हवाएं लाख मुखालिफ हों, मगर यह तय है कि दिया वही जलेगा जो अपनी जिद पर अड़ा है- अनिल विज

Edited By Yakeen Kumar, Updated: 02 Jan, 2026 09:51 PM

only he will burn who is adamant on his stubbornness anil vij

हरियाणा की राजनीति में एक बार फिर बयानबाज़ी और सियासी संकेतों का दौर तेज हो गया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की नियुक्ति के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक तल्खी खुलकर सामने आ रही है।

चंडीगढ (चन्द्र शेखर धरणी) : हरियाणा की राजनीति में एक बार फिर बयानबाज़ी और सियासी संकेतों का दौर तेज हो गया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की नियुक्ति के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक तल्खी खुलकर सामने आ रही है। इसी क्रम में हरियाणा के वरिष्ठ मंत्री अनिल विज द्वारा कही गई एक पंक्ति— “हवाएं लाख मुखालिफ हों, मगर यह तय है कि दिया वहीं जलेगा, जो अपनी जिद पर अड़ा है”—ने सियासी गलियारों में नई बहस को जन्म दे दिया है। यह कथन केवल एक साहित्यिक पंक्ति नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक संदेश और स्पष्ट कटाक्ष माना जा रहा है।

अनिल विज का यह बयान सीधे तौर पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेता प्रतिपक्ष बनने के संदर्भ में देखा जा रहा है। हुड्डा लंबे समय तक सत्ता में रहे नेता हैं और कांग्रेस की राजनीति में उनका कद बड़ा रहा है। लेकिन समय के साथ-साथ उनकी राजनीति पर यह सवाल भी उठते रहे हैं कि क्या वे आज की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में उसी ऊर्जा, संघर्ष और जिद के साथ सक्रिय हैं, जिसके लिए वे कभी जाने जाते थे।

अनिल विज हरियाणा की राजनीति में एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित हैं, जो अपने बेबाक बयानों, स्पष्ट विचारों और टकराव से न डरने वाले स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कई बार यह साबित किया है कि वे न तो विरोध से घबराते हैं और न ही आलोचनाओं से विचलित होते हैं। उनका यह कथन इसी राजनीतिक व्यक्तित्व का विस्तार है। विज मानते हैं कि राजनीति में टिके रहने के लिए पद नहीं, बल्कि संकल्प और दृढ़ता सबसे महत्वपूर्ण होती है।

विज के बयान में “दीया” एक गहरे प्रतीक के रूप में उभरता है। दीया प्रकाश का स्रोत है, लेकिन साथ ही यह धैर्य, निरंतरता और संघर्ष का प्रतीक भी है। तेज हवाओं के बीच भी यदि दीया जलता रहे, तो इसका अर्थ है कि उसमें स्थिरता और आस्था की शक्ति है। अनिल विज का इशारा साफ है कि राजनीति में वही नेता टिकता है, जो दबाव, आलोचना और विरोध के बावजूद अपने विचारों पर अडिग रहता है।

भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेता प्रतिपक्ष बनने को कांग्रेस के लिए एक बड़ी राजनीतिक घटना माना जा रहा है। लेकिन इस पद के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। नेता प्रतिपक्ष केवल सरकार की आलोचना करने वाला पद नहीं होता, बल्कि जनता के सामने एक मजबूत और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करने की भूमिका भी निभाता है। अनिल विज का कटाक्ष इसी बिंदु पर केंद्रित है—कि क्या हुड्डा इस भूमिका को सक्रियता और दृढ़ता के साथ निभा पाएंगे।

हरियाणा की राजनीति में समय तेजी से बदला है। जहां एक समय कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था, वहीं अब भाजपा ने खुद को एक मजबूत और संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया है। ऐसे में विपक्ष के लिए केवल अतीत की उपलब्धियों के सहारे राजनीति करना पर्याप्त नहीं है। विज का बयान इस सच्चाई को रेखांकित करता है कि बदलते समय में वही नेता प्रासंगिक रहता है, जो नए हालात के अनुसार संघर्ष करने की क्षमता रखता हो।

