मुझे अपने आंदोलन के लिए किसी से करेक्टर सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं- सोनम वांगचुक

Edited By Pawan Kumar Sethi, Updated: 25 Jul, 2026 11:42 AM

sonam wangchuk said i dont need character certificate from anyone for movement

नीट परीक्षा लीक मामले में 26 दिन की भूख हड़ताल कर चुके प्रसिद्ध समाज सेवी एवं इंजीनियर सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त करने पर सवालिया निशान लगाए हैं।

गुड़गांव, (ब्यूरो): नीट परीक्षा लीक मामले में 26 दिन की भूख हड़ताल कर चुके प्रसिद्ध समाज सेवी एवं इंजीनियर सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त करने पर सवालिया निशान लगाए हैं। इन सवालों से आहत होकर सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया के जरिए एक वीडियो जारी कर कहा कि वह छात्रों के लिए 26 दिन तक अनशन करने के दौरान उनका 11 किलो वजन कम हो चुका है। ऑर्गन खत्म हो गए हैं। मांसपेशियों और दिमाग पर भी असर पड़ने के कगार पर पहुंच गया था। उन्होंने कहा कि कड़कड़ाती ठंड से निकलकर दिल्ली की तपती धूप में भूख हड़ताल करने के बाद क्या मुझे किसी से करेक्टर सर्टिफिकेट लेना होगा। क्या मुझे यह बताना होगा कि मेरा अनशन कितना पवित्र था। मैने अनशन तोड़ा तो उसके हाथों क्यों तोड़ा, इसके हाथों क्यों नहीं तोड़ा। क्या सौदा हुआ क्या डील हुई। इन सब बातों का जवाब देना होगा।

गुरुग्राम की ताजा खबरों के लिए लिंक  https://www.facebook.com/KesariGurugram  पर क्लिक करें।

 

उन्होंने कहा कि कल से लिक्विड डाइट ले रहा हूं जिससे मेरे शरीर में जान आई है और अपनी जान अब मुझे यह वीडियो जारी करने में लगानी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि दुख के साथ कहना पड़ रहा है सुबह से उनके पास कई फोन आ रहे हैं अपने पद का रौब दिखाते हुए कहा जा रहा है कि आप पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। इन दोनों से अनशन क्यों तुड़वाया, उन तीनों से अनशन क्यों नहीं तुड़वाया। डील और सौदे की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर मुझे सौदा या डील करनी होती तो मैं 26 दिनों तक अनशन पर क्यों बैठता। आपने कई डील देखी होंगी, अगर मुझे डील करनी होती तो मैं आलीशान एसी रूम में बैठकर डील कर लेता। मुझे दिल्ली की गर्मी में रोड साइड पर बैठकर डील करना पड़ता। उन्होंने कहा धिक्कार है ऐसे देश पर जहां ऐसे दिगामी उपज जिसमें से ऐसे नीच ख्यालात निकलते हैं। 

 

उन्होंने कहा कि मैं दोष नहीं देता हूं आप में से ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि मेरे साथ क्या हालात थे। मेरे व मेरे परिवार पर पिछले एक-दो हफ्ते में क्या गुजरा है इसलिए आप लोग शायद ऐसा कह रहे हैं और कुछ लोग शायद जानबूझ कर कह रहे हैं। लोगों लोगों को सलाह भी दी कि किसी बात को सुनने और कहने से पहले उसका बैकग्राउंड जरूर देखो। क्या वह गुस्से, द्वेष में कुछ कह रहे हैं या कोई राजनीतिक दल है जिसे दूसरे किसी राजनीतिक दल से गुस्सा है या न्यूटल कोई व्यक्ति कह रहा है। अगर कोई न्यूटल व्यक्ति कह रहा है तो उसकी बात जरूर सुनो। उन्होंने कहा कि अभी भी प्रयास करूंगा कि जवाब दिया जाए और उनकी सदभावना है कि अगर उन्हें नहीं मालूम कि इन दिनों में क्या हुआ और क्यो अनशन तोड़ा और क्यों इस तरह से तोड़ा।

 

