महिलाओं के सम्मान की रक्षा नैतिकता के साथ-साथ कानूनी जिम्मेदारी : हरविन्द्र कल्याण

Edited By Manisha rana, Updated: 22 Apr, 2026 10:34 AM

protecting women honour is a moral and legal responsibility harvinder kalyan

हरियाणा विधानसभा सचिवालय की ओर से मंगलवार को ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ के प्रति जागरूक करने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

चंडीगढ़ (धरणी) : हरियाणा विधानसभा सचिवालय की ओर से मंगलवार को ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ के प्रति जागरूक करने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। हरियाणा विधान सभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण और उपाध्यक्ष डॉ. कृष्ण लाल मिड्ढा की उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम में पंजाब विश्वविद्यालय के कानून विभाग की चेयरपर्सन डॉ. वंदना अरोड़ा ने विषय विशेषज्ञ के तौर पर प्रस्तुति दी।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधान सभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण ने कहा कि कार्य स्थल पर महिलाओं के सम्मान की रक्षा का विषय सामाजिकता, नैतिकता के साथ-साथ कानूनी जिम्मेदारी के साथ जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि विधान सभा प्रदेश स्तर तक कानूनी निर्माण की सर्वोच्च संस्था है। यहां के सभी कर्मचारी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कानून निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए हम सभी अपने कार्यस्थल से जुड़े कानूनों के बारे में गहन जानकारी होना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि जागरुकता से बेहतर कानून का निर्माण होता है तो प्रशिक्षण से हमारी कार्य क्षमता बढ़ती है। सभ्य नागरिक परिवार, समाज और अपने कार्यस्थल पर आदर्श भूमिका का निर्वहन करता है। महिला की सुरक्षा और सम्मान का विषय आता है तो हमें इस दृष्टिकोण से सोचना होगा कि जब हमारी बेटियां कार्य के लिए बाहर जाती हैं, तो हम कैसा वातावरण चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हमें यह भी तय करना होगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संकल्पित विकसित भारत 2047 में हम मातृशक्ति को कैसा वातावरण देना चाहते हैं। हमें अपनी संस्कृति से जुड़कर संस्कारवान नागरिक समाज तैयार करना होगा।

उपाध्यक्ष डॉ. कृष्ण लाल मिड्ढा ने अनेक रीति रिवाजों और परंपराओं का उदाहरण देते हुए भारतीय समाज में मातृशक्ति के महत्व को रेखांकित किया। डॉ. मिड्ढा ने कहा कि जिस घर में नारी शक्ति मुस्कुराती है, लक्ष्मी वहां स्वयं चलकर आती हैं। उन्होंने कहा कि लड़कियां अपने पिता और पति दोनों परिवारों की खुशहाली चाहती हैं। यही कारण है कि पिता के घर से विदाई के वक्त सिर के ऊपर से चावल फेंककर वह पिता के घर में सुख-समृद्धि बरकरार रखने की आकांक्षा करती है। इसी प्रकार पति के घर में प्रवेश के वक्त वह पैर से कलश लुढ़काकर देहरी भीतर चावल भेजती है। ये चावल पति के घर खुशहाली के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि गत कुछ वर्षों में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं जैसे कार्यक्रम की बदौलत समाज में सकारात्मक परिवर्तन की बयार चली है। आज बेटियों के जन्म पर भी कुआं पूजन जैसे कार्यक्रम होने लगे हैं।

पंजाब विश्वविद्यालय के कानून विभाग की चेयरपर्सन डॉ. वंदना अरोड़ा ने ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ की बारीकियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम संबंधी कानून पहली बार सर्वोच्च न्यायालय की ओर से 1997 में जारी ‘विशाखा दिशानिर्देशों’ के बाद अस्तित्व में आया। बाद में भारतीय संसद ने ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (पॉश अधिनियम) पारित किया।

यह अधिनियम सार्वजनिक, निजी, संगठित, असंगठित सभी क्षेत्रों पर लागू होता है। इसके तहत दस या इससे अधिक कर्मचारियों वाले संगठनों को एक आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) का गठन करना होता है। जिला स्तर पर स्थानीय शिकायत समितियां (एलसीसी) उन मामलों को संभालती हैं जहां आईसीसी उपलब्ध नहीं है। इस समितियों के पास दीवानी अदालतों के समान शक्तियां हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि झूठी शिकायतों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है। ऐसे मामलों में दोनों पक्षों की पहचान और कार्यवाही के संबंध में सख्त गोपनीयता रखी जाती है।

विधान सभा सचिव राजीव प्रसाद ने कार्यक्रम का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं के समानता, गरिमा और आर्थिक सशक्तिकरण के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए एक सुरक्षित कार्यस्थल आवश्यक है। उन्होंने प्राचीनकाल के ऐतिहासिक संदर्भों पर जोर देते हुए भारतीय समाज में नारी शक्ति के महत्व को रेखांकित किया।

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