Haryana में ‘गरिमा के साथ मृत्यु’ के Supreme Court के निर्देश लागू करने की तैयारी, जिला स्तर पर बनेगा विशेषज्ञ डॉक्टरों का पैनल

Edited By Krishan Rana, Updated: 08 Aug, 2026 08:44 PM

preparations underway in haryana to implement the supreme court s directive on

हरियाणा में गंभीर और असाध्य बीमारी से जूझ रहे उन मरीजों के जीवन रक्षक उपचार को रोकने या वापस लेने की प्रक्रिया

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा में गंभीर और असाध्य बीमारी से जूझ रहे उन मरीजों के जीवन रक्षक उपचार को रोकने या वापस लेने की प्रक्रिया अब तय चिकित्सकीय और कानूनी व्यवस्था के तहत होगी, जिनके स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे मरीजों का वेंटिलेटर या अन्य लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने के लिए प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की सहमति जरूरी होगी। दोनों बोर्डों में मतभेद होने पर संबंधित हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकेगा।

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के ‘गरिमा के साथ मृत्यु’ से जुड़े दिशा-निर्देशों को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए सरकारी और निजी अस्पतालों के लिए प्रक्रिया निर्धारित की है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जीवन रक्षक चिकित्सा प्रणाली हटाने का निर्णय न तो मनमाने ढंग से लिया जाए और न ही केवल परिजनों की इच्छा के आधार पर।

किसी अस्पताल में यदि ऐसा मरीज भर्ती है जिसकी स्थिति अपरिवर्तनीय है और जिसके उपचार से अब कोई चिकित्सकीय लाभ मिलने की संभावना नहीं है, तो मामला सबसे पहले प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड के समक्ष रखा जाएगा। इस बोर्ड में मरीज का इलाज कर रहे डॉक्टर के अलावा संबंधित विशेषज्ञता के कम से कम दो विशेषज्ञ होंगे। विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास संबंधित क्षेत्र में कम से कम पांच वर्ष का अनुभव होना जरूरी होगा।

प्राथमिक बोर्ड मरीज की चिकित्सकीय स्थिति का मूल्यांकन करने के साथ उसके परिजनों या अभिभावक से भी चर्चा करेगा। सामान्य परिस्थितियों में बोर्ड 48 घंटे के भीतर अपनी प्रारंभिक राय देने का प्रयास करेगा।

पहले प्राथमिक, फिर द्वितीयक बोर्ड करेगा फैसला
यदि प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड जीवन रक्षक उपचार हटाने या आगे का उपचार रोकने के पक्ष में राय देता है, तो अस्पताल को तत्काल द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड गठित करना होगा। इसमें जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा नामित एक पंजीकृत चिकित्सक और कम से कम दो ऐसे विशेषज्ञ शामिल होंगे, जो प्राथमिक बोर्ड का हिस्सा नहीं रहे हों। इन विशेषज्ञों के पास भी संबंधित क्षेत्र में कम से कम पांच वर्ष का अनुभव होना आवश्यक होगा।

द्वितीयक बोर्ड मरीज की स्वतंत्र चिकित्सकीय जांच करेगा और सामान्यतः 48 घंटे के भीतर अपनी राय देगा। इस तरह वेंटिलेटर हटाने का निर्णय केवल एक डॉक्टर या अस्पताल के स्तर पर नहीं, बल्कि दो स्वतंत्र चिकित्सकीय आकलनों के बाद ही आगे बढ़ सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आधारित है व्यवस्था
यह पूरी व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले और उसके बाद जारी दिशा-निर्देशों पर आधारित है। नौ मार्च 2018 को संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार के साथ गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी शामिल है।

हालांकि, इसका अर्थ सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है। किसी मरीज को जानबूझकर घातक दवा या इंजेक्शन देकर मृत्यु देना अब भी कानूनन मान्य नहीं है। निर्धारित परिस्थितियों में केवल जीवन बनाए रखने वाले उपचार को रोकने या वापस लेने की अनुमति दी गई है।

हर जिले में तैयार होगा विशेषज्ञ डॉक्टरों का पैनल
द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड के गठन में देरी न हो, इसके लिए जिला स्तर पर योग्य डॉक्टरों का पैनल तैयार किया जाएगा। मुख्य चिकित्सा अधिकारी अस्पताल से अनुरोध मिलने के बाद इसी पैनल में से डॉक्टर को नामित करेंगे। डॉक्टर का नामांकन निर्धारित समय सीमा के भीतर करना होगा। पैनल को कम से कम हर 12 महीने में अपडेट किया जाएगा।

जीवित इच्छा-पत्र न होने पर भी प्रक्रिया संभव
मरीज ने पहले से ‘लिविंग विल’ या पूर्व चिकित्सा निर्देश बनाया हो, यह हर मामले में अनिवार्य नहीं होगा। यदि मरीज ने ऐसा दस्तावेज नहीं बनाया है और वह स्वयं चिकित्सकीय निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है, तब भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत जीवन रक्षक उपचार रोकने या वापस लेने पर विचार किया जा सकता है।

ऐसी स्थिति में प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड मरीज के परिवार, निकटतम संबंधी या अभिभावक से विस्तार से चर्चा करेगा। उन्हें लाइफ सपोर्ट हटाने के संभावित फायदे-नुकसान और परिणामों की जानकारी दी जाएगी तथा उनकी लिखित सहमति ली जाएगी। इसके बाद द्वितीयक बोर्ड स्वतंत्र चिकित्सकीय मूल्यांकन करेगा।

दोनों बोर्डों में मतभेद तो हाई कोर्ट का रास्ता
यदि प्राथमिक और द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड की राय एक जैसी नहीं है या द्वितीयक बोर्ड जीवन रक्षक उपचार हटाने से सहमत नहीं होता, तो प्रक्रिया वहीं समाप्त नहीं होगी। मरीज के नामित व्यक्ति, परिवार, इलाज करने वाला डॉक्टर या अस्पताल संबंधित हाई कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है।

हाई कोर्ट आवश्यकता पड़ने पर स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड गठित कर सकता है और मामले का शीघ्र निपटारा करने की प्रक्रिया अपनाएगा। इस व्यवस्था से एक ओर मरीज की गरिमा और उसकी इच्छाओं की रक्षा होगी, वहीं दूसरी ओर जीवन रक्षक उपचार हटाने जैसे संवेदनशील फैसले में चिकित्सकीय और कानूनी सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

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