क्या फ्लेक्स-फ्यूल टेक्नोलॉजी से बदलेगी भारत की हवा की गुणवत्ता?

Edited By Gaurav Tiwari, Updated: 10 Apr, 2026 04:19 PM

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भारत का ऑटोमोबाइल क्षेत्र आज एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ तकनीकी प्रगति और पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी का मेल हो रहा है। हमारे शहर खराब होती हवा और ईंधन की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे हैं,

गुड़गांव ब्यूरो : भारत का ऑटोमोबाइल क्षेत्र आज एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ तकनीकी प्रगति और पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी का मेल हो रहा है। हमारे शहर खराब होती हवा और ईंधन की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे हैं, ऐसे में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन देश के लिए एक उम्मीद भरा समाधान बनकर उभरे हैं। इस बदलावकारी टेक्नोलॉजी को अपनाना 'क्लीन ट्रांसपोर्ट' और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक बड़ा कदम है। पर्यावरण के अनुकूल परिवहन की ज़रूरत भारत के सामने एक बड़ी चुनौती है क्योंकि इसके प्रमुख शहर गंभीर वायु प्रदूषण का सामना कर रहे हैं। वर्ष 2024-25 में, सड़क परिवहन की ऊर्जा ज़रूरतों का 49% पेट्रोल, 41% डीज़ल, 9% सीएनजी और केवल 1% बिजली से पूरा किया गया। पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर यह भारी निर्भरता न केवल प्राकृतिक संसाधनों को खत्म करती है, बल्कि कच्चे तेल के भारी आयात के कारण हमारी अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा बोझ डालती है।  मोहन सावरकर, सीपीओ एवं सीसीक्‍यूओ, टीएमपीवी ने कहा कि देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था, जनसंख्या और तेज़ी से होता शहरीकरण पर्यावरण के अनुकूल परिवहन समाधानों की ज़रूरत को और बढ़ा देता है। पारंपरिक वाहन शहरी प्रदूषण में बड़ी भूमिका निभाते हैं; ये कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे हानिकारक तत्व छोड़ते हैं। ये उत्सर्जन हवा की गुणवत्ता बिगाड़ते हैं और वैश्विक जलवायु संकट को और गहरा करते हैं। अब स्वच्छ विकल्पों की ओर बढ़ना केवल एक पसंद नहीं, बल्कि जन-स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए एक ज़रूरत बन चुका है।

 

 मोहन सावरकर, सीपीओ एवं सीसीक्‍यूओ, टीएमपीवी के मुताबिक फ्लेक्स-फ्यूल वाहन: ऑटोमोबाइल जगत में क्रांति फ्लेक्स-फ्यूल वाहन इस धारणा को बदल रहे हैं कि हमारी गाड़ियाँ कैसे चलती हैं ऑटोमोबाइल तकनीक में एक बड़ी प्रगति के रूप में, FFV पेट्रोल और एथेनॉल के किसी भी मिश्रण पर कुशलता से चल सकते हैं फिर चाहे वो शुद्ध पेट्रोल हो या 100% तक एथेनॉल। इन वाहनों में खास इंजन और एडवांस फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम लगे होते हैं, जो अलग-अलग ईंधन मिश्रण के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं और बेहतरीन परफॉर्मेंस सुनिश्चित करते हैं। हालांकि, एथेनॉल का ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कम होता है, जिसकी वजह से ईंधन की खपत 30-35% बढ़ जाती है। लेकिन इसकी हाई ऑक्टेन रेटिंग और बेहतर कूलिंग गुणों की वजह से इंजन को पेट्रोल के मुकाबले 4-5% अधिक पावर मिलती है। साथ ही, यह कार्बन उत्सर्जन को भी लगभग 30% तक कम कर देता है भारत की विविध जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए, व्यापक टेस्टिंग में 'E20 से E85' तक के एथेनॉल मिश्रण को सबसे सही रेंज माना गया है। हालांकि, एथेनॉल का इग्निशन पॉइंट (जलने का तापमान) अधिक होने के कारण ठंडे इलाकों में चुनौती आती है, जहाँ तापमान 5°C से नीचे चला जाता है। ऐसे में इंजन को स्टार्ट करने के लिए ईंधन को पहले गर्म करना पड़ता है। इन तकनीकी चुनौतियों के बावजूद, फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का लचीलापन और उनके पर्यावरणीय लाभ उन्हें भारत में 'सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट' की ओर बढ़ने के लिए एक व्यावहारिक और असरदार समाधान बनाते हैं। एथेनॉल और जैव ईंधन: जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना और हवा की गुणवत्ता सुधारना भारत का एथेनॉल-ब्लेंडिंग कार्यक्रम उसकी ऊर्जा बदलाव की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार, 2017 से 2021 के बीच भारत में एथेनॉल की मांग तीन गुना बढ़ गई है। नवंबर 2025 से शुरू हुए वर्तमान एथेनॉल वर्ष में, पेट्रोल में अनिवार्य 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग के लिए लगभग 11 बिलियन लीटर एथेनॉल की ज़रूरत है। यह 2017 की मात्र 2% और जून 2022 की 10% ब्लेंडिंग के मुकाबले एक बहुत बड़ी छलांग है।

