अब इस गांव की हर लड़की जा सकेगी कॉलेज, सुरक्षा और यातायात के साधन का हुआ इंतजाम

Edited By Deepender Thakur, Updated: 18 Jun, 2022 04:58 PM

now every girl of this village will be able to go to college

आज के समय में पढ़ाई करके कुछ बनने का सपना हर लड़के और लड़कियों का होता है। लेकिन आज भी कई ऐसी जगह हैं, जहां खासकर लड़कियों को इसकी अनुमति नहीं है। उन पर कई तरह की पाबंदिया हैं। लड़कियों के सपनों के बीच बहुत सारी मुश्किलें होती हैं, जो सामाजिक-...

टीम डिजिटल। आज के समय में पढ़ाई करके कुछ बनने का सपना हर लड़के और लड़कियों का होता है। लेकिन आज भी कई ऐसी जगह हैं, जहां खासकर लड़कियों को इसकी अनुमति नहीं है। उन पर कई तरह की पाबंदिया हैं। लड़कियों के सपनों के बीच बहुत सारी मुश्किलें होती हैं, जो सामाजिक- सांस्कृतिक, आर्थिक एवं अन्य कारकों से बहुत गहराई से जुड़ी होती हैं।

नैना अपनी बारहवीं कक्षा की परीक्षा दे रही है और अपने भविष्य को लेकर काफ़ी चिंतित है चिंता का कारण परीक्षा परिणाम क़तई नहीं है अपितु परिणाम के  बाद आगे की पढाई को लेकर अनिश्चितता उसकी चिंता का मुख्य कारण है क्योंकि आज तक उनके गांव से कोई भी लड़की बारहवीं क्लास  के बाद आगे पढ़ने के लिए कभी कॉलेज नहीं गई। असल में ये चिंता मात्र नैना की नहीं है बल्कि उसके साथ पढ़ने वाली सभी लड़कियाँ अपने भविष्य और आगे की पढ़ाई को लेकर चिंतित नजर आती हैं। 

ये तमाम लड़कियाँ हरियाणा के करनाल ज़िले में के सीमावर्ती गावं देवीपुर के सरकारी स्कूल में पढ़ती हैं। एक तरफ़ जहां करनाल को हरियाणा के मुख्यमंत्री के गृह जिले के रूप में नाम से जाना जाता है वही दूसरी और उसी करनाल ज़िले में ऐसा गावं भी है जहां आज़ादी के  75 साल बाद तक लड़कियां उच्च शिक्षा से कोसों दूर हैं।

गांव के प्रधान बताते है कि 2017 तक गावं में सिर्फ़ आठवीं तक का स्कूल था अधिंकाश लड़कियां सिर्फ 8 वीं तक पढ़ती थीं लेकिन उस समय में भी कुछ लड़कियां गांव से 6 किलोमीटर दूर बरसत गांव में पढ़ने जाती थी हालांकि यह सफर बेहद चुनौतीपूर्ण था इसलिए उनमे से अधिंकाश लड़कियों ने पढाई छोड़ दी सिर्फ चंद लड़कियां ही 12 वीं क्लास तक पढ़ पाईं लेकिन कॉलेज जाने का उनका सपना पूरा नहीं हुआ। 

ज्यादातर लड़कियाँ आगे पढ़ना चाहती है और जीवन में अपना एक मुकाम हासिल करना चाहती है ,लेकिन सामाजिक मान्यताओं और सुरक्षा के नाम पर इन्हें आज भी कॉलेज जाने की मनाही है। ऐसा भी नहीं है कि गावं के सभी लोगों की सोच ऐसी है पिछले साल SMC प्रधान ने अपनी बेटी को कॉलेज भेजने का फैसला लिया और अपनी बेटी के साथ एक लड़की का और एड्मिशन भी करवाया लेकिन यातायात के संसाधन और सुरक्षा के चलते उन्हें कॉलेज भेज ही नहीं पाएं और दोनों का कॉलेज छूट गया।

12 वीं क्लास की फरजाना (जो कि तारों की टोली का हिस्सा है) का कहना है कि उसे यह सोच कर ही डर लगता है कि वह अब आगे नहीं पढ़ पायेगी उसने देखा है कि पढाई बंद होने के बाद जल्द ही लड़कियों की शादी कर दी जाती है। फैजाना कहती है कॉलेज जाकर पढ़ने के लिए हमने अपने घर में बात भी की है लेकिन परिवार वालों का कहना होता है कि आज से पहले गांव से कौन सी लड़की कॉलेज पढ़ने गयी है जो तुम्हें भेज दे? फैजाना  मानती है कि आज भले ही हमारे गांव में हमारे लिए कोई उदहारण नहीं है लेकिन किसी न किसी को तो शुरआत करनी होगी इसलिए हम लड़कियों ने भी मिलकर यह ठान लिया है कि वह चुनौतियों से हार नहीं मानेंगी और मिलकर एक नया इतिहास लिखेगी।

इसके लिए फैजाना ने गांव की बाकी लड़कियों से भी मुलाकात की और जल्द ही इन्होने शक्ति नाम से लड़कियों का एक समहू बनाया। शक्ति ग्रुप की इन नौजवान लड़कियों का कहना है कि इन्हें आज जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है उनका सामना आने वाली पीढ़ियों का न करना पड़े इसलिए यह संगठित हो रही है।  यह सब मिलकर गांव से लिंग भेदभाव और हिंसा को खत्म करने के लिए जागरूकता अभियान चलाएगी ताकि बाल विवाह और घरेलू हिंसा पर रोक लग सके और किसी भी लड़की का कॉलेज जाने का सपना टूटने न पाएं।

