Edited By Gaurav Tiwari, Updated: 01 May, 2026 05:46 PM

1 मई को हाथी मेरे साथी को 55 साल पूरे हो रहे हैं। लेकिन ये फिल्म सिर्फ एक पुरानी हिट नहीं है—ये आज भी लोगों की यादों और दिलों में ज़िंदा है|
गुड़गांव ब्यूरो : 1 मई को हाथी मेरे साथी को 55 साल पूरे हो रहे हैं। लेकिन ये फिल्म सिर्फ एक पुरानी हिट नहीं है—ये आज भी लोगों की यादों और दिलों में ज़िंदा है| 1971 में रिलीज़ हुई ये फिल्म उस समय आई जब राजेश खन्ना अपने करियर के सबसे बड़े दौर में थे। आराधना, कटी पतंग, अमर प्रेम, अपना देश और सफर जैसी कई हिट फिल्मों के बीच हाथी मेरे साथी ने अपनी अलग पहचान बनाई। अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट ग्रुप के फाउंडर और सीईओ, सुशीलकुमार अग्रवाल कहते हैं, “कुछ फिल्में अपनी सफलता के लिए याद रखी जाती हैं, और कुछ इस बात के लिए कि उन्होंने हमें कैसा महसूस कराया। हाथी मेरे साथी ऐसी ही फिल्म है, जो लोगों के दिल में बस जाती है। इस फिल्म की कहानी राजू की है, जो बचपन में अनाथ हो जाता है और चार हाथियों के साथ बड़ा होता है। उन्हीं में से एक, रामू, उसके सबसे करीब होता है। उनका रिश्ता सिर्फ इंसान और जानवर का नहीं, बल्कि परिवार जैसा लगता है। रामू सिर्फ एक किरदार नहीं है, वो सच्ची दोस्ती और वफादारी का एहसास है। राजू और रामू का रिश्ता ही इस फिल्म को इतना खास बनाता है, अग्रवाल कहते हैं जैसे-जैसे राजू बड़ा होता है, वो प्यार की दुनिया नाम की एक जगह बनाता है, जहां इंसान और जानवर साथ रहते हैं। उसकी जिंदगी में प्यार और परिवार आता है, लेकिन यहीं से शुरू होता है एक मुश्किल दौर—परिवार और अपने पुराने साथियों के बीच चुनाव।
“इस फिल्म की कहानी बहुत सीधी है, लेकिन दिल को छू लेने वाली है। ये रिश्तों और फैसलों की बात करती है, जिससे हर कोई जुड़ सकता है। रामू का बलिदान इस फिल्म को और भी खास बना देता है। ये सिर्फ एक सीन नहीं, बल्कि एक ऐसा एहसास है जो लंबे समय तक याद रहता है। फिल्म का सबसे यादगार पल तब आता है, जब रामू अपनी जान देकर राजू को बचाता है। ये सीन आज भी लोगों को भावुक कर देता है। एम. ए. थिरुमुगम के निर्देशन में बनी इस फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल ने दिया और गाने आनंद बख्शी ने लिखे, जो आज भी सुने जाते हैं। लेकिन इस फिल्म की असली ताकत इसकी सादगी में है। आज के समय में, जहां हर चीज़ बड़ी और तेज़ हो गई है, हाथी मेरे साथी जैसी फिल्में याद दिलाती हैं कि सादगी में भी कितनी ताकत होती है। इसकी कहानी में एक सच्चाई है, जो सीधे दिल तक जाती है। ये प्यार, साथ और भरोसे की बात बहुत ही आसान तरीके से कहती है,” अग्रवाल बताते हैं। कभी-कभी सबसे असरदार कहानियां वही होती हैं जो बहुत सरल होती हैं। वो सीधे दिल से जुड़ती हैं, इसलिए आज भी लोग उन्हें पसंद करते हैं।”
दिलचस्प बात ये है कि आज की नई पीढ़ी भी इस फिल्म को देख रही है और पसंद कर रही है। भारतीय सिनेमा को सहेजने और लोगों तक पहुंचाने के अपने प्रयास के तहत, अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट ने इस फिल्म को Ultra Play OTT पर उपलब्ध कराया है, ताकि हर पीढ़ी इसे देख सके। 55 साल बाद भी, हाथी मेरे साथी सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक एहसास है। आज के दर्शक सिर्फ नया कंटेंट ही नहीं देख रहे, वो पुरानी फिल्मों को भी दोबारा देख रहे हैं। उनके लिए हाथी मेरे साथी एक नई कहानी की तरह है। हमारा हमेशा से यही प्रयास रहा है कि अच्छी कहानियां लोगों तक पहुंचती रहें। Ultra Play OTT के जरिए हम ऐसी फिल्मों को फिर से दर्शकों तक ला रहे हैं। कुछ कहानियां समय के साथ खत्म नहीं होतीं—वो हमेशा हमारे दिल में रहती हैं।”, अग्रवाल बताते हैं Ultra Play OTT, अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट का हिंदी भाषा का स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म है, जो 5,000+ घंटे से ज्यादा का कंटेंट और 1,800+ से अधिक टाइटल्स का बड़ा कलेक्शन पेश करता है। इसमें क्लासिक और नई फिल्में, वेब सीरीज़ और डब किया गया इंटरनेशनल कंटेंट शामिल है| भारत के प्रमुख कंटेंट कस्टोडियन और सिंडिकेटर के रूप में अल्ट्रा की मजबूत विरासत के साथ, यह प्लेटफॉर्म कई दशकों के सिनेमा को एक साथ लाकर आज के दर्शकों के लिए आसानी से उपलब्ध कराता है। कंटेंट की खोज को आसान बनाने और किफायती कीमत पर ध्यान देते हुए, अल्ट्रा प्ले ओटीटी सिर्फ ₹19 प्रति सप्ताह की सब्सक्रिप्शन पर उपलब्ध है, जो भारत और दुनिया भर के हिंदी भाषी दर्शकों के लिए बनाया गया है।