फलों की खेती से ‘बाग-बाग’ हुआ हरियाणा

Edited By Punjab Kesari, Updated: 06 Feb, 2018 11:32 AM

haryana planted with fruit cultivation

बदलते समय के लिहाज से न केवल दृष्टिकोण बदला है अपितु खेती के ढर्रे में भी खासा बदलाव आया है। जहां अधिकतर किसान परम्परागत खेती के तौर-तरीकों को बदलते दिखे तो वहीं खेती को बिजनेस के लिहाज से भी किसान अब आंकने लगे हैं। राज्य के किसानों की सोच परम्परागत...

सिरसा (ब्यूरो): बदलते समय के लिहाज से न केवल दृष्टिकोण बदला है अपितु खेती के ढर्रे में भी खासा बदलाव आया है। जहां अधिकतर किसान परम्परागत खेती के तौर-तरीकों को बदलते दिखे तो वहीं खेती को बिजनेस के लिहाज से भी किसान अब आंकने लगे हैं। राज्य के किसानों की सोच परम्परागत खेती के साथ-साथ फलों की खेती की तरफ भी कायम हुई है। यही कारण है कि धीरे-धीरे फलों की खेती का रकबा प्रदेश में बढ़ा है। 

हालांकि राज्य व केंद्र सरकार ने भी किसानों को सम्पन्न बनाने के लिए जहां कृषि के तौर-तरीकों में परिवर्तन लाने की मुहिम छेड़ी हुई है, वहीं विभागीय अधिकारी भी गांव-गांव जाकर किसानों को फसलों के विविधिकरण के साथ-साथ फलों की खेती के लिए भी प्रोत्साहित करते रहते हैं। ऐसे बढ़ा रकबा वर्ष 1966-67 में 7,865 हैक्टेयर में बागों की खेती थी जोकि वर्ष 1991-92 में बढ़कर 13,930 हेक्टेयर हो गया। इसी प्रकार वर्ष 2005 में राष्ट्रीय बागवानी मिशन शुरू होने से बागों का एरिया 22,297 हेक्टेयर हो गया। इसके अलावा वर्ष 2011-12 में 47,036 हैक्टेयर तो वर्ष 2015-16 में 60,915 हेक्टेयर हो गया है। सिरसा में इस मिशन के शुरू होने से पूर्व महज 2,400 हेक्टेयर एरिया था जो अब बढ़कर 10 हजार के करीब हो गया है।

आम, अमरूद व सीट्रस की होती है खेती
वर्ष 2015-16 में आम का उत्पादन 9259 हेक्टेयर, अमरूद 11211 हेक्टेयर, सीट्रस 19652, बेर 4136, अंगूर 38 हेक्टेयर, चीकू 1632, आंवला 2226 व लीची की 201 हेक्टेयर में खेती की गई। आम, चीकू व लीची की खेती ज्यादातर अम्बाला, यमुनानगर, करनाल, कुरुक्षेत्र व पंचकूला में हुई जबकि हिसार, सिरसा, फतेहाबाद, भिवानी में सीट्रस की खेती ज्यादा हुई।

लगातार बढ़ रहा बागों का एरिया
जिला उद्यान अधिकारी डा. सतबीर शर्मा ने बताया कि बागों के प्रति किसानों की सोच जागृत हुई है और जिला सिरसा में भी बागों का क्षेत्र निरंतर बढ़ ही रहा है। यहां सीट्रस का उत्पादन फिलहाल ज्यादा है और सरकार की ओर से बागों को बढ़ावा देने के लिए सबसिडी भी दी जाती है।

ऐसे आ रहा बदलाव
अक्सर देखा गया है कि किसान फार्मूला खेती के साथ-साथ देखा-देखी को ही अपना आधार मानता रहा है। पड़ोस के खेत में यदि अमुक फसल है तो संबंधित भी यही फसल की बिजाई करता। कृषि विभाग ने इस परम्परा को खत्म करने के लिए जहां पूर्व में फसलों के विविधिकरण की योजना लागू की तो वहीं वर्ष 2005 में केंद्र की ओर से राष्ट्रीय बागवानी मिशन शुरू हुआ। इसका परिणाम ये रहा कि किसान बागवानी की ओर मुड़ते चले गए। कारण साफ था कि बागवानी के लिए विभाग द्वारा किसानों को सबसिडी भी पर्याप्त मिल रही थी। इसी का ही असर रहा कि किसान फार्मूला व देखा-देखी से बाहर निकलकर बाग की ओर आकर्षित हो गया। पूरे राज्य में बाग लहराने लगे और यह रोजगार का भी एक अच्छा साधन बन गया है।
 

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