Edited By Krishan Rana, Updated: 11 Aug, 2026 08:57 PM

अंबाला छावनी की बहुचर्चित फ्रीहोल्ड नीति को लेकर हरियाणा सरकार ने गंभीर मंथन शुरू
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): अंबाला छावनी की बहुचर्चित फ्रीहोल्ड नीति को लेकर हरियाणा सरकार ने गंभीर मंथन शुरू कर दिया है। मंगलवार को हरियाणा सचिवालय में शहरी स्थानीय निकाय मंत्री विपुल गोयल के कार्यालय में इस महत्वपूर्ण विषय पर एक हाई लेवल बैठक आयोजित की गई, जिसमें ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज, मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी, शहरी स्थानीय निकाय विभाग के आयुक्त एवं सचिव अशोक मीणा सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।
बैठक देर शाम तक चली, लेकिन इसकी कोई आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। हालांकि सूत्रों के अनुसार, बैठक में अंबाला छावनी की फ्रीहोल्ड नीति से जुड़े सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई और विभिन्न तथ्यात्मक जानकारियां एकत्रित करने पर सहमति बनी। माना जा रहा है कि इस विषय पर आने वाले दिनों में कई और दौर की बैठकों का आयोजन किया जाएगा।
गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ न पड़े, इस पर जोर
बैठक में सबसे अधिक जोर इस बात पर दिया गया कि फ्रीहोल्ड नीति का उद्देश्य जनता को राहत देना होना चाहिए, न कि उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना। मंत्री अनिल विज ने स्पष्ट रूप से कहा कि अंबाला छावनी में अनेक परिवार पिछले सौ से डेढ़ सौ वर्षों से निवास कर रहे हैं और उन पर वर्तमान कलेक्टर रेट के आधार पर भारी शुल्क थोपना उचित नहीं होगा।
सूत्रों के अनुसार, बैठक में कलेक्टर रेट, 25 प्रतिशत अग्रिम भुगतान, 150 वर्ष पुराने दस्तावेजों की शर्तों और गरीब बस्तियों की वास्तविक स्थिति पर विस्तृत चर्चा हुई। अधिकारियों के साथ यह विचार किया गया कि ऐसी नीति बनाई जाए, जिससे वर्षों से रह रहे लोगों को वास्तविक राहत मिल सके।
फिलहाल नहीं हुआ कोई अंतिम फैसला
हालांकि बैठक को लेकर अंबाला छावनी के लोगों में काफी उत्सुकता थी, लेकिन इस पहली बैठक में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। माना जा रहा है कि सरकार किसी भी निर्णय से पहले सभी कानूनी, प्रशासनिक और आर्थिक पहलुओं का गहन अध्ययन करना चाहती है।
सूत्रों के अनुसार, दोनों मंत्रियों ने अधिकारियों के समक्ष छावनीवासियों की चिंताओं को प्रमुखता से रखा और यह स्पष्ट किया कि नीति जनहित के अनुरूप होनी चाहिए। इस दिशा में अधिकारियों को विभिन्न विकल्पों पर काम करने के निर्देश दिए गए हैं।
कैबिनेट में पहले भी उठा था मुद्दा
यह मुद्दा पहले भी राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में चर्चा का विषय बन चुका है। बताया जाता है कि अनिल विज ने प्रस्तावित शर्तों पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि यदि फ्रीहोल्ड के लिए तय की गई शर्तें इतनी कठिन और महंगी हों कि आम व्यक्ति उन्हें पूरा ही न कर सके, तो नीति का मूल उद्देश्य समाप्त हो जाएगा।
इसी कारण सरकार अब ऐसा समाधान तलाशने में जुटी है, जिससे छावनी क्षेत्र के लोगों को संपत्ति पर पूर्ण अधिकार मिल सके और उन्हें अनावश्यक वित्तीय दबाव का सामना न करना पड़े।
1977 का समझौता बना वर्तमान विवाद की जड़
अंबाला छावनी की फ्रीहोल्ड समस्या की पृष्ठभूमि लगभग पांच दशक पुरानी है। मंत्री अनिल विज के अनुसार, 5 फरवरी 1977 तक पूरा क्षेत्र कैंटोनमेंट बोर्ड के अधीन था। तत्कालीन रक्षा मंत्री बंसीलाल के समय 1063 एकड़ भूमि को कैंटोनमेंट से अलग कर नगर पालिका को सौंपा गया था।
उस समय यह व्यवस्था बनी थी कि हरियाणा सरकार को भारत सरकार की जमीन का मालिकाना अधिकार मिलेगा और इसके बदले सेना को 150 एकड़ जमीन मुफ्त उपलब्ध कराई जाएगी। लंबे समय तक इस समझौते पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन बाद में सेना को भूमि उपलब्ध कराकर प्रक्रिया पूरी की गई।
इसके बाद भवनों की रजिस्ट्री तो हुई, लेकिन कई मामलों में जमीन का स्वामित्व सरकार के नाम ही दर्ज रहा। यही स्थिति आज हजारों लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है।
हजारों परिवारों को मिल सकती है राहत
जमीन का मालिकाना स्पष्ट नहीं होने के कारण अंबाला छावनी के हजारों लोगों को बैंक ऋण लेने, भवनों के नक्शे पास कराने, उत्तराधिकार संबंधी कार्य, खरीद-फरोख्त और संपत्ति हस्तांतरण जैसी प्रक्रियाओं में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
सरकार अब इस लंबे समय से लंबित मुद्दे का ऐसा समाधान तलाशने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिससे आम नागरिकों को वास्तविक राहत मिले। आने वाले दिनों में होने वाली बैठकों और संभावित कैबिनेट चर्चा पर अंबाला छावनी के लोगों की निगाहें टिकी रहेंगी। माना जा रहा है कि जनहित को ध्यान में रखते हुए फ्रीहोल्ड नीति के मसौदे में आवश्यक संशोधन किए जा सकते हैं, ताकि वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे लोगों को संपत्ति पर पूर्ण अधिकार मिल सके।