फ़िलहाल तो इनकी लड़ाई द्विपक्षीय है एक और जहाँ पितृसत्ता को यह लड़कियां चुनौतियां दे रही है दूसरी और व्यवस्था की खामियां (ट्रांसपोर्ट की सुविधा ना होना) इनकी राह का रोड़ा बनी हुई थी अगर ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो लड़कियों में प्राथमिक शिक्षा से वरिष्ठ स्कूली शिक्षा तक, साफ तौर पर ड्रॉप आउट देखा जा सकता है। जैसै-जैसे स्कूली शिक्षा से आगे की पढ़ाई की बात आती है तो ड्रॉप आउट की खाई ओर गहरी होती चली जाती है। जब हम शहरों में या कॉलेज में लड़कियों को आते देखते हैं, तो यह गलतफहमी होती है कि सारी लड़कियां उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ रही हैं।

जबकि वास्तविकता में यह अनुपात बहुत कम है। ये लड़कियां मानती है कि इनकी मंजिल बहुत दूर है परन्तु लड़कियों का यह शक्ति समहू बनना उस दिशा में उठाया गया पहला कदम है जो कि एक मील का पत्थर साबित होगा।

अपने उदेश्य की प्राप्ति के लिए शक्ति ग्रुप ने  जन सवांद का कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें समूड्या के सभी वर्ग के लोगो ने भाग लिया साथ ही जिला विधि प्राधिकरण से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने भी भागीदारी की शक्ति ग्रुप की लड़कियों ने अपनी बातचीत रखी ओर कहा कि असुरक्षा, यातायात के साधन के न होने के साथ साथ आर्थिक अभाव, लड़कियों की शिक्षा को लेकर अभिभावकों का जागरूक ना होना, बेटियों पर विश्वास ना करना कुछ ऐसे कारण है जिनके चलते परिवार बेटियों को आगे नहीं पढ़ाना चाहते साथ ही बस की मांग को लेकर एक मांगपत्र भी जिला विधि प्राधिकरण को सौंपा गया। शक्ति ग्रुप की लड़कियों के प्रयास्वरूप आजादी के 75 सालों बाद भी जिस गावं में सरकारी परिवहन की सुविधा नहीं थी उस  गांव में सरकारी बस का आवागमन शुरू हो गया जिससे गावं में बेहद ख़ुशी का माहौल है , गावं में हर कोई लड़कियों की खुले दिल से तारीफ कर रहा है। शक्ति ग्रुप की यह लड़किया भी अपनी इस सफलता से बेहद उत्त्साहित है और अब आगे की पढाई को लेकर अपने माता पिता से सहमति बनाने की दिशा में कार्य कर रही है, आज इन लड़कियों ने निश्चित ही यह बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है लेकिन जब तक लड़कियाँ कॉलेज में दाख़िला नहीं ले लेती तब तक उन्हें अपने प्रयास जारी रखने है। 

पहली लड़ाई व्यवस्था से थी जिसमें सफलता मिली है ,अब असली लड़ाई लिंग भेदभाव की मानसिकता से है जो कि एक लंबी लड़ाई है ओर निश्चित ही आज नहीं तो कल उसमें भी सफल होंगे 
आज गावं की कमजोर समझने जाने वाली लड़कियों ने वह कर दिखाया जिसकी मिसाल लम्बे समय तक दी जाती रहेगी और यह बदलाव की कहानी रातों रात नहीं लिखी गई ,आज से करीब तीन साल पहले देवीपुर के सरकारी स्कूल में ब्रेकथ्रू संस्था दुवारा लिंग समानता के प्रति किशोर किशोरियों को जागरूग करने एवं लिंग भेदभाव के प्रति सवेंदनशील बनाने हेतू तारो की टोली के नाम से कार्यक्रम की शुरुआत हुई जिसके परिणामस्वरूप किशोर किशोरी न केवल लिंग भेदभाव के प्रति सवेंदनशील बने साथ ही अपने अधिकारों के लिए आवाज भी उठाने लगे। 

ब्रेकथ्रू ने स्कूल में किशोर किशोरियों के अलावा समुदाय में इनके माता -पिता और विद्यालय में इनके शिक्षकों से भी इस विषय पर गहन बातचीत की जिससे कि समुदाय में इनके लिए एक स्पोर्ट सिस्टम तैयार हो सके ताकि यह लड़कियां अपने सपनो को पखं दे पाएं इसके लिए समुदाय के हर किसी पक्ष तक इस मुद्दे  को लेकर जाने का प्रयास किया ,जो जाने अनजाने में लड़कियों के सपनों को प्रभावित कर रहे हैं ताकि हमारे गाँवों में रहने वाली हर लड़की छोटी सी आशा नही ,बल्कि बड़ी सी आशा रख पाएगी। उम्मीद है इस गांव की लड़कियों की यह पहली पीढ़ी कॉलेज जाकर एक नया इतिहास रचेगी ओर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उदहारण पेश करेंगी और पितृसत्ता की गहरी नीवं पर चोट करने में कामयाब होगी।

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