5 रुपये के गोलगप्पों के विवाद पर 12 साल बाद फैसला, महम अदालत ने 9 लोगों को किया बरी

Edited By Krishan Rana, Updated: 12 Mar, 2026 09:30 PM

12 years after the rs 5 golgappa controversy the meham court acquitted 9 people

कस्बे के राजीव चौक पर वर्ष 2013 में गोलगप्पों को लेकर हुए विवाद के मामले में महम अदालत ने 12 साल बाद अपना फैसला सुनाया

रोहतक : कस्बे के राजीव चौक पर वर्ष 2013 में गोलगप्पों को लेकर हुए विवाद के मामले में महम अदालत ने 12 साल बाद अपना फैसला सुनाया है। अदालत ने बुधवार को दोनों पक्षों से जुड़े 9 लोगों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।

अदालत से बरी होने वालों में तत्कालीन महम थाना प्रभारी एवं वर्तमान में गुहला (कैथल) में डीएसपी के पद पर तैनात कुलदीप बेनीवाल, तत्कालीन पुलिस चौकी इंचार्ज रामनिवास, एएसआई धर्मबीर, एएसआई सुभाष, रेहड़ी संचालक सूबे सिंह, पड़ोसी रेहड़ी संचालक अजय नेहरा, आरोपी अनिल और उसके दो अन्य साथी शामिल हैं।

क्या था मामला
अदालत में दर्ज मामले के अनुसार 21 मई, 2013 की शाम करीब सात बजे महम के राजीव चौक पर सूबे सिंह गोलगप्पों की रेहड़ी लगाए हुए थे। उसी दौरान महम निवासी अनिल अपने दो दोस्तों के साथ वहां गोलगप्पे खाने के लिए पहुंचा। उन्होंने रेहड़ी संचालक से गोलगप्पों का भाव पूछा, जिस पर सूबे सिंह ने पांच रुपये में चार गोलगप्पे देने की बात कही।

आरोप के मुताबिक युवकों ने कहा कि अन्य रेहड़ी संचालक पांच रुपये में पांच गोलगप्पे दे रहे हैं, तो वह कम क्यों दे रहा है। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों के बीच कहासुनी हो गई, जो देखते ही देखते झगड़े और मारपीट में बदल गई। इसके बाद रेहड़ी संचालक की शिकायत पर महम पुलिस ने अनिल सहित तीन युवकों के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज किया था।

वहीं, अनिल ने अगले दिन अस्पताल में मेडिकल कराने के बाद तत्कालीन थाना प्रभारी कुलदीप बेनीवाल, पुलिस चौकी इंचार्ज रामनिवास, एएसआई धर्मबीर, एएसआई सुभाष, रेहड़ी संचालक सूबे सिंह और पड़ोसी रेहड़ी संचालक अजय नेहरा के खिलाफ मारपीट का आरोप लगाते हुए शिकायत दी थी।

सुनवाई नहीं होने पर अनिल के पिता सत्यवान, जो उस समय उत्तर हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम में फोरमैन के पद पर कार्यरत थे, ने 10 अक्टूबर 2013 को महम अदालत में शिकायत दायर कर अपने बेटे की पिटाई का आरोप लगाते हुए तत्कालीन थाना प्रभारी समेत छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करवाया था। इस मामले में पिछले 12 वर्षों के दौरान अदालत में कुल 15 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के चलते सभी आरोपियों को बरी कर दिया।  

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