बराड़ा के किसान ने धान-गेहूं की खेती छोड़ शुरु किया ये काम, अब फसलों से कई गुना अधिक हो रही आमदनी

Edited By Manisha rana, Updated: 30 Jan, 2026 03:09 PM

barara farmers abandoned paddy and wheat farming and started this work

हरियाणा के कृषि प्रधान परिदृश्य में जहां दूर-दूर तक धान और गेहूं की फसलें नजर आती हैं, वहीं बराड़ा के गांव तोलांवाली में खेती की एक नई तस्वीर उभर कर सामने आई है। यहां के प्रगतिशील किसान राजीव कुमार ने पारंपरिक खेती की सीमाओं को तोड़ते हुए फूलों की...

बराड़ा (अनिल कुमार) : हरियाणा के कृषि प्रधान परिदृश्य में जहां दूर-दूर तक धान और गेहूं की फसलें नजर आती हैं, वहीं बराड़ा के गांव तोलांवाली में खेती की एक नई तस्वीर उभर कर सामने आई है। यहां के प्रगतिशील किसान राजीव कुमार ने पारंपरिक खेती की सीमाओं को तोड़ते हुए फूलों की खुशबू से समृद्धि की नई कहानी लिख दी है। पिछले चार वर्षों से फूलों की खेती कर रहे राजीव कुमार ने यह साबित कर दिया है कि खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सही तकनीक और सरकारी सहयोग के साथ एक लाभदायक व्यवसाय भी बन सकती है।

परिवर्तन की नींव: जब धान-गन्ने की जगह फूलों ने ली

चार वर्ष पहले तक राजीव कुमार भी अन्य किसानों की तरह गेहूं, धान और गन्ने की खेती कर रहे थे। बढ़ती लागत और सीमित मुनाफे ने उन्हें नई दिशा सोचने को मजबूर किया। इसी दौरान उन्होंने उद्यान विभाग की नेट हाउस योजना को अपनाया। करीब 20 लाख रुपये की इस परियोजना में सरकार से 85 प्रतिशत अनुदान मिलने से उनका जोखिम काफी हद तक कम हो गया और यही कदम उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया।

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तकनीक और प्रकृति का अनूठा सामंजस्य

राजीव कुमार के खेत आधुनिक कृषि तकनीक का जीवंत उदाहरण हैं। यहां रासायनिक खादों के बजाय केंचुआ खाद और गोबर की खाद का प्रयोग किया जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। सिंचाई के लिए ड्रिप इरिगेशन अपनाया गया है, जिससे पानी की बचत के साथ-साथ पौधों की जड़ों तक आवश्यक नमी पहुंचती है। गर्मी के मौसम में फूलों को बचाने के लिए खेतों में फव्वारा पद्धति लगाई गई है। तेज तापमान के दौरान कृत्रिम फुहारें वातावरण को ठंडा रखती हैं, जिससे फूलों की गुणवत्ता और ताजगी बनी रहती है।

आमदनी की खुशबू

राजीव कुमार हर वर्ष 50 क्विंटल से अधिक गेंदा उगाते हैं। बाजार में इसके दाम 20 से 80 रुपये प्रति किलो तक रहते हैं। सभी खर्च निकालने के बाद उन्हें प्रति एकड़ लगभग 3 लाख रुपये की शुद्ध बचत होती है। वहीं गुलाब की खेती से उनकी सालाना आमदनी 4.5 लाख रुपये तक पहुंच रही है, जो पारंपरिक फसलों से कई गुना अधिक है।

आज तोलांवाली गांव से निकलने वाले फूलों की मांग साहा, बाबेन, मुलाना, सढ़ौरा, नारायणगढ़ और यमुनानगर तक पहुंच चुकी है। राजीव कुमार की यह सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अंबाला जिले में बदलती खेती की सोच का प्रतीक है। यह साबित करता है कि यदि सरकारी योजनाएं सही तरीके से धरातल पर लागू हों, तो किसान आत्मनिर्भर बन सकता है।

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