मिलता और कम अंक वाले को बेहतर विभाग दे दिया जाता है, तो यह न केवल तर्कहीन है बल्कि योग्य उम्मीदवारों का मनोबल भी गिराता है। इससे संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

कम योग्यता वालों को पसंदीदा विभाग देने पर उठे सवाल

मामला तब सामने आया जब पांच याचिकाकर्ताओं ने आयोग की विभाग आवंटन प्रक्रिया को चुनौती दी। एक याचिकाकर्ता, जिसने 65 अंक हासिल किए थे, उसे पसंद का विभाग नहीं मिला, जबकि 63 अंक पाने वाले उम्मीदवार को मनचाहा विभाग दे दिया गया। आयोग ने अपने बचाव में कहा कि कम वरीयताएं भरने वाले उम्मीदवारों को एक आंतरिक एल्गोरिदम के तहत प्राथमिकता दी गई। लेकिन अदालत को इस प्रक्रिया में गंभीर विसंगतियां मिलीं। आयोग के सचिव ने हलफनामे में स्वीकार किया कि 2019 में तय किए गए आवंटन मानदंड कभी सार्वजनिक नहीं किए गए।

अदालत ने आयोग के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि सभी विभागों का वेतनमान समान है, इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता। कोर्ट ने इसे "कमजोर और अविश्वसनीय दलील बताते हुए कहा कि वास्तविकता में कुछ विभाग, जैसे लोक निर्माण और सिंचाई, अधिक वांछनीय होते हैं। अंत में, अदालत ने साफ कहा कि विभागीय प्राथमिकताओं को मान्यता देने के बावजूद आवंटन के मानदंडों को छिपाना गंभीर त्रुटि है, जो पारदर्शिता और निष्पक्षता दोनों के खिलाफ है।

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