 

पिछले एक दशक में, एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को 1,25,000 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है, जिसके बड़े आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ मिले हैं। इस कार्यक्रम ने विदेशी मुद्रा में 1,44,087 करोड़ रुपये से अधिक की बचत की है, लगभग 245 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का विकल्प दिया है और कार्बन उत्सर्जन में करीब 736 लाख मीट्रिक टन की कमी की है। पेट्रोल में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग से किसानों को सालाना 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की आय होने की उम्मीद है। नवंबर 2025 तक भारत की एथेनॉल उत्पादन क्षमता 1,990 करोड़ लीटर है, जो अक्टूबर 2026 तक ब्लेंडिंग के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए काफी है। एथेनॉल-आधारित जैव ईंधन पर्यावरण के लिए बहुत फायदेमंद हैं। पेट्रोल के मुकाबले इनके उत्पादन के दौरान 80% कम CO2 निकलती है। इसके अलावा, फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का एडवांस फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम CO, HC, NOx और PM जैसे प्रदूषकों को कम करने में मदद करता है, जो भारत के 'राष्ट्रीय जैव-ऊर्जा मिशन' के वायु प्रदूषण कम करने के लक्ष्य के अनुकूल है।

 

 

भविष्य की राह 

भारत में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा है, हालांकि कुछ चुनौतियां अभी भी हैं। एथेनॉल के उत्पादन, वितरण और बिक्री के लिए बुनियादी ढांचे का विस्तार करने में बड़े निवेश और मजबूत सरकारी नीतियों की ज़रूरत होगी। सरकार की हालिया पहल, जैसे प्रधानमंत्री जी-वन योजना और एथेनॉल पर जीएसटी की दर को घटाकर 5% करना, इन बाधाओं को दूर करने और बाज़ार को बढ़ाने के प्रति सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाती हैं। फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए एक चौतरफा रणनीति ज़रूरी है। इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास, नीति-निर्माताओं, ईंधन कंपनियों और ऑटोमोबाइल उद्योग के बीच बेहतर तालमेल, और ग्राहकों के लिए जागरूकता अभियान—यही सफलता के मुख्य मंत्र होंगे। शुरुआत में इन वाहनों को खरीदने वालों के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और एथेनॉल ईंधन की क्षमता बढ़ाने के लिए निरंतर रिसर्च इस बदलाव को और तेज़ करेंगे। अंत में, हवा की गुणवत्ता सुधारने में फ्लेक्स-फ्यूल टेक्नोलॉजी की सफलता सरकार, उद्योग और आम जनता के साझा प्रयासों पर निर्भर करती है। जैसे-जैसे भारत एक स्वच्छ परिवहन इकोसिस्टम की ओर बढ़ रहा है, फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को अपनाना सिर्फ एक तकनीकी विकास नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य की ओर हमारी सच्ची प्रतिबद्धता है।

 

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