जनसंख्या नहीं, अब स्वस्थ जीवन बनेगा भारत की अगली बड़ी चुनौती, NFHS रिपोर्ट ने दिखाई बदलते समाज की तस्वीर

Edited By Harman, Updated: 10 Jun, 2026 05:44 PM

not population but healthy living will now be india s next major challenge

भारत का सामाजिक और स्वास्थ्य परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। यह बदलाव केवल सड़कों, इमारतों या आय के आंकड़ों में नहीं दिखता, बल्कि घरों की रसोई, परिवारों की सोच, महिलाओं की भूमिका और लोगों की जीवनशैली में स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है। एक समय था जब परिवार...

चंडीगढ़ (चंद्र शेखर धरणी) : भारत का सामाजिक और स्वास्थ्य परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। यह बदलाव केवल सड़कों, इमारतों या आय के आंकड़ों में नहीं दिखता, बल्कि घरों की रसोई, परिवारों की सोच, महिलाओं की भूमिका और लोगों की जीवनशैली में स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है। एक समय था जब परिवार की पहचान बच्चों की संख्या से होती थी। कम उम्र में विवाह, जल्दी परिवार बढ़ाना और स्वास्थ्य को लेकर सीमित जागरूकता सामान्य बात थी। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

अब शादी के बाद पहली प्राथमिकता बच्चे नहीं, बल्कि करियर और आर्थिक स्थिरता बनती जा रही है। परिवार छोटा रखने की सोच मजबूत हुई है और माता-पिता कम बच्चों पर अधिक संसाधन और बेहतर अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दे रहे हैं। महिलाएं पहले की तुलना में अधिक शिक्षित हैं, डिजिटल दुनिया से जुड़ी हैं और परिवार के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी भागीदारी बढ़ी है। लेकिन इसी सकारात्मक परिवर्तन के साथ एक नई चुनौती भी सामने आई है—जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का तेजी से बढ़ता खतरा।

परिवार नियोजन बना निजी रणनीति

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-6) के अनुसार देश में परिवार नियोजन अपनाने वाली विवाहित महिलाओं का प्रतिशत 66.7 से बढ़कर 69.1 प्रतिशत हो गया है। हालांकि आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों का उपयोग 56.4 प्रतिशत से घटकर 52.7 प्रतिशत रह गया, जबकि पारंपरिक तरीकों का उपयोग 10.3 प्रतिशत से बढ़कर 16.4 प्रतिशत तक पहुंच गया।

चंडीगढ़, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में यह बदलाव और स्पष्ट दिखाई देता है। चंडीगढ़ में पारंपरिक परिवार नियोजन अपनाने वाली विवाहित महिलाओं की संख्या बढ़ी है, जबकि आधुनिक साधनों का उपयोग घटा है। हरियाणा और पंजाब में भी लगभग 21.4 प्रतिशत विवाहित महिलाएं पारंपरिक तरीकों को प्राथमिकता दे रही हैं। यह संकेत देता है कि परिवार नियोजन अब केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और आर्थिक योजना का हिस्सा बनता जा रहा है। पहले करियर, फिर घर और उसके बाद बच्चों की योजना—यह सोच तेजी से समाज में जगह बना रही है।

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी बदल रही सामाजिक संरचना

समाज में सबसे सकारात्मक बदलाव महिलाओं की बढ़ती शिक्षा और डिजिटल पहुंच के रूप में सामने आया है। उत्तराखंड में 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में 10 या उससे अधिक वर्ष की शिक्षा पूरी करने वालों का प्रतिशत 50.4 से बढ़कर 56.1 प्रतिशत हो गया है। इंटरनेट उपयोग करने वाली महिलाओं की संख्या 45.1 प्रतिशत से बढ़कर 76.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है। वहीं घर या जमीन पर महिलाओं की हिस्सेदारी भी 16.5 प्रतिशत से बढ़कर 23.7 प्रतिशत दर्ज की गई है।
यह केवल आंकड़ों का बदलाव नहीं है। इसका अर्थ है कि महिलाओं के पास अब अधिक जानकारी, अधिक विकल्प और निर्णय लेने की बेहतर क्षमता है। इसका प्रभाव बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और आर्थिक प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में साफ दिखाई दे रहा है।

