कोर्ट परिसर में रील, ए.आई डीपफेक और फेक लीगल सलाह पर BCI की सख्ती, वकीलों के लिए नई आचार संहिता लागू

Edited By Harman, Updated: 18 Jul, 2026 06:31 PM

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पंजाब एवं हरियाणा में हाईकोर्ट एडवोकेट हेमंत कुमार ने इस संबंध में  BCI  द्वारा जारी शुक्रवार 17 जुलाई को 37 पृष्ठों के सर्कुलर पत्र का अध्ययन करने के बाद बताया कि इसमें  BCI ने लिखा है कि सोशल मीडिया का उपयोग कानूनी जागरूकता, विधिक शिक्षा और...

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी) : बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने  देश भर  में एडवोकेट्स (वकीलों-- अधिवक्ताओं) , विधि ( लाॅ) छात्रों, इंटर्न और विधि शिक्षकों ( लाॅ  टीचरों) के लिए सोशल मीडिया के उपयोग संबंधी  विस्तृत आचार संहिता जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि न्यायालयों की गरिमा, पेशे की मर्यादा और न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

पंजाब एवं हरियाणा में हाईकोर्ट एडवोकेट हेमंत कुमार ने इस संबंध में  BCI  द्वारा जारी शुक्रवार 17 जुलाई को 37 पृष्ठों के सर्कुलर पत्र का अध्ययन करने के बाद बताया कि इसमें  BCI ने लिखा है कि सोशल मीडिया का उपयोग कानूनी जागरूकता, विधिक शिक्षा और अकादमिक ( शैक्षणिक) विमर्श के लिए किया जा सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल अदालतों की कार्यवाही को सनसनीखेज बनाने, न्यायाधीशों, वकीलों या पक्षकारों का उपहास उड़ाने, पेशे का प्रचार करने अथवा मुवक्किल जुटाने के लिए नहीं किया जा सकता।

BCI ने यह भी स्पष्ट किया है कि हाल के समय में वकीलों, लॉ स्टूडेंट्स और इंटर्न द्वारा अदालतों से जुड़े रील, शॉर्ट वीडियो, संपादित क्लिप और व्यक्तिगत टिप्पणियां सोशल मीडिया पर साझा करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। चयनित वीडियो क्लिप, नाटकीय संपादन और संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत की गई न्यायिक कार्यवाही न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित करती है और आम जनता का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर कर सकती है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दुरुपयोग पर भी सख्त चेतावनी

बार काउंसिल आफ इंडिया (BCI) ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि डीपफेक वीडियो, वॉयस क्लोनिंग, फर्जी निर्णय, मनगढ़ंत उद्धरण (फेक साइटेशन), नकली कानूनी सलाह तथा न्यायाधीशों और वकीलों का AI के माध्यम से प्रतिरूपण (Impersonation) कानूनी पेशे की विश्वसनीयता के लिए गंभीर खतरा है।

वकालत व्यवसाय नहीं, सार्वजनिक सेवा

 BCI ने दोहराया कि वकालत एक सार्वजनिक सेवा है, कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं। इसलिए अधिवक्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सोशल मीडिया के माध्यम से अपने लिए मुवक्किल नहीं जुटा सकते। "गारंटीड बेल", "कुछ दिनों में तलाक", "पक्का स्टे", "100% सफलता" जैसे दावे, आकर्षक थंबनेल, क्लिकबेट शीर्षक या स्वयं को अन्य वकीलों से श्रेष्ठ बताने वाले पोस्ट पेशेवर आचार संहिता का उल्लंघन माने जाएंगे।

क्या-क्या रहेगा प्रतिबंधित

BCI ने अधिवक्ताओं को अदालत परिसर, कोर्ट रूम, बार रूम, चैंबर और न्यायिक भवनों में रील, वीडियो या प्रचारात्मक सामग्री बनाने से बचने को कहा है। कोर्ट की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग, संपादित वीडियो प्रसारित करना, कोर्ट भवन, वकीलों का गाउन-बैंड, फाइलें या कोर्ट से जुड़ी सामग्री का व्यक्तिगत ब्रांडिंग के लिए उपयोग, मुवक्किल की गोपनीय जानकारी साझा करना, लंबित मामलों पर ऐसी टिप्पणी करना जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो तथा फर्जी निर्णय, नकली प्रशंसापत्र या AI से तैयार भ्रामक सामग्री प्रकाशित करना भी प्रतिबंधित किया गया है। साथ ही AI से तैयार न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं, पक्षकारों या न्यायालयों के डीपफेक वीडियो, वॉयस क्लोनिंग, फेस-स्वैप, सिंथेटिक अवतार और अन्य भ्रामक डिजिटल सामग्री के निर्माण एवं प्रसार पर भी रोक लगाई गई है।

लॉ स्टूडेंट्स और इंटर्न के लिए भी नियम

BCI ने निर्देश दिया है कि एल.एल.बी., एल.एल.एम. और अन्य विधि पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले प्रत्येक छात्र को प्रवेश के समय तथा इंटर्नशिप शुरू करने से पहले एक शपथ-पत्र देना होगा कि वह न्यायालय अथवा चैंबर से संबंधित गोपनीय जानकारी सार्वजनिक नहीं करेगा, कोर्ट की रिकॉर्डिंग नहीं करेगा तथा पेशेवर आचार संहिता का पालन करेगा। विधि शिक्षण संस्थानों को इन घोषणाओं का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं.

क्या रहेगा अनुमेय

 हेमंत ने बताया कि सर्कुलर पत्र के अनुसार कानूनी जागरूकता, संवैधानिक साक्षरता, न्यायालयों के निर्णयों पर अकादमिक चर्चा, निष्पक्ष केस लॉ अपडेट, विधिक शिक्षा, सेमिनार, लेख, पॉडकास्ट और तथ्यात्मक व गैर-प्रचारात्मक कानूनी जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की जा सकती है, बशर्ते वह सटीक, संतुलित, गोपनीयता का सम्मान करने वाली तथा गैर-भ्रामक हो।

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