दिन में स्कूल, रात में गौशाला: नूंह के सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर हरियाणा मानवाधिकार आयोग गंभीर

Edited By Manisha rana, Updated: 08 May, 2026 02:22 PM

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हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने जिला नूंह के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की अत्यंत चिंताजनक एवं अमानवीय स्थिति पर गंभीर रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान लिया है।

चंडीगढ़ (धरणी) : हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने जिला नूंह के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की अत्यंत चिंताजनक एवं अमानवीय स्थिति पर गंभीर रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने 06 मई 2026 को प्रकाशित समाचार रिपोर्टों “Cattle class: In Nuh, this school by day turns cowshed at night” एवं “Situation painful, kids study in unsafe room: Govt teacher” के आधार पर यह कार्रवाई की है।

हरियाणा मानव अधिकार  आयोग ने कहा कि समाचार रिपोर्टों में वर्णित परिस्थितियाँ अत्यंत गंभीर हैं और यह बच्चों के शिक्षा के अधिकार, स्वास्थ्य के अधिकार तथा गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन प्रतीत होती हैं। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस ललित बत्रा तथा दोनों सदस्यों कुलदीप जैन और दीप भाटिया के समक्ष आए तथ्यों के अनुसार, जिला नूंह के फिरोजपुर झिरका क्षेत्र में कई सरकारी प्राथमिक विद्यालय बिना भवनों के संचालित हो रहे हैं। राजकीय प्राथमिक विद्यालय, ग्राम कुबड़ा बास, कथित रूप से एक पशुशाला में चलाया जा रहा है, जहाँ लगभग 29 बालक एवं 33 बालिकाएँ बाल वाटिका से कक्षा तृतीय तक के बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। 

विद्यालय समय समाप्त होने के बाद उसी परिसर में गाय एवं भैंस बांधी जाती हैं तथा पशुओं का चारा भी वहीं रखा जाता है। सफाई के बावजूद परिसर में दुर्गंध बनी रहती है, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य एवं अध्ययन वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।यह भी बताया गया है कि विद्यालय केवल एक निजी भूमि स्वामी द्वारा दी गई अस्थायी अनुमति के कारण संचालित हो रहा है, जो कि स्थायी सरकारी आधारभूत संरचना के पूर्ण अभाव को दर्शाता है। यह उन कम-से-कम उन्नीस (19) विद्यालयों में से एक है, जो गुरुग्राम से सटे हरियाणा के इस जिले में बिना भवन के संचालित हो रहे हैं।

इसी प्रकार राजकीय प्राथमिक विद्यालय, ग्राम कालू बास, खुले मैदान में संचालित हो रहा है, जहाँ लगभग 45 लड़कों और 50 लड़कियों को पेड़ों से बंधे ब्लैकबोर्ड के सामने पढ़ाया जा रहा है। मानसून के दौरान पूरा मैदान कीचड़ में तब्दील हो जाता है, जबकि सर्दियों में बच्चों को अत्यधिक ठंड जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में पढ़ाई करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे शिक्षा का वातावरण अत्यंत असुरक्षित बन जाता है। आयोग मानता है कि ऐसी परिस्थितियाँ बच्चों की सुरक्षा एवं गरिमा के साथ गंभीर समझौते के समान हैं।

समाचार रिपोर्टों में आगे यह भी उजागर हुआ कि वर्ष 2020 में जिला नूंह में अड़सठ (68) नए विद्यालय स्वीकृत किए जाने के बावजूद कई विद्यालयों को अब तक मूलभूत आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। अनेक मामलों में विद्यालयों के लिए चिन्हित भूमि गाँव की आबादी से काफी दूर स्थित है। ग्राम कुबड़ा बास में नियुक्त एक सरकारी शिक्षक ने स्थिति को “दर्दनाक” बताते हुए कहा कि वह बच्चों को एक असुरक्षित कमरे में पढ़ाने के लिए विवश हैं, जहाँ मानसून के दौरान चारों ओर से वर्षा का पानी टपकता है तथा गर्मियों में अत्यधिक गर्मी के कारण कक्षाओं का संचालन भीतर करना लगभग असंभव हो जाता है। विद्यालय भवन निर्माण हेतु चिन्हित पंचायत भूमि कथित रूप से ग्राम रावली में स्थित है, जो लगभग साढ़े तीन किलोमीटर दूर है और छोटे बच्चों के लिए व्यावहारिक नहीं है।

