हरियाणा में इन कारोबारियों को बड़ा झटका, नये लाइसेंस और सभी मंजूरियों पर पूर्ण रोक! जानें क्या है कारण

Edited By Isha, Updated: 11 Feb, 2026 06:48 PM

haryana has imposed a complete ban on all new licenses and approvals

हरियाणा सरकार ने रियल एस्टेट सेक्टर में बकाया और नियमों से बचने की प्रवृत्ति पर अब तक की सबसे कड़ी कार्रवाई करते हुए एक व्यापक आदेश जारी किया है। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग

डेस्क:  हरियाणा सरकार ने रियल एस्टेट सेक्टर में बकाया और नियमों से बचने की प्रवृत्ति पर अब तक की सबसे कड़ी कार्रवाई करते हुए एक व्यापक आदेश जारी किया है। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने साफ कर दिया है कि जिन डेवलपर्स के ऊपर ईडीसी (बाहरी विकास शुल्क) और एसआईडीसी (राज्य अवसंरचना विकास शुल्क) का 20 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है, उन्हें अब न तो नया लाइसेंस मिलेगा और न ही किसी परियोजना के लिए कोई नई मंजूरी मिलेगी।

इसके साथ ही, सरकार ने डेवलपर्स द्वारा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स बदलकर सिस्टम को चकमा देने की लंबी चली आ रही प्रथा पर भी निर्णायक प्रहार किया है। विभाग के नये आदेश में स्पष्ट है कि किसी भी नए लाइसेंस, बिल्डिंग प्लान या लेआउट अप्रूवल से पहले पिछले पूरे एक साल की शेयरहोल्डिंग और बोर्ड संरचना की गहन जांच अनिवार्य होगी। यह कदम उस कमी पर रोक लगाएगा, जिसका फायदा उठाकर कई बड़ी कंपनियां मंजूरियां लेने के समय अस्थायी रूप से साफ दिखने लगती थीं।

 
इस आदेश में 9 फरवरी, 2022 से पहले हुए ज्वाइंट डेवलपमेंट राइट्स (जेडीआर) ट्रांसफर मामलों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। लंबे समय से विवादित ये मामले कई कॉलोनियों के विकास को रोक रहे थे। सरकार ने माना कि ऐसे प्रोजेक्ट, जहां मूल डेवलपर पर बकाया है, लेकिन जेडीआर होल्डर पर नहीं, वहां मंजूरियां रुकी हुई थीं और यह कॉलोनियों के विकास में बाधा बन रहा था।

 
विभाग ने दो-टूक कहा है कि ज्वाइंट डेवलपमेंट राइट्स से जुड़े उन पुराने मामलों में कालोनी के बिल्डिंग प्लान, लेआउट अप्रूवल और रिन्यूअल आदि से जुड़ी आगे की मंजूरियां मिल सकेंगी, जिन पर कोई बकाया नहीं है। इसमें यह शर्त भी है कि जेडीआर लेने वाला डेवलपर भी डिफाल्टर नहीं होना चाहिए। इससे कई ऐसी पुरानी कॉलोनियों को राहत मिलेगी जो सिर्फ इसलिए अटक गई थीं, क्योंकि मूल कंपनी पर भारी बकाया था, जबकि जमीन और डेवलपमेंट की जिम्मेदारी जेडीआर होल्डर द्वारा उठाई जा रही थी।

रियल एस्टेट उद्योग में यह आम बात रही है कि लाइसेंस लेने के समय कंपनियां अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को शेयरहोल्डिंग पैटर्न को या प्रभावी नियंत्रण को अस्थायी रूप से बदल देती थीं, ताकि वे ‘डिफॉल्टर’ की श्रेणी से बाहर दिखाई दें। मंजूरी मिलते ही वही डायरेक्टर फिर से बोर्ड में वापस आ जाते थे। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने इसे नियमों की खुली अवहेलना माना है और इसे रोकने के लिए बेहद कठोर प्रावधान लागू किया है।

अब एक साल पुराना रिकार्ड जांचा जाएगा। आवेदन करने वाले दिन बोर्ड और उसके शेयर होल्डर की जांच होगी। साथ ही, पिछले 12 माह के रिकार्ड से इसकी तुलना होगी। यदि इन 12 महीनों में एक भी दिन ऐसा पाया गया कि कोई डायरेक्टर/शेयरहोल्डर किसी अन्य प्रोजेक्ट या कंपनी में 20 करोड़ से अधिक बकाया के साथ डिफॉल्टर रहा तो उस डेवलपर का लाइसेंस या मंजूरी आवेदन तुरंत खारिज कर दिया जाएगा।

हरियाणा में पिछले कई वर्षों से अटकी हुई कॉलोनियां, अधूरी सड़कें और इन्फ्रास्ट्रक्चर तथा ईडीसी और एसआईडीसी की मोटी बकाया राशि राज्य के लिए बड़ी समस्या रही है। सरकार का जोर जहां बकाया पर है वहीं हजारों खरीदारों के अटके प्रोजेक्ट्स को गति देना भी है। जेडीआर के पुराने मामलों में स्पष्टता आने से उन कॉलोनियों का विकास अब फिर से शुरू हो सकेगा। बड़े बकायेदार डेवलपर्स पर दबाव बढ़ेगा। चूंकि अब नई मंजूरियों का रास्ता तभी खुलेगा जब डेवलपर पूरे एक साल तक ‘क्लीन’ रहे।

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