108 रूपए के घाटे को लेकर 36 साल चला मुकदमा! हाई कोर्ट ने रोडवेज कंडक्टर के 'फ्री सफर' वाले केस पर लगाया फुल स्टॉप

Edited By Isha, Updated: 10 Jun, 2026 03:48 PM

lawsuit over a loss of 108 dragged on for 36 years

भारतीय न्यायिक इतिहास में कई बार छोटे मामलों के लंबे खिंचने के उदाहरण मिलते हैं, लेकिन हाल ही में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट से एक ऐसा ही अनोखा मामला सामने आया है। सरकारी खजाने को हुए महज 108

चंडीगढ़: भारतीय न्यायिक इतिहास में कई बार छोटे मामलों के लंबे खिंचने के उदाहरण मिलते हैं, लेकिन हाल ही में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट से एक ऐसा ही अनोखा मामला सामने आया है। सरकारी खजाने को हुए महज 108 रुपये के नुकसान का एक मामला पिछले 36 वर्षों से अदालतों के चक्कर काट रहा था, जिसका अब जाकर पटाक्षेप हुआ है।हाई कोर्ट ने हरियाणा रोडवेज के एक पूर्व कंडक्टर की अपील को खारिज करते हुए विभाग द्वारा दी गई सजा को पूरी तरह वैध ठहराया है।

क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 1989 का है, जो हरियाणा रोडवेज (जींद डिपो) के तत्कालीन कंडक्टर राम कुमार से जुड़ा हुआ है।विभागीय जांच में पाया गया था कि राम कुमार ने 'मछरौली से सिवाह' रूट पर कुछ अनधिकृत (बिना टिकट) यात्रियों को बस में यात्रा कराई थी। इस लापरवाही के कारण सरकारी खजाने को कुल 108 रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ था।जांच पूरी होने के बाद, मार्च 1990 में विभाग ने कार्रवाई करते हुए राम कुमार की एक वार्षिक वेतन वृद्धि (Annual Increment) संचयी प्रभाव (Cumulative Effect) के साथ रोक दी थी।

हाई कोर्ट ने हरियाणा रोडवेज के एक कंडक्टर की अपील खारिज करते हुए विभाग की ओर से दी गई सजा को वैध ठहराया है। मामला हरियाणा रोडवेज जींद के तत्कालीन कंडक्टर राम कुमार से जुड़ा है। 1989 में विभागीय जांच में आरोप लगा था कि उन्होंने मछरौली से सिवाह तक कुछ अनधिकृत यात्रियों को बस में यात्रा कराई। इससे सरकार को 108 रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ।जांच में बस में बिना टिकट यात्रियों के यात्रा करने का मामला भी सामने आया। 

विभागीय जांच पूरी होने के बाद मार्च 1990 में राम कुमार की एक वार्षिक वेतन वृद्धि संचयी प्रभाव के साथ रोक दी गई। कंडक्टर ने इस कार्रवाई को चुनौती दी लेकिन उसे राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला अदालत पहुंचा।  

हाई कोर्ट की टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों और तथ्यों को देखते हुए विभागीय कार्रवाई को किसी भी तरह से अवैध नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने माना कि नियमों का उल्लंघन होने पर विभाग द्वारा की गई कार्रवाई पूरी तरह तर्कसंगत थी।

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