गुड़गांव में जलभराव पर केंद्रीय राज्यमंत्री ने किया खेद प्रकट, कहा- अधिकारियों की जवाबदेही होगी तय

Edited By Pawan Kumar Sethi, Updated: 02 Sep, 2026 04:30 PM

union minister of state expresses regret over waterlogging in gurgaon

गुरुग्राम में हाल ही में हुई जलभराव की स्थिति को लेकर केंद्रीय राज्य मंत्री एवं गुरुग्राम के सांसद राव इंद्रजीत सिंह ने प्रभावित नागरिकों के प्रति खेद व्यक्त करते हुए कहा कि जलभराव की समस्या का स्थाई समाधान केवल पानी को पंप करके बाहर निकालने से नहीं...

गुड़गांव,(ब्यूरो): गुरुग्राम में हाल ही में हुई जलभराव की स्थिति को लेकर केंद्रीय राज्य मंत्री एवं गुरुग्राम के सांसद राव इंद्रजीत सिंह ने प्रभावित नागरिकों के प्रति खेद व्यक्त करते हुए कहा कि जलभराव की समस्या का स्थाई समाधान केवल पानी को पंप करके बाहर निकालने से नहीं होगा। इसके लिए शहर के प्राकृतिक जल निकासी तंत्र को बहाल करना, बारिश के पानी का अधिक से अधिक संचयन करना और भूजल का पुनर्भरण सुनिश्चित करना होगा। उन्होंने कहा कि जलभराव की समस्या के समाधान के लिए सरकार, प्रशासन और संबंधित एजेंसियों को दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ काम करना होगा।

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केंद्रीय मंत्री बुधवार को गुरुग्राम स्थित पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में जीएमडीए, नगर निगम गुरुग्राम, जिला प्रशासन तथा हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ महत्वपूर्ण बैठक कर रहे थे। बैठक में उन्होंने गुरुग्राम में जलभराव की समस्या से जुड़े विभिन्न पहलुओं की विस्तृत समीक्षा करते हुए इसके प्रभावी एवं दीर्घकालिक समाधान के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। बैठक के बाद उन्होंने प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए जलभराव की समस्या के कारणों, अब तक किए गए प्रयासों तथा भविष्य की कार्ययोजना के संबंध में विस्तार से जानकारी दी। इस दौरान गुरुग्राम के विधायक मुकेश शर्मा तथा भाजपा जिला अध्यक्ष सर्वप्रिय त्यागी भी मौजूद रहे।

 

पुरानी नीतियों और अनियोजित विकास का असर आज भी आ रहा सामने

केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि गुरुग्राम ने पिछले दो दशकों में अभूतपूर्व विकास किया है और आज यह हरियाणा के राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि विकास का विरोध नहीं है, लेकिन विकास की प्रक्रिया में प्राकृतिक जल निकासी तंत्र के साथ हुई छेड़छाड़ का असर आज सामने आ रहा है। उन्होंने पूर्ववर्ती सरकार के वर्ष 2004 से वर्ष 2012 कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय लाइसेंस जारी करते समय कई स्थानों पर प्राकृतिक नदी-नालों और जल प्रवाह के क्षेत्रों को भी विकास क्षेत्र में शामिल कर लिया गया, जिससे समय के साथ प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते बाधित हुए।

 

प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते बाधित होने से बढ़ी समस्या

राव इंद्रजीत सिंह ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में पानी के प्राकृतिक बहाव का रास्ता बंद होने पर जलभराव होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि 2004 से वर्ष 2012 में दिए गए लाइसेंस बिल्डर्स ने करीब करीब वर्ष 2018 तक आते आते गुरुग्राम में बड़ी संख्या में नई कॉलोनियां और निर्माण कार्य हुए, लेकिन इनके साथ प्राकृतिक जल निकासी तंत्र को पर्याप्त रूप से संरक्षित नहीं किया गया। कई स्थानों पर प्राकृतिक नालों में निर्माण सामग्री एवं सीएंडडी वेस्ट डाले जाने से उनकी जल वहन क्षमता भी प्रभावित हुई है।

 

आईआईटी और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से तैयार होगा स्थायी समाधान

उन्होंने कहा कि जलभराव की समस्या का समाधान वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर किया जाना चाहिए। इस दिशा में विशेषज्ञ संस्थानों से सलाह लेने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि संबंधित इंजीनियरिंग विशेषज्ञों की टीम द्वारा पिछले कई महीनों से इस विषय पर अध्ययन किया जा रहा है। उद्देश्य यह है कि गुरुग्राम में बारिश के पानी को केवल बाहर निकालने के बजाय उसका अधिकतम उपयोग भूजल पुनर्भरण और जल संचयन के लिए किया जाए।

 