उन्होंने अपने सफदरजंग अस्पताल ले जाने के घटनाक्रम को बताया गया कि 18 जुलाई को उन्हें केवल अस्पताल नहीं बल्कि एक छावनी- जेल थी जहां मुझे ऐसे रखा गया जैसे किसी कैदी को भी नहीं रखा जाता। हर चीज पर पाबंदी थी, न तो बाहर जा सकता था और न ही कोई परिंदा पर मार सकता था। किसी से मिलने तक का अधिकार नहीं था। केवल तीन रिश्तेदार मिल सकते थे। मोबाइल लैपटॉप तक नहीं यूज करने देते थे। किसी तरह से नेपकिन पर संदेश लिखकर लोगों तक पहुंचाते थे। मिलने के लिए लद्दाख से दिल्ली आते थे उन्हें सब वापस भेज दिया जाता था। यह सब अवैध था और एक तरह से देश को नॉर्थ कोरिया बना दिया गया था। खासतौर पर मुझे जहां रखा गया था वह जेल बना दिया था। ऐसे हालात में कई दिन गुजारने के बाद उनकी पत्नी गीताजंलि की सूझबूझ को रविवार को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई कराई गई। सोमवार 20 जुलाई को हाईकोर्ट में अपील की गई जहां याचिका खारिज हो गई। 21 जुलाई को डबल बैंच पर याचिका दायर की गई जहां हाई कोर्ट ने कहा कि वह किसी भी अस्पताल में इलाज के लिए जा सकते हैं। मगर उस दिन भी हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी हाईकोर्ट से आदेश न आने की बात कहकर रोका गया। दो बजे से जारी आदेश शाम 7 बजे तक रोका गया। तीन घंटे सामान पैक करके बैठाया गया। हड़ताल की भी हड़ताल करके, जमीन पर लेटकर हर ताकत आजमा कर 22वें दिन जबरन बाहर आया।

 

इस तरह के वीडियो बाहर न जाएं इसके लिए उनके मोबाइल तक छीन लिए गए। इसके बाद जब वह गुड़गांव के मेदांता अस्पताल आए तो सोचा कि हम भारत के आजाद नागरिक हैं और हमें आजादी होगी, लेकिन हमें बाद में पता लगा कि बाहर छावनी बनाई गई। पुलिसकर्मियों के दस्ते लगा दिए गए। यहां भी किसी को मुझ से मिलने नहीं दिया। यहां भी पाबंदी लगाई गई। यहां उनका ट्रीटमेंट हो रहा है। 21 जुलाई की रात को हाईकोर्ट के आदेश के बाद यहां पहुंचा। इसी रात को देर रात को केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा और जितेंद्र सिंह यहां आए और उन्होंने अनशन तोड़ने की बात कही जिस पर उन्होंने अपनी तीन शर्तें बताई।  इनमें से कुछ शर्तों पर तुरंत ही रजामंदी दे दी, लेकिन कुछ शर्तों पर उन्होंने कहा कि वह पूछकर बताएंगे। 

 

सोनम वांगचुक ने कहा कि उन्हेंं बताया गया था कि कल दोनों मंत्री दोबारा अनशन तुड़वाने के लिए आएंगे, लेकिन वह नहीं चाहते थे कि इन दोनों केंद्रीय मंत्रियों के हाथों वह अनशन तोड़ें। इस दौरान उन्होंने कहा कि विभिन्न राजनीतिक दल, सीजेपी नेता, छात्र नेता सहित लद्दाख से जो नेता यहां आए हैं वे सब अस्पताल में आएं और उनकी उपस्थिति में अनशन तोड़ा जाए। अगले दिन जब करीब 20  सांसद आए, सीजेपी के नेता आए उन्हें सभी को गेट पर ही रोक दिया गया। आधा दिन इंतजार करने के बाद नेताओं, सांसदों को वापस भेज दिया गया। सोनम वांगचुक ने कहा कि मुझ से एक आजाद नागरिक होने का अधिकार छीन लिया गया। उन्होंने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी जो उनसे आजाद नागरिक होने का अधिकार छीना गया है इसके लिए वह कोर्ट के आदेशों के अवहेलना का केस दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। इस दिन कोई भी केंद्रीय मंत्री नहीं आया और बैठकों का दौर चलता रहा। एजेंसी के जरिए बातचीत चलती रही। सरकार को केवल दो मुद्दों छात्रों पर केस न दर्ज करने और शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर लगातार ऐतराज रहा जिस पर उन्होंने अपना रुख साफ कर दिया कि इन मुद्दों के बिना वह अपना अनशन समाप्त नहीं करेंगे।

