Edited By Manisha rana, Updated: 14 Feb, 2026 04:56 PM

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने यह मानते हुए कि अंतिम जांच रिपोर्ट को 8 हरियाणा सिविल सेवा (एच.सी.एस.) अधिकारियों के खिलाफ उनकी चयन प्रक्रिया से असंबंधित एफ.आई.आर. में प्रस्तुत करना 'कानून के अनुसार नहीं है और प्रकृति में अवैध है', उनके संबंध में आरोप...
चंडीगढ़ : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने यह मानते हुए कि अंतिम जांच रिपोर्ट को 8 हरियाणा सिविल सेवा (एच.सी.एस.) अधिकारियों के खिलाफ उनकी चयन प्रक्रिया से असंबंधित एफ.आई.आर. में प्रस्तुत करना 'कानून के अनुसार नहीं है और प्रकृति में अवैध है', उनके संबंध में आरोप पत्र को रद्द कर दिया है।
जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी ने फैसला सुनाया कि अधिकारियों का नाम न तो एफ. आई.आर. में था और न ही उनकी जांच की गई। बिना किसी जांच के 18 साल बाद उनके नाम शामिल किए गए। याचिकाओं को स्वीकार करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि यह निर्विवाद है कि 2005 में दर्ज एफ.आई.आर. में याचिकाकर्ताओं को आरोपी के रूप में नामित नहीं किया गया था और न ही एफ. आई.आर. का विषय याचिकाकर्ताओं के चयन से संबंधित था।
एफ. आई. आर. सहायक प्रोफैसरों के पदों के लिए चयन से संबंधित है, जो एक पूरी तरह से अलग चयन प्रक्रिया है। 18 साल बाद, 2023 में पुलिस ने 30 जून, 2023 को धारा 173 सी.आर.पी.सी. के तहत एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें याचिकाकर्ताओं के नाम शामिल थे लेकिन उनके संबंध में कोई जांच नहीं की गई थी।
करण सिंह दलाल ने लगाए थे अनियमितताओं के आरोप
याचिकाकर्ता उन 64 उम्मीदवारों में शामिल थे जिनका चयन 4 सितम्बर, 2002 को हरियाणा लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित हरियाणा सिविल सेवा और संबद्ध सेवाओं में विभिन्न पदों के लिए किया गया था। उन्होंने 2002 में सेवा में कार्यभार ग्रहण किया और चयन ग्रेड प्राप्त करते हुए सेवा जारी रखी लेकिन चयन प्रक्रिया शुरू होने से पहले, 31 जुलाई 2002 को तत्कालीन विधायक करण सिंह दलाल ने भाई-भतीजावाद और अनियमितताओं के आरोपों के आधार पर पूरी चयन प्रक्रिया को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की थी। यह रिटा याचिका अभी भी एक खंडपीठ के समक्ष लंबित थी, जिसने 16 दिसम्बर 2010 को टिप्पणी की कि इन आरोपों की जांच 'क्षेत्र से बाहर के किसी व्यक्ति/संस्था द्वारा की जानी चाहिए।
जुलाई 2022 में, राज्य सरकार ने उनके नामों को संघ लोक सेवा आयोग (यू.पी.एस.सी.) को भेजे गए एक पैनल में शामिला किया था, ताकि 2020-21 की चयन सूची में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस.) के लिए नामांकन पर विचार किया जा सके। हालांकि, यू.पी.एस.सी. की बैठक स्थगित कर दी गई थी और उनके नामों पर अभी विचार किया जाना बाकी था। उनकी ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गुरमिंद्र सिंह और पी. एस. अहलूवालिया, इंदर पाल गोयल और कीरत ढिल्लो ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं का नाम 30 जून, 2023 को पुलिस/सतर्कता ब्यूरो द्वारा अदालत में प्रस्तुत आरोप पत्र मे 'प्रतिवादी-राज्य द्वारा दुर्भावनापूर्ण कारणों से' शामिल किया गया था, जिसका उद्देश्य राज्य सरकार द्वारा यू.पी.एस.सी. को भेजे गए पैनल में नामित किए जाने के बाद आई.ए.एस. पद पर उनके चयन पर विचार को खतरे में डालना था।
18 अक्तूबर, 2005 की एफ. आई. आर. हरियाणा लोक सेवा आयोग द्वारा सहायक प्रोफैसरों के चयन से संबंधित थी याचिकाकर्ताओं का नाम एफ. आई. आर. में नहीं था और आरोप एक अलग चयन प्रक्रिया से संबंधित थे। दोनों पक्षों की दलीले सुनने के बाद न्यायमूर्ति पुरी ने कहा कि तथ्यों और परिस्थितियों से यह स्पष्ट है कि न तो उन्हें एफ. आई. आर. में आरोपी के रूप में नामित किया गया था और न ही कोई जांच की गई थी। यह न्यायालय संतुष्ट है कि वर्तमान याचिकाकर्ताओं के संबंध में धारा 173 सी.आर.पी. सी. के तहत रिपोर्ट प्रस्तुत करना कानून के अनुसार नहीं था और यह अवैध प्रकृति का है।