हरियाणा की हरियाली में ये जिला अव्वल, 60 लाख से अधिक पेड़ों का बनाया शानदार रिकॉर्ड...

Edited By Isha, Updated: 04 Jun, 2026 01:59 PM

yamunanagar tops haryana in greenery

विश्व पर्यावरण दिवस के विशेष अवसर पर हरियाणा के पर्यावरण मानचित्र से एक बेहद उत्साहजनक तस्वीर सामने आई है। वन विभाग द्वारा की गई नवीनतम डिजिटल वृक्ष गणना (Digital Tree Census) के अनुसार

यमुनानगर: विश्व पर्यावरण दिवस के विशेष अवसर पर हरियाणा के पर्यावरण मानचित्र से एक बेहद उत्साहजनक तस्वीर सामने आई है। वन विभाग द्वारा की गई नवीनतम डिजिटल वृक्ष गणना (Digital Tree Census) के अनुसार, यमुनानगर जिला जंगलों से बाहर पेड़ पौधों की संख्या के मामले में पूरे प्रदेश में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है। आंकड़ों के मुताबिक, जिले में जंगलों की सीमा से बाहर कुल 60.94 लाख पेड़ दर्ज किए गए हैं, जो हरियाणा के किसी भी अन्य जिले की तुलना में सबसे अधिक हैं।

पर्यावरण रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि पूरे हरियाणा में कुल पेड़ों की संख्या लगभग 4.01 करोड़ है। इस कुल संख्या का अकेले 14.86 प्रतिशत हिस्सा यमुनानगर में मौजूद है। सीधे शब्दों में कहें, तो आज पूरे हरियाणा प्रदेश में मिलने वाला हर सातवां पेड़ अकेले यमुनानगर जिले की धरती पर सांस ले रहा है। प्राकृतिक वन क्षेत्र (Forest Cover) के मामले में भी यह जिला पंचकूला के बाद पूरे राज्य में दूसरे पायदान पर मजबूती से टिका हुआ है।

जिले के किसानों ने पारंपरिक खेती के साथ-साथ बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक वृक्षारोपण (जैसे पॉपुलर और सफेदा) को अपनी आजीविका का जरिया बनाया है, जिससे जंगलों के बाहर का हरित क्षेत्र तेजी से बढ़ा है। कलेसर नेशनल पार्क और वन्यजीव अभ्यारण्य (Kalesar National Park & Wildlife Sanctuary) जैसी विशाल प्राकृतिक धरोहरें इस क्षेत्र को जैव-विविधता का एक समृद्ध केंद्र बनाती हैं।

 
इस शानदार उपलब्धि के जश्न के बीच पर्यावरण विशेषज्ञों ने जिले के भविष्य को लेकर कुछ गंभीर चिंताएं भी जाहिर की हैं। यमुनानगर की इस 'हरित पहचान' को आने वाले समय में चार मुख्य मोर्चों पर कड़ी चुनौती मिल रही है।

 कृषि वानिकी में बड़े पैमाने पर उगाए जाने वाले कुछ विशेष पेड़ अत्यधिक पानी सोखते हैं, जिससे जिले का ग्राउंड वाटर लेवल लगातार नीचे जा रहा है।यमुना नदी के तटीय इलाकों में अवैध खनन और जंगलों से कीमती लकड़ियों की तस्करी पर्यावरण के संतुलन को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचा रही है। प्लाईवुड उद्योगों और स्टोन क्रशरों से निकलने वाला धुआं और अपशिष्ट यहां की स्वच्छ हवा और मिट्टी के सामने संकट खड़ा कर रहे हैं।

 

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