अनिल विज खुद को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसने कई बार अकेले खड़े होकर भी मुद्दे उठाए। चाहे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई हो, प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठाने की बात हो या फिर सरकार के भीतर रहते हुए भी गलतियों की ओर इशारा करना—विज ने हमेशा टकराव से बचने के बजाय उसका सामना किया है। यही “जिद” उनकी राजनीतिक पहचान बन चुकी है।

विज का यह बयान भाजपा की राजनीतिक रणनीति को भी दर्शाता है। सत्ता पक्ष यह संदेश देना चाहता है कि वह न तो विपक्ष के आरोपों से डरता है और न ही पदों की राजनीति से प्रभावित होता है। उनके अनुसार, अगर सरकार का संकल्प मजबूत है और नीतियां स्पष्ट हैं, तो राजनीतिक हवाएं चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, सरकार अपना रास्ता तय कर लेती है।

दूसरी ओर, भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सामने यह चुनौती है कि वे नेता प्रतिपक्ष के रूप में खुद को केवल एक औपचारिक भूमिका तक सीमित न रखें। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे आज भी जमीन से जुड़े हुए हैं और जनता की अपेक्षाओं को समझते हैं। अनिल विज का कटाक्ष इस बात की ओर इशारा करता है कि राजनीति में केवल अनुभव ही नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष की भावना भी आवश्यक है।

हरियाणा की जनता अब परिपक्व हो चुकी है। वह केवल बयानबाज़ी या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से संतुष्ट नहीं होती। जनता ऐसे नेताओं को पसंद करती है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने फैसलों पर कायम रहें और परिणाम देने की क्षमता रखते हों। विज का मानना है कि यही राजनीतिक जिद किसी नेता को लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखती है।

विज का यह कथन एक व्यापक राजनीतिक दर्शन को भी दर्शाता है। उनका मानना है कि राजनीति में समझौते और अवसरवाद लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होते। जो नेता हर बदलती हवा के साथ अपना रुख बदल लेता है, वह अंततः जनता का भरोसा खो देता है। इसके विपरीत, जो नेता अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है, वही इतिहास में अपनी पहचान बनाता है।

भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए यह समय केवल विपक्ष का नेता बनने का नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को पुनः स्थापित करने का भी है। उन्हें यह दिखाना होगा कि वे केवल सरकार की आलोचना नहीं कर रहे, बल्कि हरियाणा के विकास के लिए एक स्पष्ट और वैकल्पिक दृष्टि भी रखते हैं। अनिल विज का कटाक्ष इसी चुनौती की ओर इशारा करता है।

राजनीति में शब्दों का चयन बहुत मायने रखता है। “हवाएं” केवल विरोध या आलोचना का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का संकेत भी हैं। विज के अनुसार, जो नेता इन हवाओं से डरकर अपनी लौ बुझा लेता है, वह राजनीति में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाता।

अंततः अनिल विज का यह बयान केवल भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर किया गया व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं है, बल्कि यह हरियाणा की राजनीति पर एक व्यापक टिप्पणी है। यह बयान सत्ता और विपक्ष—दोनों के लिए एक संदेश है कि राजनीति में पद से अधिक महत्वपूर्ण संकल्प, साहस और जिद होती है।

हरियाणा की राजनीति आने वाले समय में और भी रोचक मोड़ लेने वाली है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए यह समय आत्ममंथन और रणनीति का है। ऐसे में अनिल विज की यह पंक्ति राजनीतिक विमर्श का एक स्थायी संदर्भ बन गई है—कि चाहे हवाएं कितनी भी मुखालिफ क्यों न हों, राजनीति में वही दीया जलता है, जो अपनी जिद और विश्वास के साथ अडिग खड़ा रहता है।

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