अध्यक्ष जस्टिस ललित बत्रा तथा दोनों सदस्यों कुलदीप जैन और दीप भाटिया को मिलाकर बने पूर्ण आयोग ने इस बात पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की कि शिक्षकों की भारी कमी को दूर करने के लिए हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से संविदात्मक शिक्षकों की नियुक्ति बहादुरगढ़, रेवाड़ी एवं महेंद्रगढ़ जैसे दूरस्थ जिलों से की गई जिससे नियमित उपस्थिति एवं शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, कई शिक्षकों ने लंबी दूरी एवं मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण नौकरी छोड़ दी। जिससे पहले से ही प्रभावित शैक्षणिक वातावरण और अधिक गंभीर हो गया है।अतः यह आवश्यक है कि यथासंभव स्थानीय अथवा निकटवर्ती क्षेत्रों से शिक्षकों की नियुक्ति अथवा तैनाती की जाए, जिससे नियमित उपस्थिति, समुदाय के साथ बेहतर समन्वय एवं प्रभावी शिक्षा सुनिश्चित हो सके।

समाचार रिपोर्ट के अनुसार विद्यालय में पूर्व में लगभग 525 विद्यार्थियों का नामांकन था, जो अब घटकर लगभग 200 रह गया है। शेष विद्यार्थियों को एक ही कक्ष में बैचों में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है, जो शिक्षा तक पहुँच एवं विद्यार्थियों की निरंतरता में गंभीर गिरावट को दर्शाता है। हरियाणा मानव अधिकार आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बच्चों को पशुशालाओं, खुले मैदानों अथवा जर्जर ढांचों में पढ़ाना न केवल बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह बालकों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों का भी स्पष्ट उल्लंघन है। अधिनियम, 2009 यह भी निर्धारित करता है कि प्राथमिक विद्यालय आबादी से एक (1) किलोमीटर के भीतर स्थित होना चाहिए। वर्णित परिस्थितियाँ संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (United Nations Convention on the Rights of the Child) के अंतर्गत भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के भी विपरीत हैं। विशेष रूप से अनुच्छेद 28 बच्चों के शिक्षा के अधिकार को मान्यता देता है तथा अनुच्छेद 29 बच्चों के व्यक्तित्व, प्रतिभा एवं मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं के विकास हेतु सुरक्षित एवं गरिमापूर्ण वातावरण की आवश्यकता पर बल देता है।

आयोग के आदेश में ने यह भी वर्णित है कि वर्तमान स्थिति संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय के प्रावधानों के भी विपरीत है, जिसमें बच्चों को सुरक्षित एवं गरिमापूर्ण वातावरण में शिक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार सुनिश्चित किया गया है।आयोग का विचार है कि सुरक्षित, स्वच्छ एवं पर्याप्त शैक्षणिक आधारभूत संरचना उपलब्ध कराना मात्र प्रशासनिक उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि राज्य का मौलिक दायित्व है। बच्चों को सुरक्षित एवं अनुकूल वातावरण में शिक्षा प्रदान करना उनके शारीरिक, मानसिक एवं समग्र विकास के लिए आवश्यक है। वर्तमान प्रकरण जिला नूंह में बच्चों के बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा में गंभीर प्रणालीगत विफलता को दर्शाता है, जिसके लिए तत्काल हस्तक्षेप एवं सुधारात्मक कार्रवाई आवश्यक है।