 

23 जुलाई की रात को सरकार ने जब लिखित रूप से आश्वस्त किया कि किसी भी छात्र पर कोई मुकदमा नहीं होगा जिसके बाद वह अनशन तोड़ने को राजी हुए। उन्होंने कहा कि मेरा फोकस छात्रों पर केस दर्ज न होना था न कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना। इस्तीफे को लेकर मौखिक रूप से ही बात हुई है। उन्होंने कहा कि मेरा फोकस छात्रों को सुरक्षा देना था जबकि सीजेपी शिक्षामंत्री के इस्तीफे पर अड़ी हुई है और वह आज नहीं तो कल यह इस्तीफा ले लेगी। उन्होंने कहा कि जिस तरह से छात्रों का प्रदर्शन चल रहा था उससे डर था कि कनॉट प्लेस एरिया में छात्रों के साथ कुछ बड़ा घटनाक्रम घटित हो सकता है। ऐसे में उनके अनशन करने का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। दिन में सभी नेताओं को वापस भेजने के बाद देर रात को केंद्रीय मंत्री मेदांता अस्पताल आए। इस पर उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के सामने अपना अनशन समाप्त करने की बात कही, लेकिन उन्हें मना कर दिया गया। इस पर उन्होंने अनशन समाप्त करने से इंकार कर दिया था। इसके बावजूद भी उन्होंने सबसे नजदीक दिल्ली में मौजूद लद्दाख के नेताओं को फोन किया और उन्हें पूरी बात बताई जिसके बाद देर रात को वह करीब साढ़े 12 बजे मेदांता अस्पताल पहुंचे और लद्दाख के नेताओं की मौजूदगी में सभी मांगों को मानने का लिखित पत्र लेकर ही अनशन समाप्त किया।

 

उन्होंने उन लोगों को भी अपनी इस वीडियो के माध्यम से करारा जवाब देते हुए कहा कि अगर दिल्ली में हिंसा हो जाती तो यह हिंसा देश के अलग-अलग राज्यों, शहरों में भी हो जाती जिसके गंभीर परिणाम होते। उन्होंने अनशन तोड़ने पर सवाल उठाने वालों को कहा कि आपकी तरह घर के सोफे पर बैठकर यह बोलना बहुत आसान है कि अनशन ऐसे क्यों तोड़ा, लेकिन हालातों को मद्देनजर रखते हुए ही फैसला लिया जाता है। उन्होंने सवालों के घेरे में खड़ा करने वालों को नसीहत देते हुए कहा कि अपनी जुबान को तोलकर फिर बोला करो। जो व्यक्ति हफ्तो से घर नहीं गया। सड़कों पर भूखा-प्यासा पड़ा है उसके लिए कुछ भी बोलते हुए आपको जरा भी रहम नहीं आया। उन्होंने कहा कि मुझे अनशन तोड़ने का दुख तो है कि मुझे उन हालातों में अनशन तोड़ना पड़ा जब मेरे साथी, नेता, छात्र मेरे साथ नहीं थे। उन्होंने कहा कि अगर यह गलत था तो मैं कसूरवार हूं, मुझे सजा दीजिए या माफ कर दीजिए। मैं शायद फिर कभी ऐसी गलती न करूं कि अपनी पूरी जिंदगी देकर दिल्ली की गर्मी में सड़क पर इन हालातों में रहूं। मेरा मानना है कि आपको शायद पता नहीं है कि यहां क्या हालात थे, किस तरह से मुझे यहां रखा गया, दिल्ली को कैसे नॉर्थ कोरिया बनाया गया उस पर भी सवाल उठने चाहिए।

Related Story

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!