इंजेक्शन ट्यूबवेल से बारिश के पानी का होगा भूजल पुनर्भरण

केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि जिन क्षेत्रों में जलभराव होता है, वहां तकनीकी रूप से उपयुक्त स्थानों पर इंजेक्शन ट्यूबवेल लगाए जा सकते हैं। इनके माध्यम से उपचारित पानी को वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत भूजल स्तर तक पहुंचाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में पानी की गुणवत्ता और प्रवाह की तकनीकी निगरानी जरूरी होगी, ताकि बिना उपचार के दूषित पानी भूजल में न पहुंचे।

 

सरकारी जमीनों पर विकसित होंगी वाटर बॉडीज

उन्होंने कहा कि नगर निगम और अन्य सरकारी एजेंसियों के पास उपलब्ध ऐसी जमीनों की पहचान की जानी चाहिए, जिनका वर्तमान में कोई उपयोग नहीं हो रहा है। इन स्थानों पर वाटर बॉडीज विकसित कर बारिश के पानी को स्थानीय स्तर पर संग्रहित किया जा सकता है। इससे एक ओर जलभराव की समस्या कम होगी, वहीं दूसरी ओर भूजल पुनर्भरण को भी बढ़ावा मिलेगा।

 

प्राकृतिक नदी-नालों की सैटेलाइट मैपिंग से होगी पहचान

केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि गुरुग्राम में प्राकृतिक नदी-नालों और जल प्रवाह के पुराने मार्गों की सैटेलाइट इमेजिंग कराकर विस्तृत मैपिंग की जाएगी। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि अतीत में पानी किन प्राकृतिक रास्तों से बहता था और वर्तमान में किन स्थानों पर अवरोध पैदा हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि संबंधित विभागों और केंद्रीय स्तर के विशेषज्ञों के साथ इस दिशा में कार्ययोजना तैयार की जा रही है। राव इंद्रजीत सिंह ने कहा कि कई स्थानों पर प्राकृतिक जल निकासी मार्गों के ऊपर अब बड़ी इमारतें, अस्पताल, स्कूल अथवा अन्य निर्माण हो चुके हैं। ऐसे मामलों में यदि कानूनी अथवा व्यावहारिक कारणों से निर्माण हटाना संभव नहीं है तो पानी के प्राकृतिक प्रवाह को वैकल्पिक तकनीकी माध्यम से बहाल करना होगा। उन्होंने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर जमीन के नीचे बड़ी क्षमता वाली पाइपलाइन डालकर पानी को उसके पुराने प्राकृतिक चैनल तक पहुंचाया जा सकता है।

 

जलभराव समाधान की तीन प्रमुख प्राथमिकताएं तय

उन्होंने कहा कि गुरुग्राम के लिए जल प्रबंधन की कार्ययोजना में तीन प्रमुख बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। पहला, बारिश के पानी का अधिकतम भूजल पुनर्भरण, दूसरा, उपयुक्त स्थानों पर जल संचयन एवं वाटर बॉडीज का विकास, और तीसरा, प्राकृतिक नदी-नालों एवं जल निकासी मार्गों की सफाई और पुनर्बहाली। उन्होंने कहा कि इन तीनों उपायों पर एक साथ काम किए बिना जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

 

सीएंडडी वेस्ट से बंद किए गए नालों की होगी पहचान

केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि जिन प्राकृतिक नालों में निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट यानी सीएंडडी वेस्ट डाला गया है, उनकी पहचान की जानी चाहिए। कई स्थानों पर इससे नालों की वास्तविक चौड़ाई और जल वहन क्षमता काफी कम हो गई है। उन्होंने कहा कि ऐसे सभी स्थानों की मैपिंग कराकर पानी के प्रवाह को बहाल करने की दिशा में काम किया जाएगा।

 

गुरुग्राम में भूजल दोहन की स्थिति पर जताई चिंता

राव इंद्रजीत सिंह ने गुरुग्राम में लगातार गिरते भूजल स्तर पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार गुरुग्राम में भूजल का दोहन प्राकृतिक पुनर्भरण की क्षमता से काफी अधिक है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 के आसपास जहां भूजल स्तर करीब 18.8 मीटर के स्तर पर था, वहीं कई क्षेत्रों में वर्ष 2025 तक यह घटकर लगभग 38.5 मीटर तक पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति भविष्य के लिए गंभीर संकेत है और अब बारिश के पानी को जमीन के भीतर पहुंचाने पर विशेष ध्यान देना होगा।

 

जल प्रबंधन में जवाबदेही और निरंतर निगरानी पर दिया जोर

राव इंद्रजीत सिंह ने कहा कि जलभराव और पर्यावरण से जुड़े कार्यों में जवाबदेही सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों के स्थानांतरण के कारण किसी परियोजना की जिम्मेदारी और उसकी पूरी जानकारी प्रभावित नहीं होनी चाहिए। इसके लिए तकनीक आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया जाना चाहिए, ताकि कार्यों की लगातार निगरानी हो सके और किसी स्तर पर लापरवाही की स्थिति में जिम्मेदारी तय की जा सके।

 

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