जस्टिस ललित बत्रा की अध्यक्षता वाले पूर्ण आयोग ने मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए हरियाणा सरकार के संबंधित अधिकारियों से निम्नलिखित बिंदुओं पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है :

A. हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव, चंडीगढ़, जो राज्य के सर्वोच्च कार्यपालिका प्राधिकारी हैं, एक समग्र रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे, जिसमें नीति-स्तरीय निर्णय, निधियों का आवंटन, विभागीय समन्वय तथा जिला नूंह में समुचित विद्यालय आधारभूत संरचना एवं वैधानिक मानकों के अनुपालन हेतु स्पष्ट समयबद्ध कार्य योजना का उल्लेख होगा।

B. प्रधान सचिव, हरियाणा सरकार, विद्यालय शिक्षा विभाग, चंडीगढ़, निम्न बिंदुओं सहित विस्तृत विभागीय रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे :
संबंधित विद्यालयों में वर्तमान आधारभूत संरचना की स्थिति;
स्थायी विद्यालय भवनों के निर्माण हेतु समयसीमा तथा वह भी पहुँच संबंधी मानकों के अनुरूप;
विद्यालय भूमि को आबादी से साढ़े तीन (3.5) किलोमीटर दूर आवंटित किए जाने संबंधी जांच;
उपयुक्त सुधारात्मक कार्रवाई, जिसमें सुरक्षित परिवहन उपलब्ध कराना अथवा विद्यालय को अधिनियम, 2009 के मानकों के अनुरूप एक (1) किलोमीटर के भीतर स्थानांतरित करना शामिल हो;
शिक्षकों की उपलब्धता एवं तर्कसंगत तैनाती, विशेषकर स्थानीय अथवा निकटवर्ती क्षेत्रों से नियुक्ति सुनिश्चित करने हेतु उठाए गए कदम तथा विद्यार्थियों के नामांकन एवं निरंतरता में सुधार हेतु किए गए ठोस उपाय।

C. उपायुक्त, नूंह तथा जिला शिक्षा अधिकारी, नूंह, जिला स्तरीय प्राधिकारी होने के नाते, निम्नलिखित बिंदुओं पर तथ्यात्मक जमीनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे :
विद्यालयों की वास्तविक कार्यात्मक स्थिति, जो भौतिक निरीक्षण के आधार पर हो;
विद्यालय निर्माण हेतु उपलब्ध एवं उपयुक्त भूमि, जिसमें पंचायत भूमि भी सम्मिलित हो;
सुरक्षित एवं स्वच्छ शिक्षण वातावरण सुनिश्चित करने हेतु उठाए गए कदम; तथा
स्थानीय प्राधिकरणों के समन्वय से की गई तात्कालिक सुधारात्मक कार्रवाई।

आयोग के असिस्टेंट रजिस्ट्रार डॉ. पुनीत अरोड़ा ने बताया कि उपरोक्त सभी सम्बंधित अधिकारियों को ने आदेश में उल्लिखित बिंदुओं पर विस्तृत रिपोर्ट अगली सुनवाई की तिथि अर्थात् 22 जुलाई 2026 से एक सप्ताह पूर्व हरियाणा मानव अधिकार आयोग के सामने  प्रस्तुत करनी है।आयोग ने विशेष रूप से यह भी निर्देश दिया है कि स्कूलों के लिए आबादी के निकट उपयुक्त स्थान सुनिश्चित किए जाएं तथा स्थानीय या निकटवर्ती क्षेत्रों से शिक्षकों की नियुक्ति पर प्राथमिकता दी जाए, ताकि बच्चों की शिक्षा बाधित न हो।बच्चों को सुरक्षित, स्वच्छ एवं गरिमापूर्ण वातावरण में शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य का संवैधानिक दायित्व है तथा किसी भी परिस्थिति में बच्चों को ऐसी अमानवीय परिस्थितियों में पढ़ाई करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।

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