अब बदलेगा शहरी नक्शा : छोटे शहर बनेंगे विकास के नए पावरहाउस, नगर निकाय भी होंगे आत्मनिर्भर

Edited By Isha, Updated: 15 Apr, 2026 07:17 PM

small cities will become new powerhouses of development

देश के शहरी विकास को नई रफ्तार देने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय ऊर्जा, शहरी विकास एवं आवासन मंत्री मनोहर लाल ने शहरी चुनौती कोष (अर्बन चैलेंज फंड) और क्रेडिट रिपमेंट गारंटी सब-स्कीम (सीआरजीएसएस) को

चंडीगढ( चन्द्र शेखर धरणी): देश के शहरी विकास को नई रफ्तार देने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय ऊर्जा, शहरी विकास एवं आवासन मंत्री मनोहर लाल ने शहरी चुनौती कोष (अर्बन चैलेंज फंड) और क्रेडिट रिपमेंट गारंटी सब-स्कीम (सीआरजीएसएस) को लांच किया। एक लाख करोड़ के शहरी चुनौती कोष के साथ चार लाख करोड़ निवेश का रोडमैप तैयार किया गया है, जिसमें विशेष फोकस टियर-2 और टियर-3 शहरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की योजना है। 

नई दिल्ली में केंद्रीय शहरी एवं आवासन मंत्री मनोहर लाल ने विधिवत रूप से अर्बन चैलेंज फंड को लांच किया। देश के शहरी बुनियादी ढांचे के वित्त पोषण में बदलाव लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे अर्बन चैलेंज फंड के जरिये नगर निकायों को म्युनिसिपल बॉन्ड, बैंक ऋण और पीपीपी के जरिए संसाधन जुटाने का अवसर मिलेगा। साथ ही, सीआरजीएसएस के माध्यम से छोटे शहरों को क्रेडिट गारंटी का सहारा मिलेगा, जिससे वे भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भागीदारी कर सकेंगे। कार्यक्रम में मध्यप्रदेश, गुजरात और ओडिशा सहित विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी वीडियो क्रांफ्रेंसिंग के जरिये जुड़े।

केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने कहा कि एक लाख करोड़ की केंद्रीय सहायता वाले इस फंड के माध्यम से केंद्र सरकार 4 लाख करोड़ तक के निवेश को आकर्षित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। यह फंड पारंपरिक अनुदान प्रणाली से आगे बढ़कर निवेश को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण होगा। अब शहरों को केवल फंड देने के बजाय उन्हें वित्तीय रूप से मजबूत, जवाबदेह और निवेश के लिए तैयार बनाना ही केंद्र सरकार का मुख्य उद्देश्य है।

पीपीपी मोड के जरिये जुटाया जाएगा 50 प्रतिशत फंड
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत के शहर आज आर्थिक विकास, नवाचार और रोजगार के केंद्र बन रहे हैं और ‘विकसित भारत @2047’ का सपना इन्हीं शहरों की मजबूती पर निर्भर करता है। यूसीएफ की खास बात यह है कि इसमें केंद्रीय सहायता परियोजना लागत के अधिकतम 25 प्रतिशत तक सीमित रहेगी, जबकि कम से कम 50 प्रतिशत फंड म्युनिसिपल बॉन्ड, बैंक ऋण और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के जरिए जुटाया जाएगा। इससे न केवल वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित होगा बल्कि निजी निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा। कुल आवंटन में से 90,000 करोड़ परियोजनाओं के लिए, 5,000 करोड़ परियोजना की तैयारी और क्षमता निर्माण के लिए और 5,000 करोड़ क्रेडिट पुनर्भुगतान गारंटी उप-योजना के लिए निर्धारित किए गए हैं।

निकायों को वित्तीय क्षमता मजबूत करने के लिए किया जाएगा प्रेरित 
यूसीएफ कोष शहरों में परिवर्तनकारी परियोजनाओं को बढ़ावा देगा, जिनमें पुराने शहरों और बाजारों का पुनर्विकास, शहरी परिवहन और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी, गैर-मोटर चालित परिवहन, जल और स्वच्छता ढांचा तथा जलवायु-लचीला विकास शामिल हैं। इस योजना के तहत केवल वही परियोजनाएं प्राथमिकता में होंगी जो स्केलेबल, प्रभावशाली और वित्तीय रूप से व्यवहार्य (बैंक योग्य) हों, ताकि उनका दीर्घकालिक असर दिखाई दे। शहरी स्थानीय निकायों को इस योजना का प्रमुख स्तंभ बताते हुए उन्होंने कहा कि निकायों को अपनी वित्तीय क्षमता मजबूत करने, सुधार लागू करने और बाजार आधारित फंडिंग अपनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

‘शहरी चुनौती कोष’ वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक लागू रहेगा
आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के सचिव श्रीनिवास कटिकिथाला ने कहा कि भारत का शहरीकरण अब एक निर्णायक मोड़ पर है और यूसीएफ इस दिशा में सुधार-आधारित और परिणाम-उन्मुख ढांचा प्रदान करता है। कार्यक्रम के दौरान एक ई-डायरेक्टरी लॉन्च की गई, जो शहरों को वित्तीय संस्थानों, बैंकों और क्रेडिट एजेंसियों से जोड़ने का काम करेगी। साथ ही, केंद्र और राज्यों के बीच एमओयू तथा विभिन्न हितधारकों के साथ लेटर ऑफ इंटेंट पर डिजिटल हस्ताक्षर किए गए, जिससे एक मजबूत और समन्वित कार्यान्वयन तंत्र तैयार किया जा सके। यह महत्वाकांक्षी ‘शहरी चुनौती कोष’ वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक लागू रहेगा, जिसका उद्देश्य भारत के शहरों को नए आर्थिक विकास केंद्रों और भविष्य के ग्रोथ इंजन के रूप में विकसित करना है। यह फंड बुनियादी ढांचे के निर्माण को वित्तीय स्थिरता और संस्थागत मज़बूती के साथ जोड़ता है, और साथ ही परियोजनाओं की बैंक-योग्यता तथा वित्तीय अनुशासन पर भी विशेष बल देता है।

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