जीवनशैली का असर, शरीर दे रहा चेतावनी

जहां सामाजिक बदलाव सकारात्मक संकेत दे रहे हैं, वहीं स्वास्थ्य के मोर्चे पर नई चुनौतियां उभर रही हैं। हरियाणा में महिलाओं में ओवरवेट और मोटापे की दर 33.1 प्रतिशत से बढ़कर 37.3 प्रतिशत हो गई है। पुरुषों में यह आंकड़ा 28.3 प्रतिशत से बढ़कर 33.9 प्रतिशत पहुंच गया है। महिलाओं में हाई ब्लड शुगर के मामले 11.9 प्रतिशत से बढ़कर 16.7 प्रतिशत और पुरुषों में 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 18.5 प्रतिशत तक पहुंच गए हैं। चंडीगढ़ की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां महिलाओं में मोटापे की दर 41.9 प्रतिशत और पुरुषों में 48.5 प्रतिशत दर्ज की गई है। यानी लगभग हर दूसरा पुरुष अतिरिक्त वजन की समस्या से जूझ रहा है। हिमाचल प्रदेश, जिसे लंबे समय तक बेहतर जीवनशैली वाला राज्य माना जाता रहा, वहां भी महिलाओं में मोटापा 30.4 प्रतिशत से बढ़कर 38.2 प्रतिशत तक पहुंच गया है। हाई ब्लड शुगर के मामलों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्पष्ट संकेत है कि आर्थिक और सामाजिक प्रगति अपने आप बेहतर स्वास्थ्य की गारंटी नहीं देती।

बदलती आदतें बन रहीं नया खतरा

पहले स्वास्थ्य जोखिमों का संबंध मुख्य रूप से तंबाकू और शराब से जोड़ा जाता था। लेकिन आज का संकट कहीं अधिक जटिल है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, मोबाइल और लैपटॉप पर बढ़ता समय, शारीरिक गतिविधियों में कमी, बाहर के भोजन पर बढ़ती निर्भरता, कम नींद और लगातार मानसिक तनाव नई जीवनशैली का हिस्सा बन चुके हैं।  स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह "साइलेंट हेल्थ क्राइसिस" है, जिसमें धूम्रपान न करने वाले लोग भी मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों के खतरे में आ रहे हैं। यानी बीमारी का कारण अब केवल बुरी आदतें नहीं, बल्कि पूरा जीवन जीने का तरीका बन गया है।

अगली चुनौती इलाज नहीं, स्वस्थ जीवनशैली

इस बदलाव के बीच एक राहत भरी तस्वीर भी सामने आई है। देश में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत 90.6 तक पहुंच चुका है। इसका अर्थ है कि दस में से नौ से अधिक बच्चों का जन्म अस्पतालों में हो रहा है, जिससे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है।
लेकिन आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती अस्पतालों का विस्तार नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना होगी। भारत की अगली बड़ी बहस जनसंख्या वृद्धि पर नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता पर केंद्रित होगी। सवाल यह नहीं होगा कि लोग कितने वर्ष जी रहे हैं, बल्कि यह होगा कि वे कितने स्वस्थ और सक्रिय तरीके से जीवन जी रहे हैं।

स्पष्ट है कि भारत एक नए सामाजिक और स्वास्थ्य परिवर्तन के दौर में प्रवेश कर चुका है। छोटे परिवार, सशक्त महिलाएं और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं भविष्य की मजबूत नींव हैं, लेकिन बढ़ती जीवनशैली संबंधी बीमारियां इस प्रगति के सामने नई चुनौती बनकर खड़ी हैं। आने वाले समय में सफलता उसी समाज की होगी, जो विकास के साथ-साथ स्वास्थ्य को भी अपनी प्राथमिकता बनाएगा।

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